Thursday 18, September 2025
सत्संग का महत्त्व | Satsang Ka Mahatva, The Significance of Satsang | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्री का अर्थ | Gayatri Ka Arth
ईश्वर के बिना ज्ञान अधूरा है"
बुजुगों से शिष्टाचार बरतो। श्रीराम शर्मा आचार्य जी
प्रायश्चित या परस्कार | Praschit Ya Puruskar
दीप हूँ जलता रहूँगा, मैं प्रलय की आँधियों से | Deep Hun Jalta Rahunga | Mata Bhagwati Devi Bhajan
अमृतवाणी:- भजन में मन क्यों नहीं लगता ? | Bhajan Mei Man Kyun Nhi Lagta पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 18 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 18 September 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 18 September 2025 !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
देवियों! भाइयों!
गायत्री मंत्र, जिसके लिए आपको कुछ ज्यादा जानकारियाँ देने का मेरा मन था। इसीलिए शिविर लगाया। तीन चरण के बारे में मैं कल आपसे निवेदन कर ही चुका। त्रिपदा का हमारा भावनात्मक स्वरूप क्या होना चाहिए? क्रियात्मक स्वरूप बड़ा सुलभ है। क्रियात्मक स्वरूप में क्या बनता है? क्रियात्मक स्वरूप में क्या शक्ति खर्च होती है? क्रियात्मक स्वरूप क्या है, ज़रा बताइए।
मूर्ति बनाने के लिए उसका क्रियात्मक रूप क्या हो सकता है?
एक छेनी आती है, एक हथौड़ा आता है और पत्थर है। एक हथौड़ा आता है, एक पत्थर आता है।
पत्थर कितने का आता है? चार रुपए का आता है।
और छेनी कितने की आती है? डेढ़ रुपए की आती है।
हथौड़ा कितने का आता है? पौने दो रुपए का आता है।
कितने का सामान हो गया? 10 रुपए का।
मूर्ति कितने की बननी है? एक हजार रुपए की।
क्यों साहब, चार रुपए में एक हजार रुपए कैसे खर्च कर सकते हैं?
इसमें उस कलाकार का श्रम भी लगा हुआ है, उसकी कला लगी हुई है, जिसने छेनी-हथौड़ी के आधार पर अपनी कला का प्रकटीकरण किया है।
बेटे, यह क्यों भूल जाते हैं आप?
छेनी-हथौड़ा, छेनी-हथौड़ा, छेनी-हथौड़ा, छेनी-हथौड़ा — इससे मूर्ति कैसे बन जाएगी? मूर्ति नहीं बन सकती।
चित्रकार किससे बनाता है चित्र?
कागज से, कलम, रंग, ब्रुश — कितने रुपए का?
सवा रुपए का रंग, रंग की डिब्बी कितने रुपए की? ढाई रुपए की।
कागज कितना? कागज कितना? एक रुपए का।
कितने का बनेगा चित्र? एक हजार रुपए का चित्र बनेगा।
क्यों साहब, यह तो बड़ी किफायत हो गई। डेढ़ सौ रुपए में बन गई।
बेटे, डेढ़ सौ रुपए में बना है — यही तो तू समझता नहीं है।
चित्रकार की कला, चित्रकार का शिक्षण कितने दाम का है? कितने दाम का है?
यह कागज, यह कविता लिखी थी — यह पीएचडी का थीसिस लिख दिया, अमुक लिख दिया।
काहे से लिख दिया? कलम से लिख दिया, फाउंटेन पेन से लिख दिया, स्याही से लिख दिया।
क्यों साहब?
कलम, फाउंटेन पेन और स्याही की कीमत पर हम पीएचडी बन सकते हैं? हम एम.ए. हो सकते हैं?
नहीं बेटे, एम.ए. नहीं हो सकता।
पीएचडी होने के लिए कलम काफ़ी नहीं है।
ज़रूरी तो है, काफ़ी नहीं है।
कलम ज़रूरी तो है, काफ़ी नहीं है।
काफ़ी नहीं है।
इसके लिए क्या करना पड़ेगा? इसके लिए आदमी को विद्वान बनना पड़ेगा, अध्ययन करना पड़ेगा।
क्यों साहब, कलम से तो काम चल सकता है?
नहीं बेटे, कलम से काम नहीं चलेगा।
जब तू लेख लिखेगा तो कलम की ज़रूरत ज़रूर पड़ेगी, लेकिन कलम से काम नहीं चल सकता।
अकेली कलम को लेकर के तू चाहता हो कि हम पीएचडी हो जाएंगे, और एम.ए. हो जाएंगे, और हम कविताएँ लिख देंगे, और कागज पर लिख लेंगे, कलम से लिख लेंगे।
कलम से लिखा जाता है, पर कलम चलाने के लिए तो कोई चीज मालूम पड़ती है।
तुझे मालूम नहीं है क्या मालूम होना चाहिए?
तलवार से लड़ाई लड़ी जाती है बेटे?
तलवार से नहीं लड़ाई लड़ी जाती।
तलवार के अलावा आदमी की कलाई में ताक़त और कलेजे में हिम्मत होनी चाहिए।
अखण्ड-ज्योति से
स्वजन के शोक के साथ मृतक-भोज की अनावश्यक, अपव्ययता के दोहरे दण्ड से बच कर वह न जाने कितना खुश होगा। हां इसमें थोड़ी सी यह बात अवश्य हो सकती है कि इस भोज के मृतक का सम्बन्धी स्वजनों एवं जातीय लोगों के आगमन से अपने तथा अपने घर को पवित्र होने की जो धारणा रखता है उसको कुछ ठेस लगेगी। इसके स्थान पर पवित्रीकरण के लिए थोड़ा कर्मकांड एवं थोड़ा दान-पुण्य स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है।
अब मृतक-भोज के समर्थकों एवं परिपालकों को सोचना चाहिए कि वे अपने किसी सजातीय बन्धु पर मृतक-भोज देने के लिए दबाव डाल कर कितना बड़ा अत्याचार करते हैं। किसी का घर बरबाद कर देना सामाजिकता अथवा सजातीयता इसमें है कि मृतक भोज का दण्ड देने के बजाय अपने जातीय बन्धु को अधिक से अधिक सान्त्वना दी जाये, उसे न घबराने के लिए ढांढस बंधाया जाये और यदि घर का संचालक दिवंगत हो गया है तो उसकी विधवा तथा बच्चों की यथासंभव सहायता की जाये। चाहिए तो यह कि उसकी जाति-बिरादरी के लोग और बन्धु-बांधव अपने शोक-संतप्त भाई को सान्त्वना एवं सहायता दें किन्तु लोग उससे मृतक-भोज लेकर मरे को और मार डालते हैं यदि कोई इस दण्ड का भार वहन नहीं कर पाता तो उसकी जाति बाहर करके दीन-दुनियां के अयोग्य बना देते हैं।
अपने किसी सजातीय अथवा बन्धु-बांधव की इस प्रकार उभय प्रकारेण हत्या ठीक नहीं। इससे सामाजिक एवं जातीय ह्रास होता है। बन्धु-वध जैसा पाप लगता है। अस्तु, आवश्यक है कि मृतक भोज खाने वाले इसे हर प्रकार से अनुचित समझकर इसका सर्वथा बहिष्कार करके समाज एवं जाति का उपकार करें।
.... समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए पृष्ठ 86
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