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Saturday 07, June 2025

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ज्ञान की प्राप्ति | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या Gyan Ki Prapti | Shraddheya Dr. Pranav Pandya पुस्तक :- जीवन पथ के प्रदीप

ज्ञान की प्राप्ति | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या Gyan Ki Prapti | Shraddheya Dr. Pranav Pandya पुस्तक :- जीवन पथ के प्रदीप

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कैसे बदले आध्यात्मिक चिकित्साह से चित के संस्कार :चित्त के संस्कारों की चिकित्सा| Adhyatmik Chikitsa

कैसे बदले आध्यात्मिक चिकित्साह से चित के संस्कार :चित्त के संस्कारों की चिकित्सा| Adhyatmik Chikitsa

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आत्मिक प्रगति का आधार संवेदना,सहानुभूति | Aatmik Pragati Ka Aadhar Samvedana, Sahanubhuti पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | ऋषि चिंतन के सानिध्य में

आत्मिक प्रगति का आधार संवेदना,सहानुभूति | Aatmik Pragati Ka Aadhar Samvedana, Sahanubhuti पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य | ऋषि चिंतन के सानिध्य में

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पंचकोश ध्यान साधना | Panch Kosh Jagran Dhyan Sadhana | Gurudev Pt Shriram Sharam Acharya

पंचकोश ध्यान साधना | Panch Kosh Jagran Dhyan Sadhana | Gurudev Pt Shriram Sharam Acharya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 07 June 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन | Samajik Kurutiyon Ka Unmulan

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अमृत सन्देश: योग किसे कहते हें | गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



आध्यात्मिकता के साथ योग और तप। योग और तप की दो धाराएं। योग और तप की दो धाराएं, और दोनों मिली हुई हैं। दोनों में से हम किसी को अलग नहीं कर सकते।
योग किसे कहते हैं? योग, बेटे, ध्यान को कहते हैं।
योग किसे कहते हैं? भावना की दृष्टि से आत्मा और परमात्मा को जो हम मिलाने का संकल्प करते हैं, उस वृत्ति का नाम योग है। हम दोनों को मिलाते हैं — अपनी आत्मा को परमात्मा से मिलाते हैं, शरणागत होते हैं, समर्पण करते हैं, भक्ति भावना से ओतप्रोत हो जाते हैं।
"यह क्या चीज़ कह रहे हैं आप?"
"
यह, बेटे, मैं वह कह रहा हूं — योग की बात कह रहा हूं तुझसे, जिसको मैंने अपनी शिक्षण पद्धति में ब्रह्मविद्या के नाम से कहा है।"

योग यह भावनात्मक उछाल है, भावनात्मक उबाल है। भावनाओं को हम परिष्कृत करेंगे, श्रेष्ठ करेंगे, भावनाओं को उज्ज्वल बनाएंगे, भावनाओं को पवित्र बनाएंगे, भावनाओं को कोमल बनाएंगे, भावनाओं को संवेदनशील बनाएंगे — ताकि हमारी भावनाएं वैसी हो जाएं, जिसमें कि हम ब्रह्म से मिल सकने के लायक जीवात्मा को मिला सकें। हम इसलिए इतना कोमल अपने आप को बनाएंगे कि जितना दम, और हम अपने आप को इतना गर्म करेंगे कि जितना ब्रह्म। दोनों को एक ही क्वालिटी का मिलाकर के, हम साथ-साथ मिला देंगे और हम दोनों जुड़ने की कोशिश करेंगे।

पानी, पानी मिल सकता है दूध में।
"नहीं साहब, यह मिला दीजिए।"
"क्या मिला दें?"
"
यह पत्थर का चूरा?"
"
यह नहीं मिलेगा। यह पत्थर का चूरा नहीं मिल सकता। हाँ, दूध में कुछ मिलाना है तो पानी मिल सकता है। लिक्विड, लिक्विड भी मिल सकता है।"
"नहीं साहब, ऐसे ही कुछ मिला दीजिए। आप तो यह मिट्टी का तेल मिला दीजिए।"
"बेटे, मिट्टी के तेल की परत आ जाएगी ऊपर, पानी नीचे रह जाएगा।"
"नहीं साहब, मिला दीजिए।"
"नहीं मिल सकता। पानी भारी और मिट्टी का तेल हल्का है — दोनों नहीं मिल सकते।"

ब्रह्म और जीव को मिलाने के लिए अपनी संवेदनाओं को, अपनी विचारणाओं को, अपनी मन:स्थिति को हम कोमल बनाते हैं, नम्र बनाते हैं, शीलवान बनाते हैं, चरित्रवान बनाते हैं, दिव्य बनाते हैं — जिसका नाम योग है।

"तो फिर महाराज जी, योग से सिद्धि मिल जाएगी?"
"
नहीं, योग से सिद्धि नहीं मिलेगी। योग का एक और भाई है। भाई को लेकर के तू नहीं चलेगा, तो सिद्धि नहीं मिलेगी। मैं बताये देता हूं तुझे।"
"महाराज जी, मैं खूब समाधि लगाया करूंगा, ध्यान लगाया करूंगा।"
"बेटे, तो नहीं मिलेगी। हम कह रहे तुझसे — उसका एक और सहायक है, उसको लेके चल।"
"सहायक कौन सा?"
"
उसका नाम है तप।"

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अखण्ड-ज्योति से




 ध्यान भूमिका की साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निश्चेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है। ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ प्रशस्त करती है।

 मन मस्तिष्क को ढीला करने वाली उन्मनी मुद्रा यह है कि इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश, नीचे नील जल स्वयं अबोध बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए तैरना अपने पैर का अँगूठा अपने मुख से चूसना, इस प्रकार का प्रलय चित्र बाज़ार में भी बिकता है। मन को शान्त करने की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही उपयुक्त है संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु , हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं, सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है- यह मान्यता प्रगाढ़ होने पर मन के लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता।

 अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़दौड़ की कोई गुँजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अँगूठे में से निसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा में आस्था पूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग के लिए नितान्त आवश्यक है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ध्यानयोग का चुम्बकत्व ही आत्मा और परमात्मा की प्रगाढ़ घनिष्ठता को विकसित करके द्वैत को अद्वैत बनाने में सफल होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन संयोग जितना गहरा होगा उतना ही परस्पर लय होने की-सम्भावना बढ़ेगी इस एकता के आधार पर ही बिन्दु को सिन्धु बनने का अवसर मिलता है। जीव के ब्रह्म बनने का अवसर ऐसे ही लय समर्पण पर एकात्म भाव पर निर्भर रहता है।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति मार्च 1973 पृष्ठ 50

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