Friday 08, May 2026
क्या पैसे से संस्कार खरीदे जा सकते हैं? Kya Paise Se Sanskar Kharide ja Sakte hain? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृत सन्देश:- दस सूत्री कार्यक्रम Dash Sutri Karyakram परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 08 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
आज की सबसे बड़ी समस्या। Aaj Ki Sabse Badi Samasya अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
परिवार शब्द मुझे बहुत प्यारा है परिवार शब्द क्यों प्यारा है परिवार शब्दों में कई संभावना जुड़ी हुई है इसलिए मुझे बहुत प्यारा है एक तो इसलिए इसलिए प्यारा है कि अगला वाला दिन जबकि सारे संसार का नया निर्माण होने जाएगा तब उसके सिद्धांत क्या होंगे आदर्श क्या होंगे गतिविधियां क्या होगी क्रियाकलाप क्या होगा निर्धारण क्या होंगे इन प्रश्नों का उत्तर एक ही है कि कुटुंब कौटुंबिकता पारिवारिकता पारिवारिकता अगले अगले दिनों इस संसार का लक्ष्य होगा और क्रियाकलाप होगा इसके बिना संसार चल नहीं पाएगा हर आदमी अपनी आपाधापी में आपाधापी आपाधापी आपाधापी में आपाधापी जिस घर में फैलती है आपने देखा नहीं क्या हाल हो जाता है बच्चे जेवर चुरा कर भाग जाते हैं औरतें अपने जेवर अपने मायके दे आती हैं लड़कियां काम नहीं करती बहुएं झगड़ती रहती हैं अलग होकर के रहेंगे बेटे अलग कुछ काम करते हैं और वहां से दुकान की दुकान की गद्दी में से पैसे चुरा कर ले जाते हैं आपने देखा नहीं है किस तरीके से आपाधापी से कुटुंब बर्बाद हो जाते हैं आपाधापी से कुटुंब बर्बाद हो जाते हैं तो दुनिया क्या बर्बाद नहीं होगी आज दुनिया के सामने जिसको हम नवयुग की समस्याएं कहते हैं बहुत से काम बहुत सी बातें सामने हैं बहुत फजीहत हैं बहुत बहुत कठिनाइयां है बहुत दिक्कतें हैं इतनी सारी दिक्कतें हैं जो सुनने में और समझने में पहाड़ जैसे मालूम पड़ती है और करने में तो ऐसी मुश्किल मालूम पड़ती है कि इसका शायद समाधान संभव ही नहीं है ऐसा मालूम पड़ता है दुनिया की समस्याओं के बाबत लेकिन मित्रों आपको विचार ही करना पड़ेगा और उसके समाधान पर विचार ही करना पड़ेगा
अखण्ड-ज्योति से
अखण्ड-ज्योति परिजनों ने लम्बे समय से जो पढ़ा और समझा है अब उसे मस्तिष्क की उथली परतों तक सीमित न रहने देकर अन्तराल की गहराई में उतरना चाहिए और भुलकर आगत के सम्बन्ध में नई नीति निर्धारण कर सकने योग्य विवेक एवं साहस जुटाना चाहिए।
समस्याएं जानी पहचानी हैं। समाधान भी प्रायः सभी विचारवानों को विदित हैं। फिर से उस सर्न्दभ में अधिक ध्यान देने के लिए इसलिए कहा जाता है कि तथ्यों पर जिस हलके ढंग से विचार किया जाता रहा है वह अपर्याप्त है। ढर्रे आवरण उठाकर हमें वास्तविक को देखना चाहिए। इसी को तत्वदर्शन या ईश्वर दर्शन कहतें हैं। इसी का नाम आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म निर्वाण है। ढर्रे का अभ्यास ही भव बन्धन है। माया अर्थात् आवास्तविकता की खुमारी। इसे हटाया और तथ्य को अपनाया जा सके तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति के मार्ग का अवरोध मिट गया।
मनुष्य जीवन ईश्वर का बहुमूल्य अनुदान है। इसे इनाम नहीं अमानत माना जाय। भव-बन्धनों के कुचक्र से निवृति, पर्णता की प्राप्ति-र्स्वग और मुक्ति की उपलब्धि-सिद्धियों की विभूति आत्मा और परमात्मा की एकता है कि यर्थर्थता को हृदयंगम करना सम्भव हो सका या नहीं ?
कहने सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का लाभ एवं चमत्कार मात्र उन्हीं को मिलता है जो उसे कल्पना लोक की उड़ान न मानकर जीवन-दर्शन के रुप में मान्यता देते और नदनुरुप दिशा धारा का निर्धारण करते हैं।
युग-सन्धि की ब्रह्म वेला में जागृत आत्माओं का आत्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन की यथार्थत के साथ जुड़ सके तो काम चले। सोचा जाय कि अन्य प्राणीयों की तुलना में मनुष्य को जो ‘विशेष’ मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है ? विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के-पूर्णता तक पहुँचने के ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस र्स्वण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा ? लोग कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक एक करके गर्त में गिरने वानी भेड़ों की तरह अपनी भी दुर्गति ही होनी है। क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल
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