Tuesday 09, September 2025
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 09 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!mp4
अमृतवाणी: हिलेरी की गंगा की खोज पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हिलेरी नाम का गंगा कहाँ से निकलती है, ज़रा पता तो लगाकर देखें। पता तो लगाकर देखना — कहाँ से आती है, कहाँ से निकलती है। गंगोत्री कैसी है? गोमुख कैसा है? गोमुख चलेंगे तो चलेंगे, कोई भी चला जा सकता है, उसके मन में आया। पानी में से चलेंगे, पानी में होकर चलेंगे। पानी की नाव — जेट बोट — बनाकर वो लाया था गंगासागर से। उसने सफ़र गंगा में सीधा नहीं, उल्टा शुरू किया।
और हिलेरी हिंदुस्तान में दो बातों के लिए मशहूर रहेगा — जिसमें एक तो एवरेस्ट चोटी पर चढ़ाई की तेनजिंग शेरपा के साथ, और एक उसने यह रिकॉर्ड-कीर्तिमान बनाया कि वो गंगासागर से उल्टी धारा, गंगा को चीरता हुआ गोमुख तक कैसे पहुँच जाएगा। गोमुख तक पहुँचता हुआ, यहाँ लाया था जेटबोट।
हमने देखी थी। जेटबोट की क्या विशेषता थी? जेटबोट उल्टी चलती थी। उल्टी नहीं चलती थी? एक और भी उसमें विशेषता थी — जैसे पंख वाला पखेरू छलांग मारता है, ऐसे वो छलांग मारती। उल्टी दिशा में कोई चट्टान आ जाए, पत्थर आ जाए, कोई आ जाए, कोई चीज़ आ जाए, ऊँचाई आ जाए — तो छलांग मार के ले जाए।
यहाँ इस तरीक़े से हमने देखा — जैसे कोई आदमी आपने देखे होंगे दौड़ वाले आते हैं, खट-खुद छलांग मारते चले जाते। वो उलटी दिशा में छलांग मारती थी। ऐसी नाव थी। ऐसी नाव पर सवार होकर हिलेरी गंगोत्री चला गया। गंगोत्री से आगे चला गया। बस यहीं — गंगोत्री से आगे जाकर के गोमुख के बीच में — फिर न जा सका। फिर वो बीमार पड़ गया। नाक ख़राब हो गई। क्या हो गया। गोमुख नहीं जा पहुँचा। बीच में से चला आया।
पर हिम्मत उसकी बड़ी थी। जो बात है, उसको पता लगाकर रहे। विश्वामित्र ने बड़ी हिम्मत की। पता लगाकर रहेंगे। और बेटे, हमने भी बड़ी हिम्मत की। बड़ी हिम्मत की है। आख़िर उसका पता लगाकर ही रहेंगे। पूछ उखाड़कर रहेंगे। किसकी? गायत्री की — हैं! क्या? कहाँ से आ रही? कहाँ से आ रही?
तूने एक ही काम किया ज़िंदगी में। दूसरा कुछ काम नहीं किया। नहीं-नहीं, आपने तो वो लिखे हैं। क्या लिखे हैं? क्या लिखे हैं हमने? वेद लिखे? पुराण लिखे हैं? न, हमने वेद लिखे हैं, न पुराण लिखे हैं।
क्या किया है बेटे? गायत्री... गायत्री मंत्र के बेटों की गवाहीयाँ ली हैं हमने।
असल बात किसी की मालूम करनी हो — असलियत किसी की — तो आप CID बनकर जाना। उसके घर वालों से, बच्चों से मालूम करना। बच्चे सब बता देंगे — हमारी मम्मी कैसी है, पापा कैसे हैं। सब कच्चा चिट्ठा सुनना हो, तो आप बच्चों को कुछ टॉफ़ी खिला दिया कीजिए — "तुम्हारे पापा घर कितने बजे आते हैं?" — "इतने बजे आते हैं।"
"अच्छा तुम्हारे घर क्या हुआ था? मम्मी ने क्या बनाया था?" — कच्चा चिट्ठा ले आओ। आप बिल्कुल सही चिट्ठा, सब बच्चे बता देते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ? मैं क्यों हूँ? इस छोटे से प्रश्न का सही समाधान न कर सकने के कारण ‘मैं’ को कितनी विषम विडम्बनाओं में उलझना पड़ता है और विभीषिकाओं में संत्रस्त होना पड़ता है, यदि यह समय रहते समझा जा सके तो हम वह न रहें, जो आज हैं। वह न सोचें जो आज सोचते हैं। वह न करें जो आज करते हैं।
हम कितने बुद्धिमान हैं कि धरती आकाश का चप्पा-चप्पा छान डाला और प्रकृति के रहस्यों को प्रत्यक्ष करके सामने रख दिया। इस बुद्धिमत्ता की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम और अपने आपके बारे में जितनी उपेक्षा बरती गई उसकी जितनी निन्दा की जाय वह भी कम ही है।
जिस काया को शरीर समझा जाता है क्या यही मैं हूँ? क्या कष्ट, चोट, भूख, शीत, आतप आदि से पग-पग पर व्याकुल होने वाला अपनी सहायता के लिए बजाज दर्जी, किसान, रसोइया, चर्मकार, चिकित्सक आदि पर निर्भर रहने वाला ही मैं हूँ? दूसरों की सहायता के बिना जिसके लिए जीवन धारण कर सकना कठिन हो-जिसकी सारी हँसी-खुशी और प्रगति दूसरों की कृपा पर निर्भर हो, क्या वही असहाय, असमर्थ, मैं हूँ? मेरी आत्म निर्भरता क्या कुछ भी नहीं है? यदि शरीर ही मैं हूँ तो निस्सन्देह अपने को सर्वथा पराश्रित और दीन, दुर्बल ही माना जाना चाहिए।
परसों पैदा हुआ, खेल-कूद, पढ़ने-लिखने में बचपन चला गया। कल जवानी आई थी। नशीले उन्माद की तरह आँखों में, दिमाग में छाई रही। चञ्चलता और अतृप्ति से बेचैन बनाये रही। आज ढलती उम्र आ गई। शरीर ढलने गलने लगा। इन्द्रियाँ जवाब देने लगी। सत्ता, बेटे, पोतों के हाथ चली गई। लगता है एक उपेक्षित और निरर्थक जैसी अपनी स्थिति है। अगली कल यही काया जरा जीर्ण होने वाली है। आँखों में मोतियाबिन्द, कमर-घुटनों में दर्द, खाँसी, अनिद्रा जैसी व्याधियाँ, घायल गधे पर उड़ने वाले कौओं की तरह आक्रमण की तैयारी कर रही हैं।
अपाहिज और अपंग की तरह कटने वाली जिन्दगी कितनी भारी पड़ेगी। यह सोचने को जी नहीं चाहता वह डरावना और घिनौना दृश्य एक क्षण के लिए भी आँखों के सामने आ खड़ा होता है रोम-रोम काँपने लगता है? पर उस अवश्यंभावी भवितव्यता से बचा जाना सम्भव नहीं? जीवित रहना है तो इसी दुर्दशा ग्रस्त स्थिति में पिसना पड़ेगा। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। क्या यही मैं हूँ? क्या इसी निरर्थक विडम्बना के कोल्हू के चक्कर काटने के लिए ही ‘मैं’ जन्मा? क्या जीवन का यही स्वरूप है? मेरा अस्तित्व क्या इतना ही तुच्छ है?
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 3
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