Friday 07, November 2025
उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जनपद में अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज की ओर से आयोजित होने वाली भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा शुक्रवार को सोलह केंद्रों पर संपन्न हुई। परीक्षा में पांचवीं से बारहवीं कक्षा तक के लगभग एक हजार से अधिक छात्र छात्राओं ने प्रतिभाग किया। ओएमआर सीट पर परीक्षा देकर बच्चों ने प्रतियोगी परीक्षाओं का पहली बार अनुभव किया। सामान्य ज्ञान के साथ देश के ऐतिहासिक, सामाजिक शिक्षाओं से जुड़े प्रश्न परीक्षा में देखने को मिले। परीक्षा में सुचिता को बनाए रखने के लिए परीक्षा केंद्र विद्यालय के कक्ष निरीक्षकों के साथ ही गायत्री परिवार के स्वयंसेवकों ने परीक्षा निरीक्षण का कार्य किया। परीक्षा आयोजन के एक माह बाद परिणाम शांतिकुंज केंद्र से जारी किया जाएगा साथ ही परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को जनपद व विद्यालय स्तर पर सम्मानित किया जाएगा। परीक्षा में प्रतिभाग करने वाले समस्त प्रतिभागियों को केंद्र शांतिकुंज की तरफ से प्रमाण पत्र भी निर्गत किया जाएगा।
परीक्षा का आयोजन जनपद के बाल गोविंद सरस्वती विद्याश्रम भरवारी, भवंस मेहता विद्याश्रम, हुबलाल इंटरमीडिएट कॉलेज, नेशनल इंटर कॉलेज, कृषक इंटर कॉलेज हिनौता, रानी देवी इंटर कॉलेज भगत का पूरा, जेसीएस इंटर कॉलेज पचामा बैरमपुर, एस ओ कॉन्वेंट इंटर कालेज सिरसा, उदय प्रकाश इंटर कॉलेज , उच्च प्राथमिक विद्यालय मलाक नागर आदि विद्यालयों में हुआ।
जनपद में परीक्षा संचालन में जिला संयोजक भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा श्री राम सनेही, परीक्षा केंद्र के शिक्षकगण व प्रमुख रूप से प्रवेश केसरवानी, अजीत कुशवाहा, राम चंद्र, ज्ञानेश्वर त्रिपाठी, अभिषेक जायसवाल, शिव प्रसाद, आयुष साहू, सौरभ वर्मा, आकाश कुमार, दीपक आदि रहें।
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अमृतवाणी:- भारत से उठी यह लहर पूरी दुनिया को जगा देगी! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अब दुनिया को एक दुनिया बनकर रहना पड़ेगा, वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांतों के ऊपर चलना पड़ेगा। दुनिया को एक राष्ट्र के रूप में, दुनिया को एक भाषा-भाषी होने के रूप में, दुनिया को एक धर्म और संस्कृति का अनुयायी होने के रूप में, दुनिया को एक व्यवस्था के अंतर्गत अपने कानून और नियम बनाने के रूप में अगले दिनों एक ऐसी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी, जो बहुत शानदार होगी और जिसमें सब ओर से सुख और शांति भरी हुई पड़ेगी।
ऐसी व्यवस्था कहाँ से आएगी, आप जानते हैं क्या? ऐसी व्यवस्था सिर्फ भारतीय संस्कृति में है, जिसको हम देव संस्कृति कहते हैं। देव संस्कृति की यह विशेषता रही है, जिसने इंसान की मनःस्थिति को ऐसा बनाया, इंसान के चरित्र, चिंतन और व्यवहार को ऐसा बनाया कि जिससे सारी दुनिया में शांति आए।
मनःस्थिति के हिसाब से ही तो परिस्थिति आती हैं। अच्छी परिस्थिति लाने के लिए लोगों की मनःस्थिति को अच्छा बनाना बहुत ज़रूरी है। यह काम धर्म का है, यह काम अध्यात्म का है, यह काम संस्कृति का है। और कौन सी संस्कृति का? जिसको इंसानी संस्कृति कहिए, मानवीय संस्कृति कहिए। उसी को पुराने लोग भारतीय संस्कृति कहते हैं। यह वास्तव में मानवीय संस्कृति है, किसी देश की संस्कृति नहीं है।
इसका विस्तार होने का अब समय आ गया है। पहले दिन ऐसे शानदार आएंगे कि भारतीय संस्कृति हर जगह बहुत विस्तार से फैलेगी और वह भारतीयों को श्रेय देकर के सारे दुनिया के लोगों को सही रास्ते पर चलाने के लिए मजबूर कर देगी। यह दिन दूर नहीं, बिल्कुल नज़दीक आ गए।
नज़दीक आ गए हो, यह रहा है कि भारत भूमि में उसका इस तरीके से प्रकाश फैल रहा है, मानो किसी ने पहले से स्कीम बना कर रखी हो। उषाकाल आता है, कोई तैयारी करता है क्या? उदय हो तो ब्रह्म मुहूर्त आता है, कोई तैयारी करता है क्या? पूरब में से लाल रंग के बादल निकलते हुए सूर्य उदय दिखता है, कोई तैयारी करता है क्या? इंसान की तैयारी नहीं है, यह भगवान की तैयारियाँ हैं। और भगवान की तैयारियों के परिणामस्वरूप यह होता है कि थोड़े ही समय में सब जगह उजाला और अंधकार का पता नहीं चलता, चोरों का पता नहीं चलता, उल्लुओं का पता नहीं चलता, चमगादड़ों का पता नहीं चलता, अंधियारे का पता नहीं चलता, जो सोने वालों की खुमारी का पता नहीं चलता। हर जगह जागृति की लहर उमड़ती दिखाई पड़ती है।
ठीक इसी तरीके से अब जागृति की लहर यहाँ से भारतवर्ष से चल पड़ी है। क्या वह भारतवर्ष तक सीमित रहेगी? न, सूरज सीमित कहाँ रहता है। पूरब से निकलता तो है, पर सीमित कब रहा। पूरब से चला सूरज फिर कहाँ से चला गया? ऊपर चढ़ता हुआ चला गया और सारी दुनिया को थोड़े ही समय में अंधेरे में से निकाल करके उजाले का मज़ा चखा दिया। यही होने जा रहा है।
भारतीय संस्कृति के फिर से उत्थान का समय नज़दीक आ गया। देव संस्कृति के द्वारा सतयुग को पुनः वापस लाने का समय निकट आ गया। यह उन लोगों को चुनौतियाँ हैं, जिन्होंने कि समय को बर्बादी इस तरीके से ला दिया, जिससे कि इंसान की बर्बादी होकर रहे। जिन्होंने एटम बम बनाए, जिन्होंने असमानताएँ पैदा कीं, जिन्होंने क्राइम को प्रोत्साहन दिया, जिन्होंने नशेबाजी को प्रोत्साहन दिया, जिन्होंने आपाधापी को प्रोत्साहन दिया, जिन्होंने गंदी फिल्में बनाई, जिन्होंने इस तरह के रिवाज चलाए जिससे कि इंसान तबाह होने ही जा रहा है।
अब उन लोगों को चुनौती है। यह किनकी ओर से? भगवान की ओर से, प्रज्ञा अवतार की ओर से, नए युग की ओर से। कि बिल्कुल अब नज़दीक आ गया। नज़दीक आ गया। इसकी जिम्मेदारी भारत ने संभाली है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
गायत्री के ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इस प्रथम पाद की शिक्षा यह है कि सर्वत्र तीनों लोकों में परमात्मा व्याप्त है। इसलिए उसको सर्वव्यापी एवं निष्पक्ष न्यायकारी समझकर पापों से उसी प्रकार बचना चाहिए जैसे कि राजा को सामने खड़ा देखकर चोर को चोरी करने का साहस नहीं होता। इसके अतिरिक्त सब में जब अपना आत्मा, अपना प्रभु ही व्यापक है, तो किसी के साथ अनुचित, अनीतिपूर्ण, अनिष्ट व्यवहार न करना चाहिए। हम अपने लिए जैसा व्यवहार दूसरों द्वारा होने की आशा करते हैं, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिए। दूसरों के हितों को आघात पहुँचाकर अपना स्वार्थ साधन करने की नीति से हमें प्रयत्न पूर्वक बचना चाहिए।
यह प्रकट है कि संसार में अधिकाँश दुःख हमारे पापों के परिणामस्वरूप होते हैं। कई बार कर्मफल तुरन्त मिल जाता है, जिसके साथ बुराई की गई है उसके द्वारा प्रत्याक्रमण द्वारा, सामाजिक अपकीर्ति द्वारा, लोगों के असन्तोष एवं असहयोग के कारण होने वाली हानि द्वारा, राजदंड द्वारा उस बुराई का दंड मिल जाता है। इनसे भी कोई व्यक्ति बच जाय तो ईश्वरीय निष्पक्ष न्याय द्वारा प्राप्त होने वाले दंड से कोई बच नहीं सकता।
अंग-भंग, अपूर्ण, रोग ग्रस्त, हीन बुद्धि लोगों को देखकर यह सहज की अनुमान लगाया जा सकता है कि इनको दैवी दण्ड भुगतना पड़ रहा है। अपना कर्तव्य ठीक प्रकार पालन करते हुए भी कई बार अनायास कोई आकस्मिक दैवी विपत्ति आ जाती है या प्रयत्न करते हुए भी सफलता नहीं मिलती तो यही कहना पड़ता है कि यह हमारे पूर्व कृत कर्म का, प्रारब्ध का फल है।
यदि मनुष्य पाप कर्मों से बचा रहे तो निश्चय ही वह दुखों से बचा रहेगा। यद्यपि दुखों के अन्य कारण भी हैं। निर्दोष व्यक्ति भी कभी कभी अत्याचारियों द्वारा सताये जाते हैं या सामूहिक दोषों का फल भी व्यक्ति को भोगना पड़ता है, परन्तु यह बात ध्रुव सत्य है कि पाप का परिणाम तो दुःख ही हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति पाप न करे, तो उसके प्रारब्ध में दुखों का विधान, किस प्रकार हो सकता है?
काँटे में लिपटी हुई आटे की गोली खाते समय मछली अपने आपको बुद्धिमान समझ सकती है कि मुफ्त में ही मैंने इतना आटा पा लिया। जाल में फैले हुए दानों को खाते समय चिड़िया गर्व कर सकती है कि मैंने बिना परिश्रम के एक स्थान पर पड़ा हुआ इतना अन्न सहज ही पा लिया, पर उसे थोड़ी ही देर में अपनी भूल का पता चल जाता है। आटे की गोली के साथा पेट में पहुँचा हुआ काँटा जब मछली का पेट फाड़ता है तब उसे मालूम पड़ता है कि मैं बुद्धिमान हूँ या नहीं।
चिड़िया जब जाल में फँसकर बहेलिए के हाथ में पहुँचती है, तब उसे मालूम पड़ता है कि मैं चतुर एवं सौभाग्य शाली हूँ या नहीं? पापी लोग जब जरा से प्रयत्न से बहुत सा लाभ कमा लेते है तो फूले नहीं समाते। धर्म अधर्म के पचड़े से बचकर अपना काम बना लेने की चतुरता पर उन्हें गर्व होता है। पर जब उन कर्मों का प्रारब्ध भोग कराल काल दण्ड की तरह उनके पीछे पड़ता है, तब उनकी समझ में आता है कि वे उस दिन कमा रहे थे या गँवा रहे थे, वे चतुर थे या फूहड़, उनने बुद्धिमानी का मार्ग चुना था या बेवकूफी का।
अखण्ड ज्योति 1951 अगस्त
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