Tuesday 16, September 2025
श्राद्ध में पंचबलि विधान | Shradh Me Panchbali Ka Vidhan
मनोबल द्वारा रोग का निवारण भाग - 03 | Manobal Dwara Rog Ka Nivaran Part 03 पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
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अमृतवाणी:- भजन करने के बाद भी फायदा क्यों नहीं ? | Bhajan Ke Bad Bhi Fayda Kyun Nhi पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! शांतिकुंज दर्शन 16 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: श्रद्धा का चमत्कार पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
मैं एक दीपक के पास जब बैठता हूँ, जब दीपक के जप करने के लिए बैठता हूँ — अखंड दीपक पर —
तो मुझे अलादीन का चिराग याद आता है।
मैंने सुना है विक्रमादित्य के वीरों के बारे में।
विक्रमादित्य के वीर बहुत चमत्कारी थे।
और हमारा अखंड दीपक भी उसी तरह का चमत्कारी है।
तो महाराज जी, दीपक हम जला लें?
बेटे, तुम जला लोगे —
लेकिन तेरा दीपक काम नहीं करेगा।
तेरे दीपक से तो किताब पढ़ने का काम हो जाएगा,
कोठरी में सुगंध हो जाएगी,
थोड़ी-सी रोशनी हो जाएगी।
लेकिन —
तेरे दीपक और हमारे दीपक में जमीन-आसमान का फर्क है।
हमारे दीपक में घी नहीं जलता है।
हमारे दीपक में जलती है — श्रद्धा।
श्रद्धा जलती है।
हमारी श्रद्धा जलती है।
और श्रद्धा का चमत्कार है।
श्रद्धा का आलोक है।
तुम्हारे पास श्रद्धा का अभाव है।
श्रद्धा के अभाव में उपासना के फल नहीं आ सकते।
उपासना के चमत्कार नहीं आ सकते।
श्रद्धा, श्रद्धा पैदा करती है।
श्रद्धा भगवान को पैदा करती है।
श्रद्धा मंत्रों में शक्ति पैदा करती है।
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श्रद्धा का फल देखा नहीं तुमने?
श्रद्धा का निषेधात्मक फल भी नहीं देखा?
झाड़ी में से साँप पैदा हो जाता है।
रस्सी का साँप बन जाता है —
और काटता है —
आदमी मर जाता है।
क्यों? किस वजह से?
श्रद्धा।
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श्रद्धा की एक घटना है।
यह घटना रामबाड़े की है।
एक आदमी था, पहलवान।
उसने बाड़े में जाकर तीन बार कहा —
"मैं रात को मरघट जाऊँगा।"
लोग बोले — "भूत रहता है वहाँ!"
वो बोला — "मैं भूत को देख लूंगा, क्या कर लेगा!"
वो रात को मरघट गया।
हथौड़ा ले गया, कील ले गया।
धोती जमीन पर रखी,
उस पर कील रख दी।
अंधेरा था।
उसे दिखा नहीं कि कील कहाँ जा रही है।
हथौड़ी मार दी —
कील ज़मीन में धँस गई,
धोती उसमें फँस गई।
जब उठाना चाहा,
धोती नहीं उठी —
उसे लगा भूत ने पकड़ लिया।
वो चिल्लाया — "ईं... ईं...!"
डर के मारे, वहीं हार्ट फेल हो गया।
प्राण छूट गया।
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ये हैं भूत!
हिंदुस्तान में आते हैं भूत।
अमेरिका में नहीं हैं।
जापान में नहीं हैं।
जर्मनी में नहीं हैं।
इंग्लैंड में नहीं हैं।
पूरी दुनिया में कहीं नहीं हैं —
भूत सिर्फ हिंदुस्तान में हैं।
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तू कहीं चला जा,
पूरी दुनिया घूम आ —
खाँसी मिलेगी,
जुकाम मिलेगा,
दर्द मिलेगा —
लेकिन भूत नहीं मिलेगा।
किसी से पूछ लो —
"क्या आपके यहाँ भूत आता है?"
वो कहेंगे —
"भूत? कैसा भूत?
छींक आती है, बुखार आता है —
भूत नहीं आता।"
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भूत कहाँ रहता है?
मन में।
शंका में।
शंका आया — भूत आया।
डर आया — भूत आया।
भूत हमारे पेट से निकलता है।
भूत हमारे दिमाग से निकलता है।
भूत डराता है।
बीमार करता है।
प्राण ले जाता है।
अखण्ड-ज्योति से
इस पाप-पुण्य की सूक्ष्म बात को छोड़ कर यदि साधारण सामाजिकता की स्थूल बात भी ले ली जाय तब भी मृतक भोज खाने की प्रथा उचित नहीं। अब आज के अर्थाभाव एवं महार्घता के समय में किसी के मरने पर मृतक भोज में इतना धन खर्च कर सकना कौन बुद्धिमानी की बात है। जहां कठिनता से नमक रोटी जुड़ती हो, वहां साधारण स्थिति का कोई व्यक्ति इतने रुपये किस प्रकार बचा कर रख सकता है कि शोक-संयोग आने पर वह घर से तत्काल निकाल कर मृतक-भोज आदि में खर्च कर सके।
निश्चय ही उसे इस प्रथा पिशाचिनी की भेंट-पूजा के लिये कर्ज लेना होता है और एक बार एक सामान्य आदमी के लम्बी रकम कर्ज लेने का अर्थ है अपने को आजीवन मूल तो दूर ब्याज के हाथ बेच देना। बच्चों के पालन पोषण और परिवार के संचालन के लिए आवश्यक कमाई का अधिकांश नियमित रूप से महाजन के हवाले करते रहना। अथवा अपनी जमीन-जायदाद, गहने, बर्तन बेचने के लिए मजबूर होना। मृतक-भोज की प्रथा ग्रस्त लोगों पर यह आर्थिक आपत्ति आये दिन ही रहती है, जिसको सभी प्रथा पालक देखते-सुनते ही रहते हैं।
करें
खेद का विषय है कि किसी एक विषय में खुद तो लोग कुछ जानते नहीं, केवल आंख मीचे हुये लकीर पीटे चले आ रहे हैं और यदि कोई विचारशील व्यक्ति उनकी हित चिन्ता से कुछ बता कर सुधार करने का परामर्श देता है तो सुधार करना तो दूर उसकी बात भी ध्यान से नहीं सुनना चाहते। इसे समाज का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जा सकता है? जिन समाजों के सदस्य इस प्रकार के प्रतिगामी समाजों के सुधार के लिये उसके जागरूक तथा सम्पन्न व्यक्तियों को आगे निकल कर सामाजिक मूढ़ता के विरुद्ध सुधार का अभियान छेड़ ही देना चाहिये।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 84
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