Saturday 30, August 2025
ईश्वर के अनुग्रह का सदुपयोग किया जाए | Ishwa ke Anugrah Ka Sadupayog
गायत्री मन्त्र के धियः शब्द की शक्ति से जुड़ी अनजानी बातें |
मरने से डरना क्या ? | Marne Se Darsna Kya | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
गायत्री द्वारा त्रिविध दुःखों का निवारण भाग - 1 Gayatri Dwara Trividh Dukho Ka Nivaran Part 01
जीवन का सत्य | Jivan Ka Satya | Dr. Pranav Pandya जीवन पथ के प्रदीप
सच्चरित्रता अनिवार्य है | Sacharitrata Anivarya Hai | परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
अमृतवाणी:- गायत्री का ज्ञान-विज्ञान | Gayatri Ka Gyan Vigyan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 30 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: अहिंसा के योद्धा बुद्ध पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
भगवान बुद्ध की जितनी मजबूत, जितनी विचारधारा थी, लोगों ने सत्यानाश कर दिया और दुनिया को खत्म कर दिया। फिर हुआ क्या? हुआ ये है कि जैसे आप तिब्बत में जाइए। अहिंसा का धर्म पालन करने वाले। अहिंसा, अहिंसा। सारा तिब्बत, बौद्ध धर्म का, बौद्धों का देश है। और वहां अहिंसा पाली जाती है, लेकिन मांस तो खाते हैं।
तो मांस खाते हैं और अहिंसा पालन करते हैं। ये क्या मतलब है बेटे? वो हत्या नहीं करते। तो बिना हत्या के मांस कैसे मिल जाता है? अभी मैं बता देता हूं जी, बिना हत्या के भी मांस मिल सकता है। कैसे?
देखो, वो बकरी का बांध देते हैं मुंह। चिल्लाती नहीं है। चिल्लाएगी नहीं तो कैसे हत्या हुई? और एक काम करते हैं कि गले में उसके फांसी लगा देते हैं। फांसी लगाकर उसको टांग देते हैं और मार डालते हैं।
तो फिर खून नहीं निकलता? खून नहीं निकलता बेटे। तो फिर तो ये कहां हिंसा हुई? अहिंसा है न ये? ये तो अहिंसा है। चिल्लाई तो नहीं और खून निकला नहीं। तो ये अहिंसा हुई। अहिंसा से निकाल लिया।
सारे के सारे तिब्बत में इसी तरह की अहिंसा फैल गई। ये हम विडंबनाएं करने में बड़े माहिर हैं। हम इन मामलों में बड़े माहिर हैं।
रामचंद्र जी की भक्ति के बारे में हम बड़े माहिर हैं। और कृष्णचंद्र जी की भक्ति के बारे में हम बड़े माहिर हैं। हमने ऐसा तरीका ढूंढ़ निकाला है जिसमें रामचंद्र जी भी और कृष्णचंद्र जी भी, दोनों की भक्ति एक ही ढेले में हम कर सकते हैं।
जैसे — "हरे राम, हरे कृष्णा, हरे रामा, हरे कृष्णा। हार गए रामा, हार गए कृष्णा।"
देख ले, एक ही ढेले में मार दिए दो शिकार।
हाँ महाराज जी, कौन-कौन मारा?
एक मारा राम, एक मारा कृष्ण।
तो बेटे, वो तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे और वो पूर्ण पुरुष थे। वो मर्यादाओं की स्थापना करने के लिए आए थे और वो पूर्ण पुरुष बनाने के लिए आए थे।
तू मर्यादाओं को पालन करेगा?
"नहीं महाराज जी, मर्यादा को तो पालन नहीं करूंगा।"
तो क्या करेगा?
"हरे रामा करूंगा।"
ये देख लेता है सबसे सुगम वाला रास्ता, सबसे सरल वाला रास्ता ढूंढ़ लेता है। बेटे, ऐसा ही हुआ भगवान बुद्ध के जमाने में। बुद्ध के जमाने में जो अहिंसा वाला हिस्सा रह गया, बस सब लोगों ने हथियार फेंक दिए।
"अहिंसा करेंगे और जप करेंगे। अहिंसा करेंगे, जप करेंगे।"
ये परिणाम क्या हुआ?
कि 1500 आदमी मध्य एशिया से आए और 1500 आदमियों ने सारे हिंदुस्तान पर एक के बाद एक कब्जा, कब्जा, कब्जा करते चले गए। और 80 वर्ष के अंदर, सारे हिंदुस्तान को पैरों के नीचे से रौंद के फेंक दिया — 1500 डाकुओं ने।
क्यों? वो आपकी अहिंसा। वो आपकी अहिंसा। कौन सी वाली अहिंसा?
इसमें डाकुओं को छूट, दुष्टों को छूट, बेईमानों को छूट, अत्याचारियों को छूट। सबको छूट, सबको छूट, सबको छूट।
ये बेटे, थी अहिंसा। इसने हिंदुस्तान के लिए वो शाप दिया कि जिसकी भीतर हम हजार वर्षों तक गुलामी के बंधनों में जकड़े पड़े रहे।
फिर, फिर वो... वो हमारी अहिंसा।
अहिंसा का चमत्कार देखिए।
अहिंसा का चमत्कार!
हिंदुस्तान को हजार वर्षों के लिए गुलाम बना दिया। और हिंदुस्तान से वही अहिंसा, अहिंसा, अहिंसा दौड़ती हुई चली गई। और अहिंसा के ऊपर वो 1500 डाकू बढ़ते हुए चले गए — सिंगापुर में चले गए, मलेशिया में चले गए, जावा में चले गए, सुमात्रा में चले गए, इंडोनेशिया में चले गए।
यह सब मुस्लिम देश हैं। जहां आप जाकर के देखिए — हिंदू सभ्यता थी। अभी भी रामायण, रामलीला होती है। अभी भी सारे मंदिर बने हुए हैं, लेकिन 90% या 95% मुसलमान हैं।
सारे के सारे देशों में मुसलमान बड़े ताकतवर थे?
ताकतवर नहीं थे।
यह हमारी अहिंसा कमजोर थी। अहिंसा कमजोर थी। मुसलमान ताकतवर नहीं थे। ज़्यादा ताकतवर नहीं थे। हम कमजोर थे।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
एक वकालत में ही नहीं, किसी भी विषय अथवा क्षेत्र में अध्ययन-शीलता एवं अध्ययन-हीनता का परिणाम एक जैसा ही होता है। इसमें चिर, नवीन अवस्था का कोई आपेक्ष नहीं होता। यह एक वैज्ञानिक सत्य है जिसमें अपवाद के लिए कोई गुँजाइश नहीं है।
धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र ले लीजिये कोई अमुक नित्य चार-चार बार पूजा करता, तीन-तीन घण्टे आसन लगाता, जाप करता अथवा कीर्तन में मग्न रहता। व्रत-उपवास रखता, दान-दक्षिणा देता है, किन्तु शास्त्रों अथवा सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय, उनके विचारों का चिन्तन-मनन नहीं करता। सोच लेता है जब मैं इतना क्रिया-काण्ड करता हूँ तो इसके बाद अध्ययन की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। आत्म-ज्ञान अथवा परमात्म अनुभूति करा देने के लिए इतना ही पर्याप्त है तो निश्चय ही वह भ्रम में है। आत्मा का क्षेत्र वैचारिक क्षेत्र है, सूक्ष्म भावनाओं एवं मनन-चिन्तन का क्षेत्र हैं।
अध्ययन के अभाव में इस आत्म-जगत् में गति कठिन है। आत्मा के स्वरूप का ज्ञान अथवा परमात्मा के अस्तित्व का परिचय प्राप्त हुए बिना उनसे संपर्क किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है? इस अविगत का ज्ञान तो उन महान् मनीषियों का अनुभव अध्ययन करने से ही प्राप्त हो सकना सम्भव है, जो अवतार रूप में संसार को वेदों का ज्ञान देने के लिए परमात्मा का प्रतिनिधित्व करते रहते हैं। आसन ध्यान, पूजा-पाठ तो प्रधान रूप से बुद्धि को परिष्कृत और आचरण को उज्ज्वल बनाने के लिये, इस हेतु करना आवश्यक है कि अध्यात्म के दैविक तत्त्व को समझने और ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त हो सके।
इसके विपरीत यदि एक बार पूजा-पाठ को स्थगित भी रखा जाये और एकाग्रता एवं आस्थापूर्वक स्वाध्याय और उसका चिन्तन मनन भी किया जाये तो बहुत कुछ उस दिशा में बढ़ा जा सकता है। स्वाध्याय स्वयं ही एक तप, आसन और निदिप्यास के समान है। इसका नियम निर्वाह से आप ही आप अनेक नियम, संयमों का अभ्यास हो जाता है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
| Newer Post | Home | Older Post |
