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Wednesday 17, September 2025

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ध्यान कैसे करें ?

ध्यान कैसे करें ?

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पितृदोष एक श्राप? | Pitradosh Ek Shrap?

पितृदोष एक श्राप? | Pitradosh Ek Shrap?

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ज्ञान | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या

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मानसिक संतुलन | Mansik Santulan

मानसिक संतुलन | Mansik Santulan

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"प्रार्थना: पवित्र हृदय से परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग"

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अमृतवाणी:- चार खंड वाली उपासना का रहस्य क्या है ? | Char Khand Wali Upasana Ka Rehsya Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- चार खंड वाली उपासना का रहस्य क्या है ? | Char Khand Wali Upasana Ka Rehsya Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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 रात भर भोगा अँधेरा, घुटन अन्धापन झराने | Raat Bhar Bhoga Andhera | परम वन्दनीय माता भगवती देवी शर्मा Shantikunj Rishi Chintan- AWGP 218K subscribers

रात भर भोगा अँधेरा, घुटन अन्धापन झराने | Raat Bhar Bhoga Andhera | परम वन्दनीय माता भगवती देवी शर्मा Shantikunj Rishi Chintan- AWGP 218K subscribers

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 17 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4

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अमृतवाणी: श्रद्धा की शक्ति पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



समाज में मृतक-भोज की कुप्रथा इसी प्रकार की प्रतिगामिनी विचारधारा के कारण ही अब तक चली आ रही है नहीं तो इसकी निःसारता, निरर्थकता तथा अहितकारिता बहुत पहले सिद्ध हो चुकी है और लोग इसके दुःखद परिणामों से बहुत अधिक त्रस्त हो चुके हैं। अब यह कुप्रथा अन्ध-विश्वास के एक कच्चे सूत्र के आधार पर टिकी है। अब आवश्यकता केवल इस बात की है कि समाज के बुद्धिमान् साहसी लोग इसका प्रचलन उठा कर मृत्यु भोज के बहिष्कार की नई स्वस्थ एवं हितकर परम्परा का सूत्रपात कर दें। सूत्रपात भर की देर है बाकी समाज के लोग तो भेड़चाल की आदत वाले होने से यों ही बहिष्कार करने लगेंगे। अब देखना यह है कि मृतक भोज के बहिष्कार का प्रथम सूत्रधार बनकर श्रेय कौन साहसी कहां और किस समय लेता है?

असलियत वास्तव में यह है कि अपने किसी स्वजन सम्बन्धी की मृत्यु पर किसी को प्रसन्नता होती नहीं जिसमें वह इस प्रकार के भोज करने के लिये उत्साहित हो। यह मृतक-भोज वह खुशी से नहीं करता बल्कि उसमें जबरदस्ती कराया जाता है। यदि मृतक-भोज खाने वाले भोजन करने को तैयार न हों तो किसी भी शोक संतप्त व्यक्ति को उत्साह न होगा कि वह एक बड़ी दावत का आयोजन करे ही और लोगों को खाने के लिए सानुरोध आमन्त्रित करे। यदि लोग एक बार खाने से इन्कार करें तो भोज देने को विवश—मृतक का सम्बन्धी खुशी-खुशी दस बार अपनी बर्बादी बचाने को तैयार हो जाये और लोगों का आभार माने।
             

 यदि एक बार किसी खुशी के अवसर पर कोई किसी भोज का आयोजन करता है और उसके इष्ट-मित्र सम्बन्धी तथा सजातीय लोग आने और खाने से इन्कार कर दें तब तो अवश्य कुछ दुःख का विषय हो सकता है। मृतक-भोज के लिये आने और भोजन करने से इन्कार किये जाने पर आयोजक के दिन दुःखने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह तो उसकी प्रसन्नता का प्रसंग होगा।

.... क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 85

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सारी बीमारियों का कारण आदमी का दिमाग है, आदमी की समझ है, आदमी की अक़्ल और आदमी के विचार हैं। और आदमी का चरित्र है, आदमी की निष्ठा और आदमी का विश्वास है।
सब कुछ — मनुष्य का न केवल मानसिक, न केवल आध्यात्मिक, बल्कि शारीरिक ढांचा, पारिवारिक ढांचा — उसकी अक्ल पर टिका हुआ है।
अक्ल पर टिका हुआ है।
इसके बारे में कभी अखंड ज्योति में लेख भी पढ़ते होंगे।
मैं क्या कह रहा था?
मैं यह कह रहा था —
यह जो श्रद्धा है, आदमी की विचारणा है —
आदमी के जीवन पर छाई रहती है,
और आध्यात्मिक जीवन पर भी छाई रहती है।
आध्यात्मिक महानताएं उसी से बढ़ती हैं।
श्रद्धा, मनोवयम् पुरुषः योगशब्दः च एवषः।
आदमी कुछ नहीं है।
यह आदमी केवल अपनी श्रद्धाओं का ज़खीरा है।
आपने अपने आप को दरिद्र मान लिया है,
तो आप वास्तव में दरिद्र हैं।
और अपने आप को घटिया और दुखी मान लिया है,
तो वास्तव में, ईमानदारी से, आप दुखी हैं।
दुखी रहेंगे।
और जिस दिन आप यह मान लेंगे कि "हम दुख नहीं हैं,"
मैं कहता हूं —
आपको दुख छू भी नहीं सकेगा।
________________________________________
यह श्रद्धा की शक्ति है।
यह श्रद्धा का चमत्कार है।
मनुष्य के जीवन के लिए इतने महान हैं कि मैं क्या कह सकता हूं।
________________________________________
मेरे गुरु ने मेरी उपासना में श्रद्धा के तत्व का समावेश कर दिया।
समावेश कर दिया।
और समावेश करने के कारण —
हमारे मंत्र शक्तिवान हैं।
हमारी उपासना शक्तिवान है।
हमारा ध्यान शक्तिवान है।
हमारी गायत्री शक्तिवान है।
हमारे अनुष्ठान शक्तिवान हैं।
क्योंकि उसके साथ जुड़ा हुआ जो तत्व है —
श्रद्धा का तत्व जुड़ा हुआ है।
________________________________________
श्रद्धा का तत्व अगर आपके जीवन से जुड़ता है,
तो आपके जीवन में मज़ा आ जाए।
आप देखें —
आपकी गायत्री कितनी सार्थक होती है,
कितनी शक्तिवान होती है।
जितनी हमारी गायत्री सामर्थ्यवान होती चली गई —
हमें बड़ा विश्वास है बेटे।
हमें अटूट विश्वास है।
हमें अकाट्य विश्वास है।
________________________________________
हमें अपने मंत्र पर विश्वास है,
अपनी गायत्री पर विश्वास है,
अपने भगवान पर विश्वास है,
अपने गुरु पर विश्वास है।
________________________________________
यह विश्वास मूढ़ विश्वास नहीं है।
यह अंधविश्वास नहीं है।
यह विवेकपूर्ण विश्वास है।
यह विचारपूर्ण विश्वास है।
यह सिद्धांतों के प्रति विश्वास है।
यह आदर्शों के प्रति विश्वास है।
और बहुत गहरा विश्वास है।
इससे ज़्यादा गहरा विश्वास
मैं नहीं जानता किसी का, किसी पर हो।
________________________________________
हमारे लिए —
विश्वास को ही हम श्रद्धा कहते हैं।

 

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अखण्ड-ज्योति से




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