Sunday 10, May 2026
एक तुम्हीं आधार सद्गुरु | Ek Tumhi Aadhar Sadguru | Pragya Geet Rishi Chintan
दृष्टिकोण बदलो, जीवन बदलो | Drishtikon Badlo, Jeevan Badlo, अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 10 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 May 2026!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर देव संस्कृति विश्वविद्यालय10 May 2026!
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार10 May 2026!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार10 May 2026!
!! गायत्री_माता_मंदिर Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 May 2026!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 May 2026!
अमृतवाणी:- जितना जमा करोगे, उतना उलझोगे
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जमाने के साथ में हम जुड़े हुए हैं जमाने के साथ में हम अलग नहीं हो सकते जमाने की समस्याओं से आप अलग-अलग कैसे रह पाएंगे जमाने से हम दूर रहेंगे अपने घर की दुनिया अलग बसा लेंगे कभी था ऐसा दो सौ पाँच सौ वर्ष पहले ऐसी भी दुनिया रही होगी कि आप आप अपने काम से काम रखिए दुनिया से क्या मतलब है आज तो दुनिया आप के साथ गुथी हुई है और और आप दुनिया के साथ गुथे हुए हैं ऐसी और इन परिस्थितियों में एक ही समाधान है दुनिया के लिए क्या साहब आदमी को कुटुंब के आधार पर जीना पड़ेगा कुटुंब के सिद्धांतों को अपनाना पड़ेगा कुटुंब के सिद्धांत क्या है कुटुंब का एक ही सिद्धांत है एक ही सिद्धांत है मिल कर रहना एक और मिल बांट कर खाना मिल बांट कर खाना नहीं हम जमा करेंगे नहीं आप जमा नहीं कर सकेंगे आप मिलजुल कर काम कीजिए सहकारिता के आंदोलन पर काम चलाइए मिलजुल कर काम कीजिए और जो कुछ भी आप कमाते है मिलजुल कर बैठ कर खा जाइए नहीं साहब मिल बांटकर तो हम नहीं खाएंगे हम ज्यादा कमाते हैं इसलिए अपना महल बनाएंगे तिंजोरी बनाएंगे और अपनी जेवर बनाएंगे कपड़े बनाएंगे और जायदाद खड़ी करेंगे आपकी मर्जी है आप खड़ी करना चाहे तो कर ले भली से मैं कौन होता हूं मना करने वाला पर मैं एक बात कह देता हूं इससे गुत्थियाँ गुत्थियाँ उलझेंगी समाधान नहीं मिल सकेंगे समाधान होने का सिर्फ तरीका एक है आदमी को कौटुंबिकता आज या तो कल कल नहीं तो परसों परसों नहीं तो अगले दिन आदमी को कुटुंब की तरीके से रहना पड़ेगा और कोई भी तरीका है नहीं इसके अलावा कोई तरीका नहीं है आदमी को कुटुंब बनाकर रहना पड़ेगा
अखण्ड-ज्योति से
सामान्य परिस्थितियों में जन्में और कठिनाईयों से घिरे व्यक्ति भी चरम उर्त्कष के लक्ष्य तक पंहुचे और महामानव बने है। दूसरे लोग जिन परिस्थितियों को विवशता मानते रहे उनने उन्हें इस रुप में देखा ही नहीं। नये ढंग से सोचा और नया मार्ग निकाला। फलतः परिस्थितियाँ अपनी जगह पर बनी रहीं और अग्रगमन के लिए दूसरा रास्ता निकल आया। महामानवों में से प्रत्येक का जीवन क्रम इसका साक्षी है कि उनने परिस्थितियों को अपरिहार्य नहीं माना और उनके न बदलने पर अपना ढर्रा बदलने का साहस जुटाया। पिछड़ेपन और प्रगतिशीलता का मध्ववर्ती अन्तर इतना ही है। जो इस रहस्य को समझते हैं उन्हें दैत्यों के जादू तिलस्म से बाहर निकलना और देवों के उन्मुक्त आँकाश में विचरण करना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता। तिलस्म अवास्तविक है। स्व सम्मोहन और आत्मसमर्पण ही उसका आधार है। अन्तरंग बदलते ही बहिरंग के उलटने में देन नहीं लगती। जो भीतर की गुत्थी सुलझा सके उनके लिए बाहर समस्याओं का हल निकालते देन नहीं लगती। प्रपंच का जंजाल तो भीतर ही भरा पड़ा है। अपच होने से ही स्वादिष्ट व्यजंन कडुए लगते है।
यदि विलासी लिप्सा और संग्रह की तृष्णा को हलका किया जा सके तो औसत भारतीय जेसा नैतिक निर्वाह आसानी से उपार्जित हो सकता है। यदि परिवार को बढाने की मूर्खता न की जाय, जो अब तक का है उसे स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाना भर कर्त्तव्य माना जाय तो उस परिपोषण के लिए सामान्य प्रयास से ही काम चल सकता है। बोझिल जीवन तो उनका होता है जो अमीरी के स्वप्न देखते ओर उत्तराधिकारियों को वैभव से लादने की ललक संजोये रहते है। बोझ इस दुश्चिन्तन भ का है। न किसी के लिए पेट भारी पड़ता है और न परिवार। बोझिल तो वह मूर्खता है जो लिप्सा तृष्णा के रुप में जोंक की तरह शिराओं में दाँत गढाये रहती है। आवश्यकता हर किसी की पूरी हो सकती है पर तृष्णा की आग को बुझा सकना कितने ही प्रचुर वैभव से नहीं हो सकता। ईंधन पड़ने पर वह शान्त कहाँ होती, दूनीं-चौगुनी भड़कती है।
प्रसुप्ति ग्रस्तों का चिन्तन और आचरण जैसा होता है उसकी तुलना में जागृतों के सोने और करने में भारी अन्तर रहता है। जागृतों का मोह ग्रस्तों की तरह नहीं सोचना चाहिए, उन्हें सुख में ही लिप्त नहीं रहना चाहिए। सन्तोष भी उपार्जित करना चाहिए। बड़प्पन ही पर्याप्त नहीं महानता भी अभीष्ट है। वावाही लूटने के लिए उद्धत प्रदर्शन का सरंजाम जुटाने में सार नहीं, महत्व उस लोक श्रद्धा का है जो उत्कृष्टता और उदारता अपनाने पर प्रयुर परिमाण में उपलब्ध होती और अन्तरात्मा को आनन्द भीर पुलकन से परितृप्त करती है।
हर जागरुक को इन दिनों इसी स्तर का प्रगतिशील चिन्तन अपनाना चाहिए और ढर्रें में ऐसा परिवर्तन करना चाहिए जिससे इस विषम वेला में आपतित धर्म का निर्वाह कर सकना सम्भव हो सके। ढूँढने से हर कसी को राह मिलती है। यदि आकाँक्षा सच्ची हो तो एक न सही दूसरे ढंग से सही कोई हलनिश्चित रुप से ऐसा निकल सकता है जिसमें निर्वाह भी कठिन न पड़े और जीवन लक्ष्य पाने तथा युग धर्म निभाने का अवसर भी मिलता रहे।
....क्रमशः जारी
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1980 अप्रैल
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