Sunday 14, September 2025
पितृदोष एक श्राप? | Pitradosh Ek Shrap?
मनोबल द्वारा रोग का निवारण भाग - 1 | Manobal Dwara Rogo Ka Dwara पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
"साधना का उद्देश्य: भीतर की महानता को जागृत करना"
Fourth and final pilgrimage to the Himalayas Part 03 | My Life its & Legacy Message
अमृतवाणी:- परिवार नियोजन इतना क्यों जरूरी है ? | Pariwar Niyojan Itna Zaruri Kyun Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
आज की रूढ़िवादिता सुधारी जाय | Aaj Ki Rudhivadita Sudhari Jaye | Shantikunj Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 14 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 14 September 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 14 September 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 14 September 2025 !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर #Prageshwar_Mahadev 14 September 2025 !!
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 14 September 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 14 September 2025 !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 14 September 2025 !!
अमृतवाणी: क्रिया और श्रद्धा का संबंध पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जब मेरा भगवान और मेरी गायत्री माता, तीन चरण वाली, मेरे भीतर आ गई,
तो उसका — गायत्री का — प्राण मेरे भीतर आया।
तो वह तीन चीजें लेकर के आया।
क्या है?
एक चीज मैं आपको आज बताऊंगा,
दो चीजें कल बताऊंगा।
क्या?
एक चीज क्या बताएंगे?
एक चीज आई बेटा — मेरे भीतर श्रद्धा।
श्रद्धा, श्रद्धा, श्रद्धा।
श्रद्धा किसे कहते हैं?
श्रद्धा हमारी जीवात्मा की सबसे बड़ी शक्ति है।
सबसे बड़ी शक्ति है — श्रद्धा।
श्रद्धा ऊँचा उठाने के लिए, आगे बढ़ाने के लिए,
मनुष्य के भीतर से आत्मशक्ति विकसित करने के लिए
एक ही आधार है, सबसे बड़ा आधार —
उसका नाम है श्रद्धा।
श्रद्धा का अभाव हो तब...?
तब, बेटे, सब बेकार है।
सब बेकार है।
श्रद्धा के अभाव के बिना आज तक
न कोई अध्यात्मवाद पर चला है,
ना किसी को भगवान से मिलन हुआ है,
ना किसी की शक्तियों का उभार हुआ है।
कोई लाभ नहीं हुआ।
श्रद्धा के भाव के बिना
क्रिया का...?
क्रिया का बेटा क्या महत्व है, ज़रा बता तो सही।
तु माला घुमाता है?
माला घुमाता है तो यह बता —
यह श्रम के हिसाब से कितनी कीमत की हो सकती है?
कितनी देर माला घुमाता है?
15 मिनट?
15 मिनट में कैसे घुमाता है?
जैसे वो उठाते हैं लकड़ी?
जैसे?
"नहीं महाराज जी, लकड़ी से क्या घुमाऊंगा, उंगली से घुमा देता हूं।"
बेटे, लकड़ी फाड़ने का श्रम की दाम क्या हो सकते हैं?
और तेरी माला घुमाने की श्रम की दाम क्या होती है?
उसमें तो श्रम है।
इसमें अकल भी खर्च नहीं होती।
बेअकल का काम है — माला घुमाते रहना।
फिर पागल भी घुमाता रहेगा।
चरखा पागल नहीं घुमा सकता।
पागल को उसमें अकल लगानी पड़ेगी,
तब चरखा काट सकता है।
इसमें क्या अकल लगानी पड़ेगी?
नहीं साहब।
माला में कोई चमत्कार नहीं है।
माला में कहाँ चमत्कार आएगा?
माला में चमत्कार उस दिन आ जाएगा,
जिस दिन इसके साथ में श्रद्धा का समन्वय होगा।
श्रद्धा का समन्वय नहीं है
तो ये खेल-खिलौने हैं।
ये खेल-खिलौने हैं,
और इनकी कीमत खेल-खिलौने से ज्यादा नहीं हो पाएगी,
अगर तेरे पास श्रद्धा का अभाव है।
केवल कर्म है,
केवल क्रिया है,
केवल जबान की नोकों का उच्चारण है,
केवल मात्र हाथ से माला घुमाना है,
केवल चंदन चढ़ाना है,
धूपबत्ती जलाना है —
तो यह क्रिया है।
और क्रिया का जो मूल्य है,
वह तुझे मिलेगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
यह बात नितान्त सत्य है कि किसी मृतक व्यक्ति का सम्बन्धी मृतक भोज खुशी से नहीं देता। वह इस अनुचित एवं अपव्ययी दण्ड को मजबूरन सहन करता है—क्योंकि समाज में इसकी प्रथा चल रही है और वह एक सामाजिक व्यक्ति है, समाज की रीति-नीतियों का उल्लंघन कर सकना उसके वश की बात नहीं है।
किसी अमीर आदमी की बात तो छोड़ दीजिए। वह अपने मरों के नाम पर कुछ भी खर्च कर सकते हैं, बांट सकते हैं, लुटा सकते हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। ‘‘समरथ को नहीं नहीं दोष गुसाईं’’ के अनुसार उन्हें तो कोई भी प्रदर्शन एवं शोन-शेखी जेवा देती है। प्रश्न उन साधारण व्यक्तियों का है जो दोनों छाक अपने बच्चों के लिये भोजन भी कठिनता से जुटा पाते हैं और जिनकी संख्या समाज में अस्सी-नब्बे प्रतिशत से कम नहीं होती। इस प्रकार की आर्थिक आत्म–हत्या का प्रश्न उन्हीं सामान्य लोगों के लिये ही है। समाज में जब तक मृतक-भोज जैसी विनाश कारी प्रथा प्रचलित ही है तब उसको किस प्रकार रोका जाये—इस पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि मृतक-भोज खाने वालों को ही इसका प्रचलन रोकने के लिये उदारतापूर्वक तत्पर होना चाहिये।
जब किसी का कोई स्वजन मर जाता है तब सामाजिक नियम उसे मृतक भोज देने के लिए तकाजा करता है। इस तकाजे में परोक्ष रूप से उस जातीय बहुमत का दबाव रहता है जो उसके यहां खाने के लिए जाने वाला होता है। यद्यपि यह बहुमत मृतक व्यक्ति के घर जाकर उसके सम्बन्धी से सीधे-साधे भोज की मांग नहीं करता तब भी उसकी यह मांग जातीय बहिष्कार के रूप में नग्न हो उठती है जब कोई आर्थिक कठिनाइयों के कारण मृतक भोज नहीं दे पाता अथवा देने में आना-कानी करता है। इस प्रकार यह दबाव खाने वालों की ओर से ही पड़ा करता है। यदि भोजन का लोभ छोड़ कर जातीय बन्धु थोड़ी उदारतापूर्वक काम लें तो यह समस्या सहज ही हल हो सकती है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 82
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