Wednesday 10, September 2025
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अमृतवाणी:- उपासना के चार कार्य कौन से हैं? | Upasana Ke Char Karya Koun Se Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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अमृतवाणी: गायत्री माता के चार बेटे पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
गायत्री माता के चार बेटे, चार जिनको कहते हैं। ये वेदमाता, विश्वमाता। वेदमाता नमो, वेदमाता नमो, विश्वमाता वेदमाता गायत्री है।
हमने कहा, उन्हीं से पता लगा लेंगे, बच्चे सब असलियत बता देंगे। चारों वेदों को हमने पढ़ना शुरू कर दिया, पढ़ना शुरू कर दिया। और गायत्री के संबंध में जो कुछ भी पाया, ढूंढ़ा, हमारे पास संकलित है।
अभी छाप दिया नहीं।
बेटे, वह तो बड़ी पुरानी किताब है — गायत्री महाविज्ञान।
कब की छपी है गायत्री महाविज्ञान?
गायत्री महाविज्ञान तो बेटे, 30 साल पुरानी है।
जो हमने अपने 24 पुरश्चरण कर लिए थे, उस समय की पुरानी है।
अब तक जो हमने संकलन किया है, वह हमारे पास जमा है। तो कभी छापेंगे।
हाँ बेटा, हमारा भी मन तो है — कभी छापेंगे।
गायत्री महाविज्ञान से बहुत बड़ा... बहुत बड़ी उसमें धर्मशास्त्रों का उल्लेख है। इसमें उसका भी उल्लेख है, काहे का हमने किया है।
अधिकांश वही हमने किया है।
क्या बात और है?
बिल्कुल सामान्य किताब है।
असामान्य... असामान्य संकलन है हमारे पास।
कभी मौका मिलेगा, फिर तो कभी तो हम लिखेंगे और छापेंगे उसको।
अभी तो मौका नहीं आया।
वेद हमने किसके लिए किए?
केवल हमने गायत्री मंत्र की महिमा को जांच-पड़ताल करने के लिए किए हैं।
उसके जो पॉइंट थे, नोट थे, अच्छे-अच्छे मालूम पड़े, अच्छे-अच्छे लगे — तो बहुत अच्छी बात है, तो बहुत अच्छी बात है।
लिखते चले गए।
यह आ गया लोड।
छापा दे तो क्या हो जाए?
इतना परिश्रम भी कर लिया, इतने इसके नोट्स भी तैयार कर लिए, इतनी मेहनत हो गई — अब रह क्या गया?
ज़रा सी बात है, ज़रा सी उसमें टिप्पणी इधर की उधर और मिला दिया — नमक मिर्च और ठीक-ठाक करके बना दिया।
वेदों को छपने दे दिया। छप गए वेद।
आपने नहीं लिखे बेटे, हमने नहीं लिखे।
हमने तो केवल गायत्री मंत्र की शोध करने के लिए वेदों का अनुसंधान किया, और उसकी शोध के चक्कर में वह लिख गए हैं।
लिखे नहीं थे संकल्पपूर्वक, वह तो लिख गए हैं।
पुराणों में गायत्री मंत्र की कथाओं के संबंध में — देवी भागवत से लेकर के स्कंद पुराण तक — बड़े-बड़े वर्णन हैं।
देवी भागवत में सबसे ज़्यादा वर्णन है।
किसमें?
गायत्री मंत्र के संबंध में।
पुराणों को हमने इसीलिए पढ़ा कि पुराणों में गायत्री मंत्र के बारे में क्या-क्या आता है, कथाएँ क्या-क्या आती हैं।
हमने सब कथाओं को देखा, पढ़ा।
इन्हीं पुराणों के बारे में ढूंढ़ते गए, निशान लगाते गए, मार्क लगाते गए, लिखते चले गए।
उसमें अच्छा-अच्छा जो हिस्सा लगा, बनता चला गया, छाप भी दिया हमने।
क्या किया बेटे?
कुछ नहीं किया।
प्रयोग के संबंध में यह किया है।
और प्रयोग... प्रयोग गायत्री मंत्र के संबंध में।
हमारे प्रयोग में — छोटे अनुष्ठानों से लेकर के बड़े अनुष्ठानों तक —
हमारा शरीर क्या है?
यह बेटे, एक लेबोरेटरी है।
कौन सी?
यह शरीर हमारा प्रयोगशाला है।
इस पर हम समय-समय पर, समय-समय पर, समय-समय पर अनेक प्रयोग करते रहे हैं।
और अपनी इसी लेबोरेटरी में तरह-तरह के केमिकल्स और तरह-तरह की चीजों को मिश्रण करके यह देखते रहे हैं कि इसमें से क्या चीज बन सकती है और क्या चीज हो सकती है।
सारी ज़िंदगी हमको अपने गायत्री मंत्र के प्रयोग और परीक्षणों को करते-करते यहाँ आ गए हैं।
और अनुसंधान करते-करते यहाँ आ गए हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
आत्म चिन्तन कहेगा- नहीं-नहीं-नहीं। आत्मा इतना हेय और हीन नहीं हो सकता। वह इतना अपंग और असमर्थ-पराश्रित और दुर्बल कैसे होगा? यह तो प्रकृति के पराधीन पेड़-पौधों जैसा-मक्खी, मच्छरों जैसा जीवन हुआ। क्या इसी को लेकर-मात्र जीने के लिए मैं जन्मा। सो भी जीना ऐसा जिसमें न चैन, न खुशी, न शान्ति, न आनन्द, न सन्तोष। यदि आत्मा-सचमुच परमात्मा का अंश है तो वह ऐसी हेय स्थिति में पड़ा रहने वाला हो ही नहीं सकता। या तो मैं हूँ ही नहीं।
नास्तिकों के प्रतिपादन के अनुसार या तो पाँच तत्वों के प्रवाह में एक ‘भंवर जैसी बबूले जैसी क्षणिक काया लेकर उपज पड़ा हूँ और अगले ही क्षण अभाव के विस्मृति गर्त में समा जाने वाला हूँ। या फिर कुछ हूँ तो इतना तुच्छ और अपंग हूँ जिसमें उल्लास और सन्तोष जैसा-गर्व और गौरव जैसा-कोई तत्व नहीं है। यदि मैं शरीर हूँ तो-हेय हूँ। अपने लिए और इस धरती के लिए भारभूत। पवित्र अन्न को खाकर घृणित मल में परिवर्तन करते रहने वाले-कोटि-कोटि छिद्रों वाले इस कलेवर से दुर्गन्ध और मलीनता निसृत करते रहने वाला-अस्पर्श्य-घिनौना हूँ ‘मैं’। यदि शरीर हूँ तो इससे अधिक मेरी सत्ता होगी भी क्या?
मैं यदि शरीर हूँ तो उसका अन्त क्या है? लक्ष्य क्या है? परिणाम क्या है? मृत्यु-मृत्यु-मृत्यु। कल नहीं तो परसों वह दिन तेजी से आँधी तूफान की तरह उड़ता उमड़ता चला आ रहा है, जिसमें आज की मेरी यह सुन्दर सी काया-जिसे मैंने अत्यधिक प्यार किया-प्यार क्या जिसमें पूरी तरह समर्पित हो गया-घुल गया। अब वह मुझसे विलग हो जायगी। विलग ही नहीं अस्तित्व भी गँवा बैठेगी।
काया में घुला हुआ ‘मैं’-मौत के एक ही थपेड़े में कितना कुरूप-कितना विकृत-कितना निरर्थक-कितना घृणित हो जायगा कि उसे प्रिय परिजन तक-कुछ समय और उसी घर में रहने देने के लिए सहमत न होंगे जिसे मैंने ही कितने अरमानों के साथ-कितने कष्ट सहकर बनाया था। क्या यही मेरे परिजन हैं? जिन्हें लाड़-चाव से पाला था। अब ये मेरी इस काया को-घर में से हटा देने के लिए-उसका अस्तित्व सदा के लिए मिटा देने के लिए क्यों आतुर हैं? कल वाला ही तो मैं हूँ।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4
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