Thursday 28, August 2025
परम वंदनीया माताजी का अंतिम संदेश, Param Vandaniya Mata Ji Ka Antim Sandesh | Mata Ji Last Message
गायत्री साधना के कुछ विशेष प्रयोग भाग 03 | Gayatri Sadhna Ke Kuch Vishesh Prayog Part 03
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अमृतवाणी:- गायत्री ही कामधेनु है | Gayatri Hi Kamdhenu Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 28 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
यह दुनिया दो चीजों से बनी हुई है — एक देव और एक दैत्य, एक तमोगुण और एक सतोगुण। जहां सतोगुण है बेटे, हमको प्यार की बात कहनी चाहिए, क्षमा की बात कहनी चाहिए, दया की बात कहनी चाहिए, करुणा की बात कहनी चाहिए, स्नेह की बात कहनी चाहिए, दया की बात कहनी चाहिए।
और जहां-जहां वो है, वहां-वहां क्या करना चाहिए? बेटे, वहां दूसरा कोई तरीका नहीं है, दूसरा कोई तरीका नहीं है।
बिच्छू पर दया करेगा तो बच्चे जिंदा नहीं रह सकते।
बिच्छू को पाल, बिच्छू को संभाल, सांप को दूध पिला — और अपने-अपने बच्चों को मौत के मुंह में धकेल। बेटे, इनमें से दो में से कोई एक जिएगा। या तो खटमल जिएगा या तो तू जिएगा।
"नहीं महाराज जी, खटमल तो पालूंगा।"
तो पाल ले बेटे, फिर देख ले। मैं और भेज दूंगा शांतिकुंज से — एक पात्र बनाकर के, तू पाल ले न खटमल।
सब पर दया करूंगा, क्षमा करूंगा।
तो कर चल। चल, तेरी दया को देखूंगा और तेरी क्षमा को देखूंगा।
"और क्या-क्या चाहिए तुझे? मच्छर चाहिए क्या?"
मच्छर मेरे यहां से ले जा।
खटमल ले जा मेरे यहां से।
"जुएं चाहिए तुझे?"
ले, जुएं ले जा, पाल ले।
बड़ा दयालु बना।
मित्रों, क्या करना पड़ेगा?
आपको इन बातों के बारे में बहुत बड़ा और स्पष्ट रुख लेकर चलना पड़ेगा।
एकांगी धर्म, एकांगी उपदेश और एकांगी ज्ञान से काम चलने वाला नहीं है।
ज्ञान और विज्ञान, दोनों का समन्वय लेकर चलना पड़ेगा।
हमको अपने भीतर जप का माद्दा पैदा करना चाहिए, अपने अंदर ध्यान का माद्दा पैदा करना चाहिए, और अपने अंदर जो बुराइयाँ हैं, कमजोरियाँ हैं, उनके विरुद्ध लोहा लेकर खड़ा हो जाना चाहिए।
अपने साथ में कड़ाई से पेश आना चाहिए — "अब हम नहीं कर सकते ये, और ये अब नहीं होगा।"
बेटे, इस तरीके से भी बात बननी चाहिए।
"साहब, यह भी चलता रहेगा और यह भी चलता रहेगा। पाप भी चलता रहेगा और पुण्य भी चलता रहेगा। और चोरी भी चलती रहेगी।"
अरे नहीं बेटे, इस तरीके से गड़बड़ नहीं हो सकता।
एक के विरुद्ध लोहा ले और एक को बढ़ाने की कोशिश कर।
जीवन की नीतियाँ आपकी स्पष्ट हों।
स्पष्ट अगर नहीं रहेगी, तो आप भ्रम में पड़ेंगे।
भ्रम में पड़ेंगे और आप ऐसे जाल-जंजाल में फँसेंगे कि आप सिवाय दार्शनिक भ्रम, दार्शनिक भ्रम, दार्शनिक भ्रम में ही फँसे हुए रह जाएँगे।
अखण्ड-ज्योति से
बहुत बार हम से अनेक लोग किसी की धारा-प्रवाह बोलते एवं भाषण देते देखकर मंत्र कीलित जैसे हो जाते हैं और वक्ता के ज्ञान एवं उसकी प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते हैं और कभी-कभी यह भी मान लेते हैं कि इस व्यक्ति पर माता सरस्वती भी प्रत्यक्ष कृपा है। इसके अंतर्पट खुल गये हैं, तभी तो ज्ञान का अविरल स्रोत इसके शब्दों में मुख के द्वारा बाहर बहता चला रहा है।
बात भी सही है, श्रोताओं का इस प्रकार आश्चर्य विभोर हो जाना अस्वाभाविक भी नहीं है। सफल वक्ता अथवा समर्थ प्राध्यापक जिस विषय को ले लेते हैं, उस पर घण्टों एक बार बोलते चले जाते हैं, और यह प्रमाणित कर देते हैं कि उनकी उस विषय का साँगोपाँग ज्ञान है और उनकी सारी विद्या जिह्वा के अग्रभाग पर रखी हुई है। जबकि वह कोई मांत्रिक सिद्धि नहीं होती है। वह सारा चमत्कार उनके उस स्वाध्याय का सुफल होता है, जिसे वे किसी दिन भी, जिसे वे किसी दिन भी, किसी अवस्था में नहीं छोड़ते। उनके जीवन का कदाचित ही कोई ऐसा अभागा दिन जाता हो, जिसमें वे मनोयोगपूर्वक घण्टे दो घण्टे स्वाध्याय न करते हों।
स्वाध्याय उनके जीवन का एक अंग और प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता बन जाता है। जिस दिन वे अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते, उस दिन वे अपने तन-मन और आत्मा में एक भूख, एक रिक्तता का कष्ट अनुभव किया करते हैं। उस दिन का वे जीवन का एक मनहूस दिन मानते और उस मनहूस दिन को कभी भी अपने जीवन में आने का अवसर नहीं देते।
यही तो वह अबाध तप है जिसका फल ज्ञान एवं मुखरता के रूप में वक्ताओं एवं विद्वानों की जिह्वा पर सरस्वती के वास का विश्वास उत्पन्न करा देता है। चौबीसों घण्टों सरस्वती की उपासना में लगे रहिये, जीवन भर ब्राह्मी मंत्र एवं ब्राह्मी बूटी का सेवन करते रहिये, किन्तु स्वाध्याय किसी दिन भी न करिये और देखिये कि सरस्वती सिद्धि तो दूर पास की पढ़ी हुई विद्या भी विलुप्त हो जायेगी। सरस्वती स्वाध्याय का अनुगमन करती है, इस सत्य का सम्मान करता हुआ जो साधक उसकी उपासना किया करता है, वह अवश्य उसकी कृपा का भागी बन जाता है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति, मार्च १९६९ पृष्ठ २४
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