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Friday 12, September 2025

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आनंद के लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं।

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कर्म की व्यवस्था प्रकृति का विधान | Karm Ki Vyavastha Prakriti Ka Vidhan | Dr Chinmay Pandya

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"जागृत आत्माएँ समय की पुकार अनसुनी न करें"

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अपनी स्थिति से बाहर खर्च न करो।

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अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा | Ati Vilkshan Swadhaya Chikitsa

अति विलक्षण स्वाध्याय चिकित्सा | Ati Vilkshan Swadhaya Chikitsa

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 मनुष्य शरीर वही जो परमार्थ के काम आये | Gurudev Ke Patra Sneh | Shantikunj Rishi Chintan

मनुष्य शरीर वही जो परमार्थ के काम आये | Gurudev Ke Patra Sneh | Shantikunj Rishi Chintan

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अमृतवाणी:- गायत्री यज्ञ से जीवन में क्या बदलता है ? | Gayatri Yagya Se Jivan Mei kya Badlav Aata Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


अमृतवाणी: क्रिया योग किसे कहते हैं पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



गायत्री मंत्र का कलेवर, कलेवर वहाँ बनकर तैयार हो जाता है।
कौन सा हो?
कौन सा हो गया था कलेवर?
कलेवर वह तैयार हो गया था, जो एक मालवीय जी ने पहले कलेवर बना दिया था।
क्यों बना दिया था कलेवर?
बेटे, इसलिए बना दिया गया था कि औरतों को जब बच्चा होने वाला होता है, तो पहले से बच्चे के लिए फ्रॉक, चड्डी, लार टपकने वाला — सब बनाकर ले लेते हैं।
अरे बाबा, अभी काहे को खरीद रही है?
अभी कोई बच्चा है तेरा?
नहीं साहब, होगा हमारे।
जब होगा, उस वक्त हम कहाँ से खरीदेंगे, बताइए ज़रा।
बच्चा तुरंत पैदा होगा, पखाना में टट्टी करेगा — आप बताइए, उस वक्त आप हमसे कहेंगे, लाइए, इसके लिए सिल करके कपड़े लाइए — तो हम कहाँ से लाएंगे?
इसलिए हम पहले तैयार कर देते हैं।
पहले तैयार करने का अर्थ क्या होता है?
यह है, बेटे — क्रिया योग।
क्रिया योग किसे कहते हैं?
क्रिया योग उसे कहते हैं जो हमने आपको सिखाया था।
हमने आपको सिखाया था क्रिया योग।
क्रिया योग उसे कहते हैं जिसमें कि आदमी को जानकारी दी जाती है, कि पहले तैयारी कराई जाती है।
मालवीय जी ने हमको तैयारी कराई थी, तो कलेवर दिया था आपको।
आपको हमने कलेवर दिया है।
कलेवर किसे कहते हैं?
क्रिया योग को कहते हैं।
क्रिया योग किसे कहते हैं?
क्रिया योग, बेटे — जप करने को कहते हैं, प्राणायाम को कहते हैं, माला घुमाने को कहते हैं, अक्षत छोड़ने को कहते हैं, हाथ जोड़ने को कहते हैं, धूपबत्ती जलाने को कहते हैं।
धूपबत्ती जलेगी — ये क्या चीज है?
यह, बेटे — क्रिया योग है।
क्रिया योग से क्या मतलब?
क्रिया योग से मतलब कि वह शक्ति जब आएगी, तब क्या करना पड़ेगा?
तो हम रखेंगे कहाँ?
इस्तेमाल कैसे करेंगे?
तरीका क्या है?
तरीका क्या है?
तरीका जो होता है — कैसे होता है बेटे?
क्रिया योग किसे कहते हैं?
क्रिया योग, बेटे, इसे कहते हैं — कि अक्षर से, स्याही से लिखते हैं, कलम से लिखते हैं, अक्षर से लिखे जाते हैं।
ये क्या है?
ये क्रिया योग है।
क्या लिख रहे हैं?
चिट्ठी।
कैसे लिख रहे हैं बेटे?
हम ऐसे लिख रहे हैं — कागज के ऊपर, स्याही में, दवात में कलम बोरते हैं और डुबोते हैं, और उससे ऐसे अक्षर बनाते रहते हैं।
उँगलियाँ बनाकर के लिख देते हैं।
यह क्या है?
क्रिया योग।
तो गुरुजी, मैं कलम ले आऊँ — तो जैसे आप अंग्रेजी में, संस्कृत में लिखते हैं, मुझे भी लिखना आ जाएगा?
यह, बेटी, तूने क्रिया योग सीखा है।
एक और रह गया है।
इसका क्या?
इसका रह गया है — वह है ज्ञान योग।
ज्ञान योग और क्रिया योग — दोनों जब तेरे हो जाएँगे, तब तुझे लिखना आ जाएगा।
महाराज जी, यह तो मेरे पास वह है — प्राप्त है, प्राप्त है, बेटे।
पर पढ़ा नहीं।
पढ़ने की ना पढ़ने की वजह से — तेरे चिठ्ठी लिख नहीं सकता।
क्या करना पड़ेगा?
ज्ञान योग, जिसको हम कहते हैं।
क्रिया योग के साथ, क्रिया योग के साथ में ज्ञान योग का सम्मिश्रण हो जाता है — तो एक बात पूरी हो जाती है।
पूरी हो जाती है।
दुबारा हमारा जब गुरु आया — जो 15 वर्ष की उम्र में, जो हमारा बॉस, जिसको मैं कहता हूँ मास्टर, जिसको मैं कहता हूँ — उसने मुझे गायत्री मंत्र का वह हिस्सा बता दिया, जिसमें प्राण भर दिया, जीवन भर दिया।
प्राण भर दिया, जीवन भर दिया।
बस, फिर वह चमत्कार दिखाने लगे।
फिर वह गायत्री शक्तिमान हो गई।
और फिर वह जीवंत हो गई।
फिर वह चमत्कार दिखाने लगी। 

 

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अखण्ड-ज्योति से



अरे स्वजन और मित्र कहलाने वाले लोगों-इस अत्याचार से मुझे बचाओ। अपनी आँखों के आगे ही मुझे इस तरह जलाया जाना तुम देखते रहोगे। मेरी कुछ भी सहायता न करोगे। अरे यह क्या-बचाना तो दूर उलटे तुम्हीं मुझमें आग लगा रहे हो। नहीं-नहीं, मुझे जलाओ मत-मुझे मिटाओ मत। कल तक मैं तुम्हारा था- तुम मेरे थे-आज ही क्या हो गया जो तुम सबने इस तरह मुझे त्याग दिया? इतने निष्ठुर तुम सब क्यों बन गये? मैं और मेरा संसार क्या इस चिता की आग में ही समाप्त हुआ? सपनों का अन्त-अरमानों का विनाश-हाय री चिता-हत्यारी चिता- तू मुझे छोड़। मरने का जलने का मेरा जरा भी जी नहीं है। अग्नि देवता, तुम तो दयालु थे। सारी निर्दयता मेरे ही ऊपर उड़ेलने के लिए क्यों तुल गये?

 लो, सचमुच मर गया। मेरी काया का अन्त हो ही गया। स्मृतियाँ भी धुँधली हो चलीं। कुछ दिन चित्र फोटो जिये। श्राद्ध तर्पण का सिलसिला कुछ दिन चला। दो तीन पीढ़ी तक बेटे पोतों को नाम याद रहे। पचास वर्ष भी पूरे न हो पाये कि सब जगह से नाम निशान मिट गया। अब किसी को बहुत कहा जाय कि इस दुनिया में ‘मैं’ पैदा हुआ था। बड़े अरमानों के साथ जिया था, जीवन को बहुत सँजोया, सँभाला था, उसके लिए बहुत कुछ जिया था, पर वह सारी दौड़, धूप ऐसे ही निरर्थक चली गई। मेरी काया तक ने मेरा साथ न दिया-जिसमें मैं पूरी तरह घुल गया था। जिस काया के सुख को अपना सुख और जिसके दुःख को अपना दुःख समझा। सच तो यह है कि मैं ही काया था-और काया ही मैं था हम दोनों की हस्ती एक हो गई थी; पर यह क्या अचम्भा हुआ, मैं अभी भी मौजूद हूँ।
     

वायुभूत हुआ आकाश में मैं अभी भी भ्रमण कर रहा हूँ। पर वह मेरी अभिन्न सहचरी लगने वाली काया न जाने कहाँ चली गई। अब वह मुझे कभी नहीं मिलेगी क्या? उसके बिना मैं रहना नहीं चाहता था, रह नहीं सकता था, पर हाय री निर्दय नियति। तूने यह क्या कर डाला। काया चली गई। माया चली गई। मैं अकेला ही वायुभूत बना भ्रमण कर रहा हूँ। एकाकी-नितान्त एकाकी। जब काया ने ही साथ छोड़ दिया तो उसके साथ जुड़े हुए परिवारी भी क्या याद रखते-क्यों याद रखते? याद रखे भी रहे हों तो अब उससे अपना बनना भी क्या है?

.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4

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