Tuesday 12, May 2026
अमृतवाणी:- कर्मठ परिजनों से : भाग 02 | Pujay Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya
अमृत सन्देश:- हम गलत जगह खुशी क्यों ढूंढते हैं? True Happiness
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 12 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:-दुनिया को एक परिवार की तरह रहना पड़ेगा।
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
सारी दुनिया एक कुटुंब की तरीके से रहनी चाहिए मिल जुल कर रहना चाहिए मिल बांट कर खाना चाहिए हिल मिलकर रहना चाहिए हिल मिलकर रहिए मिल बांट कर खाइए मिल बांट कर खाइये यह सिद्धांत जब तक आदमी की समझ में नहीं आएगा आदमी की ऐसी पिटाई और ऐसी धुनाई ऐसी पिटाई और ऐसी धुनाई होगी कि कचूमर निकल जाएगा देख लेना अभी इसलिए दुनिया के समस्याओं के समाधान सिर्फ एक हैं चाहे आप इसको साम्यवाद कहे तो मुझे कोई एतराज नहीं आप इसको समाजवाद कहे तो भी मुझे ऐतराज नहीं आप इसे अध्यात्मवाद कहें तो भी मुझे एतराज नहीं है आप नाम जो भी देना चाहे मैं मैं क्यों झगड़ने लगा आपसे पर मैं यह कहता हूं आपके पास या किसी के भी पास दुनिया के लिए और कोई और कोई फार्मूला ऐसा नहीं है जिसमें कि आदमी चैन से रहे और चैन से रहने दे आदमी बढ़े और बढ़ने दे आदमी हंसे और हंसने दे आदमी खिले और खिलने दे आदमी जिये और जीने दो और कोई सिद्धांत है नहीं बस कोई सिद्धांत नहीं है सिर्फ एक सिद्धांत है एक फार्मूला है जिसका नाम है कौटुंबिकता पारिवारिकता पारिवारिकता आदमी को ग्रहण करनी पड़ेगी राजी से ग्रहण कर लें तो बड़ी अच्छी बात है नहीं राजी से ग्रहण करेंगे तो तो ऐसी ताकतें जो बहुत जबरदस्त ताकतें हैं बहुत जबरदस्त ताकतें आपको मजबूर करेंगी आपको
अखण्ड-ज्योति से
युग सन्धि के प्रस्तुत बीस वर्ष ऐसे हैं जिन्हें अभूतपूर्व- अनुपम एवं अद्भुत अप्रत्याशित कहा जा सकता है। इतिहास के खण्ड विनाश और खण्ड सृजन के घटनाक्रमों का ही उल्लेख मिलता है। समूची मनुष्य जाति के लिए एक ही समय जीवन-मरण का असमंजस उत्पन्न हुआ हो, ऐसा अवसर अब से पूर्व कभी भी नहीं आया। इतनी विकट समस्याएं और इतनी विघातक विभीषिकाएं एक साथ मनुष्य समुदाय के सम्मुख चुनौती बन कर एक साथ आई हों, ऐसा भूतकाल खोजने पर भी नहीं मिलता।
प्रभात काल की उदीयमान किरणें सर्वप्रथम पर्वतों के उच्च शिखर पर चमकती हैं। धरती पर तो वे बाद में उतरती हैं। सृष्टा की संतुलन योजना में व्यापक अनौचित्य को निरस्त करने और सत्प्रवृत्तियों को सींचने के उभयपक्षीय उपक्रम समान रूप से सम्मिलित हैं। प्रेरणाओं का परिवहन मनीषा करती रही है। ‘उमंगें पुरुषार्थ बनकर सामने आती हैं। व्यापक परिवर्तन की भूमिका निभाने में महामानवों को ही अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना होता है। इसी आदर्शवादी साहसिकता के कारण वे स्वयं धन्य बनते और अन्य असंख्यों को उबारने का श्रेय पाते हैं।’
सौभाग्यवान वे हैं जो इस श्रेय प्रतियोगिता में घुड़-दौड़ लगाते और बाजी जीतकर विजय श्री का वरण करते हैं। श्रेयाधिकारी बनने के लिए सर्वोत्तम अवसर युग सन्धियों का ही होता है। उसे पहचानने वाले और हाथ से न जाने देने वाले ही स्वनाम धन्य बने हैं। हनुमान, अंगद, नल-नील बनने का सौभाग्य हर सदाशयी सेवा भावी को नहीं मिल सकता है। अर्जुन और भीम से भी अधिक कुशल बलिष्ठ समय-समय पर होते रहे हैं, पर उपयुक्त समय पर उपयुक्त भूमिका निभाकर वे जिस प्रकार धन्य बने वैसा सौभाग्य अन्यान्यों को कहां मिल सका? धनिकों में अशोक, हर्षवर्धन, मांधाता, भामाशाह जितने सम्पन्न कभी कहीं न हुए हों ऐसी बात नहीं है। इन महान मानवों की गरिमा इतिहास के स्वर्णाक्षरों में इसलिए अंकित है कि उनने समय को पहचाना और उपयुक्त समय पर उपयुक्त कदम उठाने का साहस जुटाया। यों जराजीर्ण होने पर जीवित रहने अथवा मरने पर आंख मूंदते ही लाख करोड़ की संपदा उत्तराधिकारी दर्प पूर्वक हड़प लेने और उस उपलब्धि को अधिकार जताते हुए मूंछें ऐंठते हैं।
समय आलस प्रमाद में और वैभव दर्प विलास में गंवाने वालों की कमी नहीं। पर वे दूरदर्शी विरले ही होते हैं, जो निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकता जुटाने में थोड़ी-सी सामर्थ्य खर्च करने के उपरांत अपना पुरुषार्थ सत्प्रयोजनों में नियोजित करके अपना एवं असंख्यों का चिरस्थायी हित साधन करते हैं। दुर्व्यसनों और विग्रहों में- ललकों और तृष्णाओं में सामान्य जनों की जीवन-संपदा गलती-जलती रहती है। इस अपव्यय की फुलझड़ी जलाने में कई कौतूहल बनाते और बाल-विनोद जैसा मोड़ मनाते देखे जाते हैं, पर उन असामान्यों की संख्या नगण्य जितनी होती है। जो सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का महत्व समझते और उसका उपयोग महान प्रयोजनों में करने की दूरदर्शिता अपनाते हैं। ऐसे ही थोड़े लोग उस ऐतिहासिक अवसर को समझने और पकड़ने में समर्थ होते हैं जिसमें दैवी आह्वान उतरते और सम्पर्क में आने वालों के लिए अलभ्य वरदान जैसे सिद्ध होते हैं।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रज्ञा परिजनों की सौभाग्य भरी दूरदर्शिता देर-सबेर में कोटि-कोटि कंठों द्वारा इसलिए सराही जायेगी कि उनने अंधेरे में दीपक जलाने जैसा साहस दिखाकर अपनी विशिष्टता एवं वरिष्ठता का परिचय दिया। साहस के धनी अनेकों होते हैं। उद्दण्ड आतंकवादी, दस्यु आततायी आये दिन दुस्साहस बरतते और दुष्टता करते देखे जाते हैं। यों इसे भी साहसिकता ही कहा जायेगा। लुटेरे और हत्यारे इसी स्तर के होते और दैत्य दानव कहलाते हैं। इन पर लोक-भर्त्सना और आत्म-प्रताड़ना ही बरसती है। समाज और शासन का दंड पाते और ईश्वरीय कोप का नरक सहते हैं। तात्कालिक सफलताएं जो उनके पल्ले पड़ती हैं, नरक जैसी घिनौनी और जहर जैसी विषैली सिद्ध होती हैं। ऐसे लाभ कुछ ही समय में नस-नस को बेधने वाले अभिशाप बनकर सामने आते हैं।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी
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