Monday 15, September 2025
मनोबल द्वारा रोग का निवारण भाग - 02 | Manobal Dwara Rog Ka Nivaran Part 02 पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
पूवर्जो का उद्धार कैसे हुआ | Purvajo Ka Uddhar Kaise Hua
दरिद्रता | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 15 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: आध्यात्मिकता का आधार पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आध्यात्मिक क्षेत्र में अगर प्रवेश करना है, आध्यात्मिकता के चमत्कार देखने हो, तो आपको एक शक्ति का उत्पादन करना ही पड़ेगा, जिसका नाम है — श्रद्धा।
श्रद्धा अगर आपने पैदा नहीं की है, तो मैं आपसे यह कहता हूं — आपका श्रम बेकार चला जाएगा।
आप मंत्र के अक्षरों का चमत्कार देखना चाहेंगे, तो मैं कहता हूं — मंत्रों के अक्षरों में कोई चमत्कार नहीं है।
अगर आप यह देखना चाहते होंगे कि किसी देवी-देवता के पत्थर या खिलौने में कोई चमत्कार है, तो मैं कहता हूं — आपको किसी देवता के पत्थर में कोई चमत्कार नहीं है।
नहीं साहब! देवता में बड़े चमत्कार होते हैं।
बेटे, चमत्कार वो होते हैं जैसे मोहम्मद गजनवी का। अब तुझे किस्सा बताता हूं।
मोहम्मद गजनवी हिंदुस्तान में आया। हिंदुओं का सबसे बड़ा मंदिर उन दिनों सोमनाथ का मंदिर था।
सोमनाथ के मंदिर में जाकर उसने मोहम्मद गजनवी पंडितों को, पुजारियों को बुलाया।
उन्होंने कहा — “हम आपके मंदिर की, इसकी जो मूर्ति है, उसे तोड़ेंगे।”
पुजारियों ने कहा — “आप इस मूर्ति को मत तोड़िए, इसके बदले में हम आपको पैसा दे देंगे। मूर्ति को पड़ा रहने दीजिए, जनता की आस्था है उसमें।”
गजनवी ने कहा — “तोड़ने की एक वजह है। आप यह कहते हैं कि मूर्ति में चमत्कार है, मूर्ति में करामात है। अगर चमत्कार है, करामात है, तो यह सेवा करने वाले, पूजा करने वाले को निहाल कर सकती है, भक्ति दे सकती है, शांति दे सकती है, कोई चमत्कार दिखा सकती है। तो हम को नुकसान पहुँचाएगी, तोड़ने पर हमें मारेगी जरूर। अगर हमें नुकसान हुआ, तो हम मान लेंगे — फिर हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ना बंद कर देंगे।”
"हम यह देखना चाहते हैं कि क्या यह शंकर भगवान, जो हिंदुओं के देवता हैं, हमारा कोई नुकसान कर सकते हैं?"
बहुत समझाया गया पर उसने नहीं माना।
वह बोला — “नहीं, मैं नहीं मानूंगा। मैं तो एक खोज करने वाला आदमी हूं, और नुकसान उठाने को तैयार हूं। इसीलिए मैं तो तोड़ूंगा जरूर। न मैं आपके पैसे से मानूंगा, न किसी बात से मानूंगा।”
उसने सोमनाथ के मंदिर की मूर्ति के चार टुकड़े किए।
चार टुकड़े देने के बाद भी कोई नुकसान नहीं हुआ।
उन्होंने कहा — “शायद नुकसान में देर हो।”
इसलिए उन्होंने कहा — “अभी और जगह में भेज देता हूं, ताकि यह नुकसान कर सके हमें।”
उन्होंने चार मस्जिदें, जो अरब देशों में बड़े धार्मिक केंद्र हैं, वहां ये टुकड़े गढ़वा दिए —
- एक काबा में,
- एक कंधार में,
- एक काबुल में,
- और एक अन्य जगह — उन जगहों पर, जहां जूते उतारे जाते हैं नमाज से पहले, वहाँ शंकर भगवान के चार टुकड़े गढ़े हुए हैं।
न कोई चमत्कार हुआ, न कोई नुकसान हुआ।
कोई चमत्कार नहीं होता बेटे, कोई चमत्कार नहीं होता।
अखण्ड-ज्योति से
इस मान्यता में कोई तथ्य नहीं कि घर में बहुत लोगों के भोजन करने से सूतक दूर होता और घर पवित्र होता है। कई बार इसी मान्यता के कारण बहुत से भाई किसी एक भाई के घर जाकर और खाकर पवित्र करते हैं। यदि ऐसा ही हो तो एक बड़े भोज का दण्ड देने के बजाय किसी ऐसी वस्तु की व्यवस्था की जा सकती है जिसमें किसी गरीब आदमी का बहुत कुछ खर्च न हो। ऐसी वस्तुओं से शक्कर या गुड़, शरबत जैसी वस्तुओं तक सीमित रहा जा सकता है।
पुण्य पर प्रभाव पड़ने के कारण ही अच्छे और सच्चे सन्त महात्मा किसी का दान लेने अथवा अन्न खाने से यथासम्भव बचा करते हैं दान लेना और दान रूप अन्न को खाना पचाना सबके वश की बात नहीं है। इन दोनों चीजों का प्रभाव मनुष्य की आत्मा पर अवश्य पड़ता है वह सुनिश्चित तथ्य एवं सत्य है। किन्तु इसका प्रभाव इतने परोक्ष एवं सूक्ष्म रूप से पड़ता है कि साधारण विवेक का व्यक्ति उसे देख जान नहीं पाता। उसका पता तब चल पाता है जब सारे संस्कार विकृत हो जाते हैं और मनुष्य अपने आचरण में एक बड़ा और विपरीत परिवर्तन पाता है। किन्तु तब तक प्रभाव इतना गहरा हो चुका होता है कि उसको मिटा सकना टेढ़ी खीर बन जाता है। यही कारण है कि बुद्धिमान लोग दान रूप अन्न को समझ बूझकर ही खाते हैं।
यह व्यवस्था तो उस अन्न की है जिसमें देने अथवा खिलाने वाले की आत्मिक श्रद्धा तथा प्रसन्नता रहा करती है। इसके विपरीत जिन अन्य भोजन अथवा अन्न दान में देने वाले की श्रद्धा भक्ति तो दूर उल्टे पीड़ा पूर्ण आहें जुड़ी रहती हैं उसके भयंकर प्रभाव का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता और निश्चय ही मृतक भोज का दण्ड भुगतने वाले की आत्मा के आंसू उसमें सम्मिलित रहते हैं।
भले ही मजबूरन कोई प्रथा-पालन की विवशता में मृतक भोज दें और कितनी ही प्रसन्नता क्यों न दिखाये और खाने वालों को धन्यवाद देकर आभार प्रकट करे, पर वास्तविकता यही होती है कि यह सारा शिष्टाचार ऊपरी होता है भोज देने वाला मन ही मन रोया करता होगा। एक तो जिसका कोई स्वजन मर गया हो दूसरे उसे ऊपर से अपनी सामर्थ्य के बाहर मृतक भोज जैसे आर्थिक दण्ड को भुगतना पड़े और तब जब किसी की मृत्यु में उसका कोई अपराध नहीं, कोई हाथ नहीं, तो वह रोयेगा नहीं क्या हंसेगा, खुश होगा? वह न सही उसकी मूक आत्मा अवश्य ही इसके लिये समाज को कोसेगी। इसलिये, इस प्रकार मृत्यु-भोज का अन्न किसी भी खाने वाले के लिये हितकर नहीं है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 83
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