Saturday 09, May 2026
आप अपने बच्चे को क्या बना रहे हैं? Aap Apne Bachche ko Kya Bana Rahe Hain? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- गुरुदेव का दिव्य संदेश भक्ति नहीं, समर्पण चाहिए । पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 09 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
सिनेमा और समाज का असर बच्चों पर क्या हो रहा है? Cinema Aur Samaj Ka Asar Bachchon Par Kya Ho Raha Hai? अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
दुनिया बहुत छोटी हो गई है दुनिया दुनिया इतनी फैली हुई नहीं रही है जितना कि पहले जमाने में थी पहले जमाने में दुनिया बहुत फैली हुई थी और एक आदमी का दूसरे से कम से कम ताल्लुक था जो आदमी जहां रहते थे उन्हें के लोगों में बसते थे उन्हीं में खाते पीते थे उन्हीं की लड़ाई झगड़े से अपना ताल्लुक रखते थे बाकी सारी दुनिया में कहां क्या हो रहा है कुछ मालूम ही नहीं था कुछ मालूम ही नहीं था कहीं कहीं क्या हो रहा है कहीं क्या हो रहा है अपना काम दुनिया औरतों सी औरतों से इसके बारे में पूछते थे औरतें कहती थी घूंघट सारी सारी दुनिया तो घूंघट मारती है अरे बाबा सारी दुनिया कहां घुंघट मारती है नहीं साहब सारी दुनिया घूंघट मारती है हमी को आप मना करते हो अरे तो सारी दुनिया कहां मारती है बताइए ना बंगाल में मारती है कोई मद्रास में मारती है गुजरात में मारती है पंजाब में मारती है नहीं साहब सारी दुनिया मरती है सारी दुनिया कितनी छोटी थी सारी दुनिया इतनी छोटी थी जितना कि उसका मोहल्ला सारी सारी दुनिया इतनी छोटी थी जितना कि उसके पीहर और ससुराल के बीच का दायरा दुनिया इतनी छोटी थी ना कभी की बात है पुराने जमाने में दुनिया इतनी छोटी थी अब दुनिया छोटी कहां रही कहां तो दुनिया बहुत फैल गई बहुत नजदीक आ गई दुनिया की समस्याओं से आप चाहे कि हम बचे रह सकते हैं आप बच नहीं सकते आप सिनेमा की समस्याओं से बचेंगे क्या बचके दिखाइए जरा बचके दिखाइए आपका बच्चा हैप्पी कट बाल पहने फिरता है ना देखा नहीं आपने फिल्म फिल्म के गाने गाता फिरता है ना लड़का देखा है ना आपने और आपने यह नहीं पूछा बेटा तुम क्या करोगे बेटे क्या करोगे आपसे तो कहने की हिम्मत नहीं पड़ी है पर अपने दोस्तों से कहता फिरता है मैं तो फिल्म में एक्टर बनूंगा तो अपनी मम्मी के जेवर चुरा के भागा था ना हां साहब एक बार तो भागा था चुराके अच्छा कहां गया था बताइए मुंबई गया था मुंबई गया था क्योंगया था रे मुंबई बोला फिल्म में एक्टर बनूंगा तो फिल्म एक्टर के लिए मम्मी के जेवर क्यों चुरा ले गया था किराए भाड़े के लिए और दूसरे के लिए और तीसरे के लिए एक्टर बना नहीं साहब वहां फिल्म वालों ने कहीं जाने भी नहीं दिया घुसने भी नहीं दिया लौट के आ गया क्या होता है आप दुनिया से बचेंगे क्या बचके दिखाइए सिनेमा के असर से अपने बच्चे को बचा कर दिखाइए हम तो रामायण पढ़ेंगे गुरु दीक्षा दिला कर लाएंगे आप दिला ले जाइए गुरु दीक्षा हवा के जमाने की हवा को रोक लेना जरा जमाने की हवा से लड़की को रोकिये ना अपनी को लड़के को रोकिये लेना अपने को तब दाल रोटी का भाव मालूम पड़ेगा
अखण्ड-ज्योति से
थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरुप ही बदल सकता है जो लक्ष्य पथ पर चल सकने की असमर्थता विवशता बनकर सामने आती रहती है। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसमें फंसकर छटपटाती और जिस-तिस को दोष है। किन्तु जब अपना चिन्तन उलटती है तो अपने बुने जाले के धागो को समेटती, निगलती चली जाती है। निविड़ दीखने वाले बन्धन देखते-देखते साँझ के रंगीन बादलों की तरह अदृश्य होने लगते हैं।
सामान्यता मनुष्य जीवन की गरिमा का समुचित उपयोग विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने में योग दान देकर इस सुअवसर को सार्थक बनाने में ही है। पेट प्रजनन तक अन्यान्य प्राणियों को सीमित रहना शोभा देता है, मनुष्य को नहीं। अन्य प्रणियों को साधन समिति मिले हैं। उनकी शरीर संरचना और बौद्धिक क्षमता इतनी ही है कि अपना निर्वाह भर चला सकें। किन्तु मनुष्य तो सृष्टा का युवराज है उसे इतना मिला है कि अपनी विशेषताओं के सहारे उसे तनिक-सा श्रम मनोयोग लगाकर चुटकी बजाते उपार्जित कर सकता है और शेष विभूतियों से आत्म-कल्याण और लाक-कल्याण जैसे उच्च उद्दयश्यों की पूर्ति कर सकता है।
इस सुअवसर को ठुकरा कर जो तृष्णा, वासना का लोभ-मोह का अनावश्यक भार संजोते और ढोते है, उनकी समझदारी को किस तरह सराहा जाये? दल-दल में घुमते जाना और उसकी सड़न से खीझते ओर जक्ड़न से चीखते जाना, किसी का लादा हुआ नहीं, स्वयं ही अपनाया हुआ दुर्भाग्य है। यह अनिवार्य नहीं, अपना ही चयन है। कोई चाहे तो स्थिति को किसी भी समय बदल भी सकता है। इसके लिए बहुत करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मात्र दृष्टिकोण उलटना और कार्यक्रम बदलना पड़ता है। इस परिवर्तन से व्यवस्था बिगड़ती नहीं, वरन् और भी अच्छी बन जाती है। किन्तु उस अदूरदर्शिता को क्या कहा जाये जो अभ्यस्त ढर्रें के रुप में सिर से पैर तक लद गई है। कोई चाहे तो उसे सहज ही उतार भी सकता है।
माया छाया की तरह है वह आगे-आगे चलती और नेतृत्व करती है। किन्तु जब प्रकाश की ओर पीठ किये रहने की प्रक्रिया बदली जाती है, दिशा को उलट दिया जाता है तो सूर्य के सम्मुख होते ही छाया पीछे दौडने लगती है। परिस्थितियों की विवशता के सम्बन्ध में ऐसा ही सोचा जाता है कि वही बाधक हो रहा है। किन्तु ऐसा है नहीं। चिन्तन प्रतिगामी ढर्रा ही बसधक है। यदि आदर्शवादी आधार अपनाकर नये ढंग से सोचना और गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण कर सकना सम्भव हो सके तो प्रती होगा कि समस्त गुत्थ्याँ सुलझ गई। ऐसा मार्ग निकल आया जिस पर चलते हुए लोक और परलोक का सुव्यवस्थित रीति से सध सकना सम्भव ही नहीं सरल भी है। इस आन्तरिक परिवर्तन के लिए गतिविधियों के अमिट निर्धारण के लिए जो साहस जुटा लेते है वे देखते हैं प्रगति पथ पर बढ चलने की कितनी सहज सुविधा उपलब्ध थी। अदूरदर्शी आदतों ने ही उस सौभाग्य से मुँह मोड़ा था जो ईश्वर ने हर किसी को जीवन लक्ष्य पूरा कर सकने के निमित उदारता पूर्वक प्रदान की है।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल
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