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Media   >   Social Media   >   Daily Update

Friday 07, March 2025

शुक्ल पक्ष नवमी, फाल्गुन 2025




पंचांग 08/03/2025 • March 08, 2025

फाल्गुन शुक्ल पक्ष नवमी, पिंगल संवत्सर विक्रम संवत 2081, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | नवमी तिथि 08:16 AM तक उपरांत दशमी | नक्षत्र आद्रा 11:28 PM तक उपरांत पुनर्वसु | आयुष्मान योग 04:24 PM तक, उसके बाद सौभाग्य योग | करण कौलव 08:17 AM तक, बाद तैतिल 07:57 PM तक, बाद गर |

मार्च 08 शनिवार को राहु 09:33 AM से 11:00 AM तक है | चन्द्रमा मिथुन राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:39 AM सूर्यास्त 6:16 PM चन्द्रोदय 12:37 PM चन्द्रास्त 3:33 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत

 

  1. विक्रम संवत - 2081, पिंगल
  2. शक सम्वत - 1946, क्रोधी
  3. पूर्णिमांत - फाल्गुन
  4. अमांत - फाल्गुन

तिथि

  1. शुक्ल पक्ष नवमी   - Mar 07 09:18 AM – Mar 08 08:16 AM
  2. शुक्ल पक्ष दशमी   - Mar 08 08:16 AM – Mar 09 07:45 AM

नक्षत्र

  1. आद्रा - Mar 07 11:32 PM – Mar 08 11:28 PM
  2. पुनर्वसु - Mar 08 11:28 PM – Mar 09 11:55 PM


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SHRAVAN
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प्रतिभावान युवाओं की युग निर्माण में भागीदारी Yuvaon Ki Yug Nirnaam Me Bhagidari |

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देवपूजन किसे कहते हैं? Devpoojan Kise Kehte Hai

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 08 March 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



गुरु की कितनी कीमत होती है, तुझे मालूम है? गुरु का वजन जानता है तू? यह कितना गुरु होता है? शिष्य किसे कहते हैं, जानता है तू? हमसे पूछ, हमारे प्राण निकाल दिए गुरु ने कि नहीं? अरे, से पूछ किसे गुरु कहते हैं। नहीं, सवा रुपया में गुरु खरीदता बकता है, पागल कहीं का! मित्रों, क्या होता रहता है? हम तो भगवान के बारे में शब्द, हमको याद है। अल्लम गल्लम, अल्लम गल्लम, अल्लम गल्लम, जाने क्या-क्या बकते रहते हैं, जाने क्या बकते रहते हैं सारे दिन! असल में भगवान की जानकारी हो, जिसमें श्रद्धा और विश्वास जुड़ा हुआ हो, तो भगवान पैदा किया जा सकता है, पैदा। हां, कहीं से पैदा कर सकते हैं भगवान को। भगवान आ सकता है। भगवान तो बेटे, बहुत काम में बिजी है। और असली भगवान तो उसको कहते हैं परब्रह्म, जो हमारे चिंतन से बाहर है, जो हमारी कल्पना से बाहर है, जो हमारी शक्ति से बाहर है, जो हमारी पहुंच से बाहर है। उसके पास तो मनुष्यों के 400 करोड़ तो मनुष्य पड़े हुए हैं, और मक्खी की कितनी होंगी? बता जरा, मच्छर कितने होंगे? बता जरा, कितने करोड़, करोड़, अरब, खरब, खरब, खरब प्राणी इस पृथ्वी पर भरे हुए हैं। फिर और प्राणियों के भरे होंगे। सबके न्याय करेगा, इंसाफ करेगा, देखभाल करेगा, सब के मुकदमे लड़ेगा, सबकी मनोकामनाएं पूरी करेगा, सब की भक्ति का हिसाब रखेगा। पागल हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा? भगवान, भगवान एक कायदे का नाम है, कानून का नाम है, एक नियम का नाम है, बस! भगवान एक कायदा है, भगवान एक कानून है, भगवान एक नियम है, भगवान एक मर्यादा है, बस, बस, इससे आगे नहीं है। भगवान फिर क्या हो सकता है? यह जो हमारे पास आता है, भला रात को सपने में दिखाई देता है, और जो हमको प्यार करता है, जो हमारे कर्मों का फल देता है, वह कौन है? वह बेटे, हमारा बनाया हुआ भगवान है, जिसका नाम है ईश्वर। ईश्वर हमारा बनाया हुआ है। परब्रह्म संज्ञा है, परब्रह्म दृष्टा है, साक्षी है, कल्पना से बाहर है, नेति नेति इसके लिए कहा गया है। वह केवल एक, एक नियम है जो सारे विश्व में समाया हुआ है, चेतना का समुद्र है, सारे विश्व में समाया हुआ है। हमारा भगवान, हम ने बनाया है।

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अखण्ड-ज्योति से



कितने ऐसे मनुष्य हैं जो संसार के किसी पदार्थ से प्रेम नहीं करते, उनके भीतर किसी भी मौलिक वस्तु के प्रति सद्भाव नहीं होता। वे निर्दय, निर्भय, निष्ठुर होते हैं। निस्संदेह वे अनेक प्रकार की कठिनाइयों से, मुसीबतों से, बच जाते हैं, किन्तु वैसे तो निर्जीव पत्थर की चट्टान को भी कोई शोक नहीं होता, कोई वेदना नहीं होती, लेकिन क्या हम सजीव मनुष्य की तुलना पत्थर से कर सकते हैं?

 जो वज्र वत कठोर हृदय होते हैं, नितान्त एकाकी होते हैं, वे चाहे कष्ट न भोगें पर जीवन के बहुत से आनन्दों का उपभोग करने से वे वंचित रह जाते हैं। ऐसा जीवन भी भला कोई जीवन है? वैरागी वह है जो सब प्रकार से संसार में रह कर, सब तरह के कार्यक्रम को पूरा कर, सब की सेवा कर, सबसे प्रेम कर, फिर भी सबसे अलग रहता है।’

 हम लोगों को यह एक विचित्र आदत सी पड़ गई है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने पड़ते हैं, जो भी कठिनाइयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिए हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरे के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यह हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं। यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायेगा कि यदि हम स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आप का वास असंभव था। हम बुरे हैं तो संसार भी बुरा प्रतीत होगा लेकिन लोग वैराग्य का झूठा ढोल पीटकर अपने को अच्छा और संसार को बुरा बताने की आत्म वंदना किया करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड-ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 5

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