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Monday 11, May 2026

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सच्ची भक्ति क्या है ? Sacchi Bhakti Kya Hai? अमृत सन्देश:-  पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

सच्ची भक्ति क्या है ? Sacchi Bhakti Kya Hai? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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अमृतवाणी:- अध्यात्म साहस का नाम हैं | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

अमृतवाणी:- अध्यात्म साहस का नाम हैं | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 11 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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जब दुनिया परिवार बन जाएगी। Jab Duniya Parivar Ban Jaayegi अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



कुटुंब में क्या होता है कुटुंब के कुछ सिद्धांत है क्या सिद्धांत है जिसमें योग्यता ज्यादा से ज्यादा है पुरुषार्थ ज्यादा से ज्यादा है पराक्रम ज्यादा से ज्यादा है और वह ज्यादा से ज्यादा कमाता है फिर खा सकता है नहीं खा नहीं सकता तो कौन खाता कौन है स्त्रियां भी खाते हैं बच्चे भी खाते हैं बुड्ढे भी खाते हैं बुढ़िया भी खाती हैं घर में दूसरे अनाथ रिश्तेदार टिके हुए हैं वह भी खाते हैं नहीं साहब जो कम आएगा खाएगा नहीं भाई साहब कमाएगा कमाएगा तो सही बात ठीक है लेकिन खाएगा नहीं मिलजुल कर खाएगा यह क्या है यह कुटुंब के सिद्धांत हैं कुटुंब के सिद्धांतों के आधार पर कुटुंब के सिद्धांतों के आधार पर हमारा घर चलता है कुटुंब के आधार पर हमारी गृहस्थी चलती है कुटुंब के आधार पर हमारे परिवारों का निर्माण होता है और कुटुम्बों का आधार अगले वाली दुनिया का अगले वाली दुनिया का एकमात्र सिद्धांत होगा आगे वाली नीतियां जो बनेगी जो कानून बनेगी कायदे बनेंगे नियम बनेंगे मर्यादायें बनेगी धर्म बनेंगे संस्कृति बनेगी जो भी बनेगा क्या बनेगा मुझे यह मालूम नहीं लेकिन जो भी मनुष्य को चलने के लिए कायदे और कानून बनेंगे उसमें एक ही सिद्धांत मुख्यतया काम करेगा उसका नाम है पारिवारिकता कौटुंबिकता ऋषि तो बहुत पहले से जानते थे इसीलिए ऋषियों ने वसुधैव कुटुंबकम का नारा लगाया था

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अखण्ड-ज्योति से




अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों ने युग परिवर्तन की मशाल जलाने और ज्योति जगाने में अग्रगामी भूमिका निभाई- इस तथ्य और सत्य से विज्ञ समुदाय का हर व्यक्ति भली-भाँति अवगत है। विगत लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचाना पड़ता है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ की गणना लोकरंजन के लिए प्रचार विज्ञापन या उपार्जन के लिए निकलने वाली पत्रिकाओं के परिवार में नहीं हो सकती। उसका उदय अवतरण एक सुनिश्चित मिशन के रूप में- एक लक्ष्य विशेष के लिए हुआ था। यह कहने में कोई अत्युक्ति या दर्पोक्ति नहीं है कि इस लम्बी अवधि में व्रतशील तीर्थयात्री की तरह उसने प्रयाण क्रम को बिना थके-बिना डरे डगमगाये-अनेकानेक विघ्न बाधाओं को झेला और गतिशीलता को अनवरत जारी रखा है।

भागीरथी प्रयत्नों ने अदृश्य और दूरवर्ती गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा था। इस गाथा का एक छोटा उदाहरण नव सृजन की प्रवृत्ति प्रेरणा को जन-जन के मन-मन तक उमँगते देखने से मिल सकता है। समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। खदानें खोदने से मणिमुक्तक हाथ लगे हैं। उसी घटना क्रम का एक छोटा रूप यह है कि प्रज्ञा परिवार के परिजनों में से सहस्रों की संख्या लाँघ कर लाखों तक पहुँचने वाली सृजन शिल्पियों की विशालकाय चतुरंगिणी-भारत को महा भारत बनाने के दुहरे मोर्चे पर प्राण-पण से जूझती हुई दृष्टिगोचर हो रही है। अनौचित्य का उन्मूलन और सृजन का संवर्धन देखने में परस्पर विसंगत लगते हैं और एक साथ करने में कठिन असम्भव प्रतीत होते हैं, पर समय ने जब दुहरी और अनमेल जिम्मेदारी कन्धों पर रख ही दी तो उसे वहन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग भी नहीं रहता।

इतिहास में इस प्रकार का भार वहन करने वाले और भी कई हुए हैं। परशुराम को फरसा और फावड़ा चलाने में समान कौशल दिखाना पड़ा था। उन्होंने अनाचार को निरस्त करने की तरह ही खन्दकों को समतल बनाने और मरुक्षेत्रों में उद्यान लगाने में समान अभिरुचि और तत्परता दिखाई थी। द्रोणाचार्य की पीठ पर शस्त्र और छाती पर शास्त्र लदे रहे। उन्होंने सदाशयता को सींचने और दुष्टता को निरस्त करने के अनमेल प्रयासों की संगति बिठाई समन्वित नीति अपनाई थी। अखण्ड-ज्योति का प्रज्ञा परिवार प्रायः उसी मार्ग पर चलता और उज्ज्वल भविष्य के लक्ष्य तक जा पहुँचने के लिए समग्र साहस सँजोये हुए बढ़ता रहा है। प्रयास कितने बन पड़े और कितने सफल हुए इसका लेखा-जोखा रख सकना दूरवर्ती लोगों के लिए कठिन है। मूक साधना की प्रवृत्ति और उपलब्धि का पर्यवेक्षण मात्र अतिनिकटवर्ती लोगों के लिए ही सम्भव है। जो इस स्थिति में हैं वे जानते हैं कि विगत वर्षों में धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित करने और जन मानस को उलटने की दिशा में कितनी उत्साहवर्धक सफलता मिलती चली गई है। यों, जो करने में पड़ा है उसकी तुलना में उपलब्धियों को नगण्य भी कहा जा सकता है।

छावनी बनाने से लेकर सैनिकों की भर्ती और शिक्षा का प्रबन्ध सामान्य समय में, स्थिर शान्ति काल में होना है। लड़ाई छिड़ जाने पर तो एक ही बात ध्यान में रहती है जो साधन मौजूद हैं उन्हीं के सहारे आक्रांता को धकेलने और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए जो संभव हो कर गुजरा जाय। विगत वर्षों से अखण्ड-ज्योति ने कुंती की तरह अपना परिवार सृजा संजोया, पर अब तो समय के आह्वान पर उन सभी को कृष्ण के नेतृत्व में महाभारत की सृजन योजना में निछावर होने के लिए तिलक लगाना और विदा करना ही एक मार्ग है। सामान्य समय और आपत्ति काल का अंतर तो समाधान ही होता है। एक मैं सामान्य निर्धारण चलता रहता है, पर दूसरे अवसर पर अन्यत्र से सामर्थ्य समेट कर एक ही केंद्र पर नियोजित करनी होती है। आग बुझाने और दुर्घटना से निपटने को प्राथमिकता देनी होती है भले ही उस कारण नियमित क्रिया-कलापों में व्यतिरेक ही उत्पन्न क्यों न होता हो।

 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
 अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी

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