Thursday 11, September 2025
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यम गायत्री, Yam Gayatri Mantra | मंत्र का सदैव जाप करने वाले प्राणियों में मृत्यु का भय नहीं रहता है
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 11 September 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 11 September 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 11 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: मालवीय जी द्वारा गायत्री का महात्म्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हम कुछ बताना चाहते हैं। गायत्री मंत्र का एक भाग वह था जो हमारे एक गुरु ने बताया। मालवीय जी ने हमको बताया।
मालवीय जी ने क्या बताया आपको?
मालवीय जी ने केवल हमको महात्म्य तो बता दिया था।
हमने आपको महात्म्य बता दिया।
गायत्री महाविज्ञान में लिख दिया है, जो अभी हम कह रहे थे।
गायत्री अमृत है, कल्पवृक्ष है, पारस है, बीमारियाँ दूर कर देती है और बुखार अच्छा हो जाता है।
नौकरी में तरक्की करानी चाहिए। गायत्री मंत्र का जप करने से बेटे हेड पैदा हो जाते हैं।
गायत्री चित्रावली की पुस्तक में सब लिख दिया है।
कौन सा?
सब छाप दिया है। यह, यह — इसके बच्चा पैदा हो रहा है, यह, यह रुपया बरस रहा है।
यह क्या कह रहा है?
बेटे, हमारे पहले गुरु ने बताया था।
हम पहले गुरु हैं, जो हम वही बताते हैं, जो हमारे गुरु ने बता दिया था।
हमारी कोई गलती नहीं है।
यह बताया था, गायत्री मंत्र की महत्ता है।
और क्या बताया था आपके पहले गुरु ने?
हमारे पहले गुरु मालवीय जी ने गायत्री मंत्र की महत्ता बताई थी।
एक और... क्या लगाने की विधि।
विधियाँ सब उन्होंने बताई।
किन उंगलियों से जप करते हैं — ये सब भी उन्होंने ही बताया था।
और तीन उँगलियों से जप करते हैं बेटे।
हम सबको वही बताते हैं।
माला का जो दाना है, चक्र नहीं घुमाते हैं।
इसको किस तरीके से घुमाते हैं, उन्होंने बताया था।
हमने आपको बता दिया।
ये क्या चीज बताई थी उन्होंने?
हमको क्रियायोग बताया था।
हमको, आपको क्रियायोग बता दिया।
सब मालवीय जी का शिक्षण हमने सब अक्षरशः आपको बता दिया है।
अब हमारी कोई गलती नहीं है।
हमारे बीच कुछ और बाकी रह गया था बेटे?
कुछ और बाकी रह गया था।
और क्या रह गया था?
जब दुबारा गुरु आया हमारा।
दुबारा हमारा गुरु आया — 15 साल की उम्र में।
तब उसने क्या काम किया?
तब हमारी क्रियायोग वाली बालकपन वाली उपासना में प्राण भर दिया।
प्राण क्या होता है?
प्राण, बेटे, उसे कहते हैं — माँ के पेट में जब बच्चा आता है, तो शुरू में, पहले महीने में ऐसे बैठा रहता है, चुपचाप, चुपचाप।
कोई काम नहीं होता, कोई खास क्रिया नहीं होती।
पर जब बड़ा हो जाता है, तो उसके भीतर प्राण पैदा होता है।
क्या करता है प्राण जब भीतर बच्चे के आ जाता है?
क्या जाता है?
तो वह माँ के पेट में लात मारता है।
ऊपर से गोबर फैलाता है।
और फिर जब ज़्यादा बड़ा हो जाता है, तो कहता है — मम्मी, अब हम नहीं रहेंगे इसमें।
हम बाहर निकलेंगे।
बाहर निकलेंगे।
मम्मी को हैरान कर देता है, परेशान कर देता है, खून खच्चर कर देता है।
और जब प्राण हो जाता है, तो छोड़ करके माँ का पेट, बाहर निकल करके आता है।
क्यों छोड़ता है?
अरे बेटे, उसे कहते हैं, जिसको हम प्राण कहते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
मौत के जरा से आघात से मेरा स्वरूप यह कैसा हो गया। अब तो मेरी मृत काया-हिलती डुलती भी नहीं-बोलती, सोचती भी नहीं? अब तो उसके कुछ अरमान भी नहीं है। हाय, यह कैसी मलीन, दयनीय, घिनौनी बनी जमीन पर लुढ़क रही है। अब तो यह पलंग बिस्तर पर सोने तक का अधिकार खो बैठी। कुशाओं बान से ढकी-गोबर से लिपी गीली भूमि पर यह पड़ी है। अब कोई चिकित्सक भी इसका इलाज करने को तैयार नहीं। कोई बेटा, पोता गोदी में नहीं आता।
पत्नी छाती तो कूटती है पर साथ सोने से डरती है। मेरा पैसा-मेरा वैभव-मेरा सम्मान हाय रे! सब छिन गया-हार से मैं बुरी तरह लुट गया। मेरे कहलाने वाले लोग ही-मेरा सब कुछ छीन कर मुझे इस दुर्गति के साथ घर से निकाल रहें हैं। क्या यही अपनी दुर्दशा कराने के लिए मैं जन्मा? यही है क्या मेरा अन्त-यही था मेरा लक्ष्य, यही है क्या मेरी उपलब्धि। जिसके लिए कितने पुरुषार्थ किये थे-क्या उसका निष्कर्ष यही है? यही हूँ मैं-जो मुर्दा बना पड़ा हूँ-और लकड़ियों की चिता में जल कर अगले ही क्षण अपना अस्तित्व सदा के लिए खोने जा रहा हूँ।
लो अब पहुँच गया मैं चिता पर। लो, मेरा कोमल मखमल जैसा शरीर-जिसे सुन्दर, सुसज्जित, सुगन्धित बनाने के लिए घण्टों शृंगार किया करता था, अब आ गया अपनी असली जगह पर। लकड़ियों का ढेर-उसके बीच दबाया हुआ मैं। लो यह लगी आग। लो, अब मैं जला। अरे मुझे जलाओ मत। इन खूबसूरत, हड्डियों में मैं अभी और रहना चाहता हूँ, मेरे अरमान बहुत हैं, इच्छायें तो हजार में से एक भी पूरी नहीं हुई। मुझे उपार्जित सम्पदाओं से अलग मत करो, प्रियजनों का वियोग मुझे सहन नहीं। इस काया को जरा सा कष्ट होता था तो चिकित्सा, उपचार मैं बहुत कुछ करता था। इस काया को इस निर्दयतापूर्वक मत जलाओ
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4
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