Thursday 07, August 2025
Sachhe saundharya ki khoj or sakshat kar
लातविया के राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान में पहली बार दिव्य यज्ञ, भारतीय संस्कृति की गूंज।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी के मार्गदर्शन में लातविया के National Botanical Garden में पहली बार एक दिव्य यज्ञ सम्पन्न हुआ। यह ऐतिहासिक आयोजन भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकृति को दर्शाता है। यज्ञ में लातविया की नव-नियुक्त भारतीय राजदूत श्रीमती नम्रता कुमार जी भी उपस्थित रहीं।
इस अवसर पर उत्तराखंड आपदा व हिरोशिमा-नागासाकी के हुतात्माओं को श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम में स्थानीय नागरिकों की सहभागिता और भारतीय तिरंगे के साथ खिंचवाए चित्र, भारतीय संस्कृति के प्रति उनके आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक रहे।
उत्तरकाशी जनपद के धराली क्षेत्र में 5 अगस्त को बादल फटने से भारी आपदा आई, जिससे कई परिवार प्रभावित हुए। इस दुखद अवसर पर श्रद्धेया शैलदीदी की अध्यक्षता में शांतिकुंज में आपदा प्रबंधन बैठक हुई और त्वरित राहत दल को उत्तरकाशी भेजने का निर्णय लिया गया।
आपदा प्रबंधन में प्रशिक्षित इन्द्रजीत सिंह के नेतृत्व में शांतिकुंज की टीम उत्तरकाशी रवाना हुई। श्रद्धेया शैलदीदी व डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए पीड़ितों को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। व्यवस्थापक योगेन्द्र गिरि जी ने बताया कि टीम स्थानीय प्रशासन के संपर्क में रहकर ज़रूरतमंदों को कपड़े, राशन व अन्य आवश्यक सामग्री पहुँचा रही है।
केदारनाथ, गुजरात व नेपाल जैसी आपदाओं में सेवा दे चुका शांतिकुंज का आपदा दल अब उत्तरकाशी के पीड़ितों की सहायता में जुटा हुआ है, सेवा, संवेदना व समर्पण की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए।
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एक आदमी ने एक पेंटर को बुलाया अपने घर, और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो !
वह पेंटर पेंट लेकर उस नाव को पेंट कर दिया, लाल रंग से जैसा कि नाव का मालिक चाहता था। फिर पेंटर ने अपने पैसे लिए और चला गया !
अगले दिन, पेंटर के घर पर वह नाव का मालिक पहुँच गया, और उसने एक बहुत बड़ी धनराशी का चेक दिया उस पेंटर को !
पेंटर भौंचक्का हो गया, और पूछा - ये किस बात के इतने पैसे हैं ? मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिया था !
मालिक ने कहा - ये पेंट का पैसा नहीं है, बल्कि ये उस नाव में जो "छेद" था, उसको रिपेयर करने का पैसा है !
पेंटर ने कहा - अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे, ठीक नहीं लग रहा है !
मालिक ने कहा - दोस्त, तुम समझे नहीं मेरी बात !अच्छा में विस्तार से समझाता हूँ। जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा तो जल्दबाजी में तुम्हें ये बताना भूल गया कि नाव में एक छेद है उसको रिपेयर कर देना !
और जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे उस नाव को समुद्र में लेकर नौकायन के लिए निकल गए !
मैं उस वक़्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर नौकायन पर निकल गए हैं !
तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है !
मैं गिरता पड़ता भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे। लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे !
अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो !
फिर मैंने छेद चेक किया, तो पता चला कि, मुझे बिना बताये तुम उसको रिपेयर कर चुके हो !
तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं !
मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं !
जीवन मे "भलाई का कार्य" जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो !
क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है।
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
प्रातः काल का जब सूर्य निकलता है, सुनहरे रंग का, सब में उमंग और नया उत्साह देखा जा सकता है। प्रातः काल में पक्षी चहचहाते हुए पेड़ों पर देखे जा सकते हैं, और हर आदमी की नींद खुलने लगती है। बच्चे उठने लगते हैं और सब आदमी अपने काम पर लग जाते हैं।
प्रातः काल होते ही हर एक के भीतर उमंग और हर एक के भीतर हलचल। एक प्रातः काल, एक ऐसा प्रातः काल, नया प्रारंभ होने जा रहा है। रात्रि मालूम पड़ता है कि समाप्त होने को आ गई, मालूम पड़ता है कि अब नया दिनमान शुरू होने वाला है। और नया दिन हमारे लिए भेजा गया है।
हम और आप जिन दिनों में रह रहे और जी रहे हैं, उसमें प्रातः काल का समय महत्वपूर्ण है। प्रातः काल की स्वर्णिम उषा का चिन्ह हमने आपके शरीर पे पहना दिया है। आप संदेश वाहक हैं इस मिशन के।
यह इस बात की घोषणा करती है कि अब नया युग चला आ रहा है। अब समय बदल रहा है, युग बदल रहा है, वक्त बदल रहा है, मनुष्य बदल रहा है, परिस्थितियाँ बदल रही हैं।
जिन परिस्थितियों में और जिस ढंग से हम बहुत दिनों से चले आ रहे हैं, अब उसी ढंग में हमारा गुजारा नहीं हो सकता। अब हमको नई परिस्थितियों में निवास करना पड़ेगा।
विज्ञान ने जिस हिसाब से तरक्की की है, उसी हिसाब से दुनिया बहुत नजदीक आ गई है। नजदीक आ गई है। थोड़े घंटे में, थोड़े घंटे में अमेरिका से लेकर के पाताल लोक से लेकर के हम यहाँ आना चाहें तो 24 घंटे के भीतर आ जाते हैं।
और टेलीफोन से कभी बात करना चाहें तो इंग्लैंड और अमेरिका से हम 15 मिनट के भीतर अभी-अभी बात कर सकते हैं। पहले बात हो सकती थी? नहीं, पहले नहीं हो सकती थी।
अब यह दुनिया विज्ञान ने बहुत नजदीक लाकर रख दी है, इतनी नजदीक लाकर के रखी है। अब हमारे लिए नए ढंग से विचार करना आवश्यक है।
पुराने ढंग से विचार करके अब हम जिंदा नहीं रह सकते। नई परिस्थितियों का हमको मुकाबला करना पड़ेगा और मनुष्य को ढलना पड़ेगा। और समय को ढलना पड़ेगा।
जो ढलना है और जो बदलना है, उसकी तैयारी के लिए, तैयारी के लिए आप अग्रदूत की तरीके से आगे-आगे काम करते हैं, तो आपका बड़ा सौभाग्य है और बड़ा महत्व है।
अखण्ड-ज्योति से
किसी भी कार्य की सिद्धि में आलस्य सबसे बड़ा बाधक है, उत्साह की मन्दता प्रवृत्ति में शिथिलता लाती है। हमारे बहुत से कार्य आलस्य के कारण ही सम्पन्न नहीं हो पाते। दो मिनट के कार्य के लिए आलसी व्यक्ति फिर करूंगा, कल करूंगा-करते-करते लम्बा समय यों ही बिता देता है। बहुत बार आवश्यक कार्यों का भी मौका चूक जाता है और फिर केवल पछताने के आँतरिक कुछ नहीं रह जाता।
(1) सात्विक सीमित आहार। जिससे पेट तनकर भारा रखने के कारण आलस्य प्रमाद न सताये। दूसरे अन्न के अनुरूप मन बने और भगवान में रुचिपूर्वक लग सके। अभक्ष्य, अनीति उपार्जित धान्य खाने से मन उद्विग्न एवं चंचल बनता है और भगवत् प्रसंग से हटकर बार बार दूर भागता है।
(2) वाक् संयम। कटु वचन, मिथ्या भाषण, असत्य मखौल जैसे भ्रष्ट वचन न बोलकर वाणी को इस योग्य बना लेना जिससे किया हुआ नाम स्मरण सार्थक हो सके।
(3) इन्द्रिय निग्रह- चटोरापन, कामुकता, मनोरंजक दृश्य देखने की चंचलता, संगीत आदि आकर्षणों की ओर दौड़ पड़ना जैसे चित्त को चंचल बनाने वाले उपक्रमों से दूर रहना। उन आकर्षणों के लिए उमंगें उठती हों तो उन्हें रोकना।
(4) स्वाध्याय और सत्संग का सुयोग बनाते रहना जिससे भगवद् भक्ति में श्रद्धा विश्वास बढ़े। जमे हुए संचित कुसंस्कारों के उन्मूलन का क्रम चलता रहे। उनके आधार पर ही लोभ मोह का दुष्परिणाम विदित होते हैं। उच्चस्तरीय चिन्तन मनन से ही मन की भ्रष्टता का निराकरण होता है।
माता पिता के निकट जाना या उनकी गोदी में बैठना किसी बच्चे के लिए कठिन नहीं होना चाहिए। यह सरल है और स्वाभाविक भी। भगवान के साथ मनुष्य का घनिष्टतम सम्बन्ध है। आत्मा परमात्मा से ही उत्पन्न हुई है। उसके साथ सम्बन्ध बनाये रहने से कोई मनुहार करने या अनुदान देने की आवश्यकता नहीं है। अनुनय विनय तो परायों से करनी पड़ती है। भेंट पूजा तो उनकी जेब में डालनी पड़ती है जिनसे कोई अनुचित प्रयोजन सिद्ध करना है।
बालक की जितनी उत्कण्ठा अभिभावकों की गोदी में चढ़ने की होती है उसकी तुलना में माता-पिता भी कम उत्सुक आतुर नहीं होते। पर इस प्रयोजन की पूर्ति में एक ही व्यवधान अड़ जाता है- बालक का शरीर गन्दगी से सना होना। मल मूत्र से बच्चे ने अपना शरीर गन्दा कर लिया हो और गोदी में चढ़ने का आग्रह कर रहा हो तो माता मन को कठोर करके उसे रोकती है, पहले स्नान कराती, पोछती और सुखाती है। उसके उपरान्त ही छाती से लगाकर दुलार करती और दूध पिलाती है। उसे अपना शरीर गन्दा और दुर्गन्धित होने का भय जो रहता है। विलम्ब का व्यवधान उसी कारण अड़ता है। यह विलम्ब बच्चे के हित में भी है और माता के हित में भी।
भगवद् भक्त कहलाने के लिए साधक को इस योग्य बनाना पड़ता है जिससे पास बिठाने वाले की भी निन्दा न हो। जिन अधम और अनाचारियों को भगवत् अनुग्रह प्राप्त हुआ है उन सभी को अपने दुर्गुणों का परिशोधन करना पड़ता है। इसके बिना अब तक किसी को भी उपासना का आनन्द नहीं मिला। परिशोधन भक्त की अनिवार्य कसौटी है। उसका श्रेय चाहे भक्त स्वयं ले ले या भगवान को दे दे। पर है इस प्रक्रिया की हर हालत में अनिवार्यता। मनुष्य एक ओर तो अनाचाररत रहे और दूसरी और उथले कर्मकाण्डों के बल पर ईश्वरीय अनुकम्पा का आनन्द लेना चाहे तो उसे अब तक की परम्परा और शास्त्र मर्यादा के सर्वथा प्रतिकूल ही समझना चाहिए। श्रीमद् भागवत् में इसी तथ्य को उपासना प्रेमियों के सम्मुख उद्घाटित किया है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1985 पृष्ठ 26
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