Friday 29, August 2025
अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pujay Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya
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स्वाध्याय और सत्संग | Swadhyay Aur Satsang | Pt Shriram Sharma Acharya, Rishi Chintan
अमृतवाणी:- गायत्री माता ब्राह्मण की कामधेनु है | Gayatri Mata Bhraman Ki Kamdhenu Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 29 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: शांत नहीं, शूरवीर थे बुद्ध पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
मुझे याद है कि बुद्ध एक ऐसे तपस्वी का नाम था और ऐसे एक तेजस्वी का नाम था, जिनका खून खोलने लगा। खून खोलने लगा जब उनका जन्म हुआ, तो उन्होंने देखा यज्ञों के नाम पर हिंसा, यज्ञों के नाम पर हिंसा, यज्ञों के नाम पर हिंसा फैल रही थी।
हिंसा फैल रही थी। बुद्ध ने कहा, "भाई, यह क्या बात है? यह हवन करते हैं आप लोग और जानवरों को मार के काट डालते हैं, हवन करा देते हैं। यह भी कोई बात है?"
उन्होंने कहा, बेचारे पढ़े तो थे नहीं ज्यादा, मामूली पढ़े हुए थे। लोगों ने कहा, "साहब, ये तो यज्ञ है। ये यज्ञ में तो हिंसा होती है। यज्ञ में तो जानवर कटेंगे ही, चढ़ेंगे ही।"
तो उन्होंने कहा, "नहीं, फिर यज्ञ करने की जरूरत नहीं। जिसमें हत्या होती है, उस यज्ञ को क्यों करना चाहिए?"
फिर पंडितों ने और दूसरे लोगों ने कहा, "ये यज्ञ तो वेदों में लिखा हुआ है।"
तो उन्होंने कहा, "ऐसे वेदों को मानने की जरूरत नहीं है जिसमें ऐसी गंदी बात लिखी है।"
फिर लोगों ने कहा, "वेद तो भगवान ने बनाए हैं।"
तो ऐसे भगवान को मानने की जरूरत नहीं, कि जो ये कहता है कि जीवों को और जानवरों को काट के हवन कर दो। कोई यह अकल नहीं है कि हमको मुनासिब बात कहते हैं। हमने ऐसे भगवान से मना कर दिया है।
मित्रों, भगवान बुद्ध ने नास्तिकवाद फैलाया, शून्यवाद फैलाया और उन्होंने कहा, “ईश्वर कोई नहीं होता।” उन्होंने यह कहा, “वेद के विरुद्ध...”
उन्होंने बहुत सारी बातें कही। यज्ञ के विरुद्ध बहुत सारी बातें कही। तो वेद के विरुद्ध थे? नहीं, विरुद्ध नहीं थे बेटे। उन्होंने जो स्वरूप देखा है, उसको मना कर दिया।
क्या थे? ऐसे क्रांतिकारी थे बुद्ध। ऐसे संघर्षशील थे बुद्ध।
उन्होंने जहां अवांछनीयता देखी, वहां लाखों आदमी हिंदुस्तान के कोने-कोने में हमला करने के लिए भेजे — अनीति के खिलाफ। और उन्होंने सारे हिंदुस्तान से बाहर, सारे के सारे एशिया में और दूसरे देशों में लाखों आदमी भेजे, जहां अनीति और अज्ञान फैला हुआ था।
ऐसा लड़ाकू, ऐसा योद्धा, ऐसा शक्तिशाली बुद्ध। ऐसा शक्तिशाली बुद्ध! मैं क्या कह सकता हूं? उसने क्षत्रिय के घर में जन्म लिया था और बहादुर आदमी था बुद्ध।
लेकिन हुआ क्या है? थोड़े दिन बाद, थोड़े दिन बाद लोगों ने — जैसे हम और आप, हम और आप जैसे लोगों ने — बुद्ध की ऐसी मिट्टी पलीत की, ऐसी मिट्टी पलीत की कि भगवान किसी की न करे।
उन्होंने क्या कर दिया? एक वाला कमजोर वाला हिस्सा है, सबसे छोटा वाला हिस्सा है, वो उन्होंने रख लिया है, जिसके भीतर अपनी कमजोरियों को हम छिपा सकते हैं।
कमजोरियों को छिपा सकने वाला — अहिंसा वाला हिस्सा ले लिया।
"हम अहिंसा नहीं करेंगे, अहिंसा नहीं करेंगे। और कोई और मारे तो मारे, तो मारता रहेगा, हम नहीं मारेंगे।"
हाँ, तो ये अहिंसा तो ठीक है। ये अहिंसा तू निभा लेगा। इसमें कोई आफत नहीं है। कोई पीटता रहे, पीटता रहे — "मैं तो अहिंसा का हूँ, मैं अहिंसा का हूँ।"
पालना तो बड़ा सरल है। इसमें कोई त्याग नहीं करना पड़ेगा, कोई कष्ट नहीं सहना पड़ेगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
नित्य ही तो न्यायालयों में देखा जा सकता है कि कोई एक वकील तो धारावाहिक रूप में बोलता और नियमों की व्याख्या करता जाता है और कोई टटोलकर भूलता याद करता हुआ सा कुछ थोड़ा-बहुत बोल पाता है। दोनों वकीलों ने एक समान ही कानून की परीक्षा पास की, उनके अध्ययन का समय भी बराबर रहा, पैसा और परिश्रम भी परीक्षा पास करने में लगभग एक सा ही लगाया और न्यायालयों में पक्ष प्रतिपादन का अधिकार भी समान रूप से ही मिला है- तब यह ध्यानाकर्षण अन्तर क्यों? इस अन्तर का अन्य कोई कारण नहीं एक ही अन्तर है और वह है स्वाध्याय। जो वकील धारावाहिक रूप में बोल कर न्यायालय का वायु-मण्डल प्रभावित कर अपने पक्ष का समर्थन जीत लेता है -वह निश्चय ही बिलाना। घंटों स्वाध्याय का व्रती होगा। इसके विपरीत जो वकील अविश्वासपूर्ण विश्रृंखल प्रतिपादन करता हुआ दिखलाई दे, विश्वास कर लेना चाहिए कि वह स्वाध्याय शील नहीं है।
योंहीं अपनी पिछली योग्यता, स्मृति शक्ति के आधार पर पक्ष प्रतिपादन का असफल प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार के स्वाध्याय हीन वकील अथवा प्रोफेसर अपने काम में सफल नहीं हो पाते और प्रगति की दौड़ में पीछे पड़े हुये घिसटते रहते हैं। उनको अपने पेशे में कोई अभिरुचि नहीं रहती और शीघ्र ही वे उसे छोड़कर भाग जाने की सोचने लगते है। ऐसे असफल न जाने कितने वकील एवं प्रोफेसर देखने को मिल सकते हैं, जो स्वाध्याय-हीनता के दोष के कारण अपना-अपना स्थान छोड़कर छोटी-मोटी नौकरी में चले गये है। ऐसे विशाल एवं सम्मानित क्षेत्र को अपने अवांछनीय दोष के कारण भाग खड़ा होना मनुष्य के लिए बड़ी लज्जाप्रद असफलता है।
इतना ही नहीं वर्षों पुराने, अनुभवी और मजबूती से जमे हुए अनेक वकील प्रमाद के कारण नये-नये आये हुए वकीलों द्वारा उखाड़ फेंके जाते देखे जा सकते हैं। पुराने लोग अपने विगत स्वाध्याय, जमी प्रेक्टिस, प्रमाणित प्रतिभा और लम्बे अनुभव के अभिमान में आकर यह सोच कर दैनिक स्वाध्याय में प्रमाद करने लगते हैं कि हम तो इस क्षेत्र में महारथी हैं, इस विषय के सर्वज्ञ है, कोई दूसरा हमारे सामने खड़े होने का साहस ही नहीं कर सकता। किन्तु नया आया हुआ वकील नियमपूर्वक अपने विषय का अनुदैनिक स्वाध्याय करता और ज्ञान को व्यापक बनाता और माँजता रहता है। प्रमाद एवं परिश्रम का जो परिणाम होना है, वह दोनों के सामने उसी रूप में आता है। निदान वकील पीछे पड़ जाता है और नया आगे निकल जाता है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
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