Saturday 13, September 2025
श्राद्ध तर्पण का प्रयोजन | Shradh Tarpan Ka Prayojan
"सुख-दुःख का रहस्य: परिस्थितियाँ नहीं, आपका मन ही वास्तविक कारण है!" । पं० श्रीराम शर्मा आचार्य जी
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अमृतवाणी:- जानिए कैसे बदलेगा समाज इन दस सूत्रों से ? | Janiye Kaise Badlega Samaj In Das Sutro Se पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 13 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: अध्यात्म भावना से संबंध रखता है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अध्यात्म जो है, आदमी के चिंतन से संबंध रखता है, भावना से संबंध रखता है।
चेतना जो है हमारी, वह है जो विचार से संबंध रखती है।
और यह हम दो हिस्सों में — एक हमारा शरीर है जो मिट्टी की है।
भगवान और अध्यात्म का जो भी हिस्सा है, जो भी उसकी लाभ और हानि है, वह हमारे अंतःचेतना से संबंध रखती है, अंतःकरण से संबंध रखती है।
हमारे क्रियाओं से संबंध नहीं है।
क्रिया तो मिट्टी की है।
जो भगवान क्रिया से संबंध रखता है, वह असली भगवान नहीं है।
असली भगवान वह है जो हमारी भावना से संबंध रखता है।
असली भगवान और असली भक्त जब मिलेंगे, तब... तब क्या होगा?
तब, बेटे, भाव, संवेदनाएं, भावनाएं, भावनाएँ, भावनाओं का आभार शुरू हो जाएगा।
और नकली भगवान और नकली मनुष्य मिलेगा, तब... तब, बेटे, ऐसा हो जाएगा।
नकली भगवान कैसा है?
पत्थर का।
और नकली भगत?
हड्डी का।
और नकली भगत, नकली भगत की नकली भगवान की भक्ति कैसी होगी?
नकली भगवान की भक्ति, बेटे, सामान की होगी।
सामान तो है ना — नकली भगवान, सामान का बनाया हुआ।
और नकली भगत, सामान का बनाया हुआ।
पदार्थ का बनाया हुआ।
और नकली भक्ति, सामान की बनाई हुई।
सामान क्या होता है?
चंदन, फूल, आरती, धूपंए, दीपंए, नैवेद्य समर्पयामि।
यह क्या कर रहे हो महाराज जी?
बेटे, हम भगवान की पूजा कर रहे हैं।
यह तो स्थूल की पूजा है।
स्थूल पूजा किसके लिए होती है?
सूक्ष्म पूजा के लिए।
सूक्ष्म पूजा किसे कहते हैं?
जिसमें हमारी भावनाएं, जिसमें हमारी विचारणाएं, जिसमें हमारी आस्थाएं, जिसमें हमारी निष्ठाएं, जिसमें हमारी संवेदनाओं का स्पर्श होता है।
भगवान, भगवान का स्पर्श आंखों से नहीं हो सकता।
आंखें मिट्टी की हैं।
और वह जो भगवान दिखाई पड़ेगा, जिसकी शक्ल वाला भगवान — वह मिट्टी का होगा।
चेतन भगवान दिखाई नहीं पड़ सकता।
प्रेम दिखाई नहीं पड़ता।
क्रोध दिखाई नहीं पड़ता है।
चरित्र दिखाई नहीं पड़ता है।
संतोष दिखाई नहीं पड़ता।
शांति दिखाई नहीं पड़ती।
संवेदनाएं दिखाई क्या पड़ेंगी?
भगवान एक संवेदना है।
दिखाई क्या पड़ेगा?
नहीं साहब।
भगवान को हमने देखा है?
हट! भगवान को किसी ने नहीं देखा।
भगवान को कोई नहीं देखता।
भगवान को अनुभव किया जाता है।
किस रूप में?
संवेदनाओं के रूप में।
संवेदनाओं के रूप में किया जाता है।
वह संवेदनाएं असली भगवान की जब आती हैं, तो केवल संवेदना के अलावा और किसी रूप में नहीं आती।
नहीं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
मैं काया हूँ। यह जन्म के दिन से लेकर-मौत के दिन तक मैं मानता रहा। यह मान्यता इतनी प्रगाढ़ थी कि कथा पुराणों की चर्चा में आत्मा काया की पृथकता की चर्चा आये दिन सुनते रहने पर भी गले से नीचे नहीं उतरती थी। शरीर ही तो मैं हूँ-उससे अलग मेरी सत्ता भला किस प्रकार हो सकती है? शरीर के सुख-दुख के अतिरिक्त मेरा सुख-दुख अलग क्यों कर होगा? शरीर के लाभ और मेरे लाभ में अन्तर कैसे माना जाय? यह बातें न तो समझ में आती थीं और न उन पर विश्वास जमता था। परोक्ष पर प्रत्यक्ष कैसे झुठलाया जाय? काया प्रत्यक्ष है-आत्मा अलग है, उसके स्वार्थ, सुख-दुःख अलग हैं, यह बातें कहने सुनने भर की ही हो सकती हैं। सो रामायण गीता वाले प्रवचनों की हाँ में हाँ तो मिलाता रहा पर उसे वास्तविकता के रूप में कभी स्वीकार न किया।
पर आज देखता हूँ कि वह सचाई थी जो समझ में नहीं आई और वह झुठाई थी जो सिर पर हर घड़ी सवार रही। शरीर ही मैं हूँ। यही मान्यता-शराब की खुमारी की तरह नस-नस में भरी रही। बोतल पर बोतल छानता रहा तो वह खुमारी उतरती भी कैसे? पर आज आकाश में उड़ता हुआ वायुभूत-एकाकी-’मैं’ सोचता हूँ। झूठा जीवन जिया गया। झूठ के लिए जिया गया, झूठे बनकर जिया गया। सचाई आँखों से ओझल ही बनी रही। मैं एकाकी हूँ, शरीर से भिन्न हूँ। आत्मा हूँ। यह सुनता जरूर रहा पर मानने का अवसर ही नहीं आया। यदि उस तथ्य को जाना ही नहीं-माना भी होता तो वह अलभ्य अवसर जो हाथ से चला गया, इस बुरी तरह न जाता। जीवन जिस मूर्खता पूर्ण रीति-नीति से जिया गया वैसा न जिया जाता।
शरीर मेरा है-मेरे लिए है, मैं शरीर नहीं हूँ। यह छोटी-सी सच्चाई यदि समय रहते समझ में आ गई होती तो कितना अच्छा होता। तब मनुष्य जीवन जैसे सुर-दुर्लभ सौभाग्य का लाभ लिया गया होता, पर अब क्या हो सकता है। अब तो पश्चाताप ही शेष है। भूल भरी मूर्खता के लिए न जाने कितने लम्बे समय तक रुदन करना पड़ेगा?
.... समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 5
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