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Media   >   Social Media   >   Daily Update

Saturday 07, June 2025

शुक्ल पक्ष द्वादशी, जेष्ठ 2025




पंचांग 08/06/2025 • June 08, 2025

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), ज्येष्ठ | द्वादशी तिथि 07:18 AM तक उपरांत त्रयोदशी | नक्षत्र स्वाति 12:42 PM तक उपरांत विशाखा | परिघ योग 12:17 PM तक, उसके बाद शिव योग | करण बालव 07:18 AM तक, बाद कौलव 08:29 PM तक, बाद तैतिल |

जून 08 रविवार को राहु 05:28 PM से 07:12 PM तक है | चन्द्रमा तुला राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 5:20 AM सूर्यास्त 7:12 PM चन्द्रोदय 4:49 PM चन्द्रास्त 3:24 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु ग्रीष्म

 

  1. विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
  2. शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत - ज्येष्ठ
  4. अमांत - ज्येष्ठ

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष द्वादशी   - Jun 07 04:48 AM – Jun 08 07:18 AM
  2. शुक्ल पक्ष त्रयोदशी   - Jun 08 07:18 AM – Jun 09 09:36 AM

नक्षत्र

  1. स्वाति - Jun 07 09:39 AM – Jun 08 12:42 PM
  2. विशाखा - Jun 08 12:42 PM – Jun 09 03:31 PM


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क्या सभी धनवान लोग समान होते हैं? : तीन प्रकार के धनिक | Pragya Puran Motivational Story

क्या सभी धनवान लोग समान होते हैं? : तीन प्रकार के धनिक | Pragya Puran Motivational Story

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ईश्वर-भक्ति और जीवन-विकास | Eswar_bhakti_our_Jeevan_vikas

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कठिनाइयों से डरिए नहीं लड़िए (भाग 02)

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समय का सदुपयोग | Samay Ka Sadupyog

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आहार-शुद्धि साधना की प्रथम सीढ़ी : अन्नमय कोश की सरल साधना पद्धति Part-01 | गायत्री की पंचकोशी साधना

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अमृतवाणी:-  एकांत साधना Ekant Sadhna

अमृतवाणी:- एकांत साधना Ekant Sadhna

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बाल विवाह भी एक सामाजिक कुरीति | Bal Vivah Bhi Ek Samajik Kuriti

बाल विवाह भी एक सामाजिक कुरीति | Bal Vivah Bhi Ek Samajik Kuriti

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गुरु चेतना के प्रकाश में स्वयं को परखें : गुरु के प्रकाश में स्वयं को पहचाने  शिष्य संजीवनी | Shishya Sanjeevani लेखक:- श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या जी

गुरु चेतना के प्रकाश में स्वयं को परखें : गुरु के प्रकाश में स्वयं को पहचाने शिष्य संजीवनी | Shishya Sanjeevani लेखक:- श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या जी

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 June 2025

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!! शांतिकुंज दर्शन 08 June 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 08 June 2025 !!

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!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 June 2025 !!

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!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 June 2025

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!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 June 2025 !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 08 June 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 08 June 2025 !!

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अमृतवाणी: जो मन से जीता वही विजेता हें पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



तप क्या चक्कर है? तप, बेटे, यही चक्कर है कि प्रत्येक अपनी वृत्ति को चैलेंज कर, चैलेंज कर, चैलेंज कर। शरीर को चैलेंज कर। शरीर क्या कहता है? यह कहता है हम आराम से सोएंगे, गर्मी बर्दाश्त नहीं करेंगे, ठंडक बर्दाश्त नहीं करेंगे। अच्छा-अच्छा, तेरी हुकूमत हमारे ऊपर है कि हमारी हुकूमत तेरे ऊपर है? हमारी हुकूमत पहले मंजूर कर, तब हम देखेंगे। तुझे जो कुछ भी बात कहेगा, तो हम तुझे मानेंगे। पहले हमारी हुकूमत मंजूर कर, तब बात करेंगे। हम हुकूमत चलाते हैं, इसलिए हम तुझे ठंडक पर रखेंगे। नहीं साहब, ठंडक में नहीं रहेंगे। रहना पड़ेगा। यह क्या है? तप। गर्मी में चल। अरे साहब, गर्मी में कैसे चलेंगे? नहीं, नंगे पैर चलना पड़ेगा। नंगे पैर परिक्रमा लगानी पड़ेगी। काहे की? गोवर्धन की। काहे की परिक्रमा लगवा दूं गोवर्धन की? नंगे पैर से क्या फायदा? नंगे पैर चल, चलना पड़ेगा। गरम बालू में चलना पड़ेगा, रेत में चलना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि हम तुझे "शू" बुलवा देंगे। "शू" बोल पहले, तब हम देखेंगे। पहले "शू" बोल, फिर हम तेरी बात सुनेंगे। तू हमारी हुकूमत मान, सिक्का मान। तू शरीर है हमारा। हमारी हुकूमत भी नहीं मानना चाहता? नहीं साहब, शरीर हमारे ऊपर हावी होता है और यह कहता है कि शरीर की मर्जी से मन को चलना पड़ेगा। नहीं, अब हमने यह कसम खाई है कि हमारा शरीर, हमारे मन की आज्ञा पर चलेगा। यह तो नहीं मानता है साहब! मानना पड़ेगा इसको, मानना पड़ेगा! मैंने हुकुम दिया — चल, आज तुझे यह करना पड़ेगा। आज हमने हुकुम दिया है किसको? अपने पेट को। क्या हुकुम दिया है? खाना नहीं मिलेगा। साहब, खाना नहीं खाएंगे तो पेट में भूख लगेगी! लगेगी साहब। खाना नहीं खाएंगे तो हमको नींद नहीं आएगी! नहीं आएगी। खाना नहीं खाएंगे तो क्या? आज एकादशी का उपवास है। एकादशी का उपवास है तो कुछ खा सकते... खा तो लें बेटे, खाने में क्या हर्ज है? अच्छा, ठीक है — यह नहीं खाएंगे तो पकौड़ी खा लेंगे। वह नहीं खाने देंगे तुझे। क्यों नहीं खाने देंगे तुझे? हमारा हुकुम मानना पड़ेगा तुझे। हमारा हुकुम मानना पड़ेगा तुझे। यह क्या चीज़ है? यह, बेटे, कड़ाई है। यह अनुशासन है। यह ऋषि वर्ण है। और कहना मानना पड़ेगा। अबाउट टर्न! राइट हील! लेफ्ट हील! सिपाही जब सारी की सारी कवायदें कर देता है, हुकुम देने के बाद, तब यह समझा जाता है कि मोर्चे पर जाने लायक है। अरे साहब, मोर्चे पर भेज दीजिए, वहां देखिएगा हमारे कमाल! वहां हम बंदूक चलाएंगे और वहां देखना — क्या-क्या हम कर-करके जोहर जाते हैं। हां, वहां तो आप जोहर करेंगे, पर यहां जो हम आपको हुकुम देते हैं, कौशल देते हैं — उनको पालन करके दिखाइए। नहीं साहब, यहां पर क्या फायदा? यहां कोई लड़ाई हो रही है क्या? जहां लड़ाई होगी, वहां करेंगे? नहीं, लड़ाई जहां नहीं होती, वहां क्या करेगा?

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अखण्ड-ज्योति से



  विचारक, मनीषी, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार वैज्ञानिक आदि अपनी कल्पना शक्ति को एक सीमित क्षेत्र में ही जुटाये रहने के कारण तद्विषयक असाधारण सूझबूझ का परिचय देते हैं और ऐसी कृतियाँ-उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर पाते हैं, जिन पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह एकाग्रता का चमत्कार है। बुद्धि की तीव्रता जन्मजात नहीं होती। वह चिन्तन को विषय विशेष में तन्मय करने के फलस्वरूप हस्तगत होती है।
        
  चाकू, उस्तरा जैसे औजारों को पत्थर पर घिस देने से वे चमकने लगते हैं और पैनी धार के बन जाते हैं। बुद्धि के संबंध में भी यही बात है। उसे तन्मयता की खराद पर खराद कर हीरे जैसा चमकीला बनाना पड़ता है। जिनका मन एक काम पर न लगेगा, जो शारीरिक, मानसिक दृष्टि से उचकते मचकते रहेंगे, वे अपना समय, श्रम बर्बाद करने के अतिरिक्त उपहासास्पद भी बनकर रहेंगे।

  प्रवीणता और प्रतिभा निखारने के लिए- प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए- एकाग्रता का सम्पादन आवश्यक है। शरीरगत संयम बरतने से मनुष्य स्वस्थ रहता और दीर्घ जीवी बनता है, उसी प्रकार मनोगत संयम-एकाग्रभाव सम्पादित करने से वह बुद्धिमान, विचारकों की गणना में गिना जाने लगता है।

 कछुए और खरगोश की कहानी बहुतों ने सुनी होगी, जिसमें अनवरत चलते रहने वाला उस खरगोश से आगे निकल गया था, जो अहंकार में इतराता हुआ अस्त-व्यस्त चलता था। वरदराज और कालिदास जैसे मूढ़मति समझे जाने वाले जब दत्तचित्त होकर पढ़ने में प्रवृत्त हुए तो मूर्धन्य विद्वान बन गये। यह तत्परता और तन्मयता के संयुक्त होने का चमत्कार है। बिजली के दोनों तार जब संयुक्त होते हैं तो करेण्ट बहने लगता है। गंगा और यमुना के मिलने पर पाताल से सरस्वती की तीसरी धारा उमड़ती है। ज्ञान और कर्म का प्रतिफल भी ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करता है। मन और चित्त के समन्वय से उत्पन्न होने वाली एकाग्रता के भी ऐसे ही असाधारण प्रतिफल उत्पन्न होते देखे गये हैं।

.... क्रमशः जारी
अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 4
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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