Friday 19, September 2025
गायत्री माता आरती | Gayatri Mata Aarti | Shantikunj Haridwar Rishi Chintan
अमृतवाणी:- उपासना की सरल परिभाषा क्या है ? | Upasana Ki Saral Paribhasa Kya Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! शांतिकुंज दर्शन 19 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: उपासना का एक क्रिया पक्ष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
गायत्री मंत्र उपासना, किसी भी उपासना का एक क्रिया पक्ष छोटा सा है। क्रिया पक्ष में कोई दम है बेटे? कोई खास दम नहीं है। अगर दम है, तो उसकी है, जो उसके पीछे जो प्राण काम करता है, उसकी दम है। दम किस में है? प्राण। प्राण जहाँ गायत्री का रहता है।
और उपासना को लोगों ने कलेवर को न जाने क्या महत्त्व मान लिया है। क्रिया में कितने कलेवर की बात, कलेवर की शिक्षा, कलेवर की शिक्षा। कलेवर में यह बता दीजिए, बीज मंत्र लगा दीजिए, ये गायत्री माता इसमें चलेगी। मृत्युंजय मंत्र इसमें चलेगा, ये पूजा ऐसी चलेगी।
हमारी पूजा में कोई गलती रह गई हो, तभी गायत्री माता नाराज हो गई होगी। हाँ, पूजा से जरूर गायत्री माता नाराज हो जाएगी। बाल्मीकि को सीधा राम भी लेना नहीं आया, राम नाम भी कहना नहीं आया। मरा मरा कहता रहा, मरा मरा कहते हुए उल्टा नाम जपा। जग जाना, बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।
क्या कह रहे हैं आप? मैं यह कह रहा हूँ, यही विधियों को... विधि, विधि, विधि, विधि, विधि, विधि... रत्ती भर की चीज को पहाड़ बनाता है। विधियाँ, विधियाँ, विधियाँ, विधियाँ। यह विधि से यह हो जाएगा, यह विधि से यह हो जाएगा।
भगवान विधियाँ ही तलाश करता फिरता है? भगवान किसी आदमी की भक्त होने का इम्तहान और परीक्षा इसीलिए लिया करता है? उसको कौन सी विधि आती है, कौन सी नहीं विधि आती है? अगर वह विधियों के ऊपर टिका होता, ये पंडित लोग अब तक सब भगवान के और सब देवता को खरीद करके, सब के मालिक बन गए होते। ये सबके बॉस हो गये होते।
उनको सब विधियाँ आती हैं। इनको सब श्लोक आते हैं। इनको सब मंत्र आते हैं। इनको सब कर्मकांड आते हैं। सब विधियाँ आती हैं। विधियों के आधार पर अगर बात चली होती आगे, तो ये सब के मालिक होते पंडित लोग। क्योंकि ये सब विधियाँ जानते हैं और लोग तो नहीं जानते। आप तो नहीं जानते, आप कैसे देवता के काबू में आ सकते हैं? देवी तो उसके काबू में आएंगी जो विधि जानता है?
बेटे, ऐसी बात नहीं है।
क्या निवेदन कर रहा था मैं दो दिनों में? एक बात समझाने की कोशिश की। कर्मकांड हमने भी वही किये हैं। कर्मकांड आप करते हैं बेटे। हम बिल्कुल कर्मकांड करते हैं। कर्मकांड की आप उपेक्षा करते थे, मजाक उड़ाते थे?
नहीं बेटे, मैं मजाक नहीं उड़ा सकता। मैंने कर्मकांड की शिक्षा दी है। मैंने कर्मकांड की पुस्तकें लिखी हैं। मैंने कर्मकांड के विधि विधान बनाए हैं। कर्मकांड में स्वयं करता हूँ। कर्मकांडों में मेरा बड़ा विश्वास है।
अखण्ड-ज्योति से
बात उन दिनों की है जब रूस में जार अलेक्जेंडर का शासन था। उसके व्यक्तिगत निवास में बहुत थोडे और विश्वसनीय लोग ही पहुँच सकते थे, इसलिए कितने ही रहस्य ऐसे थे, जो औरो तक कभी प्रकट नहीँ नहीं हो सके।
एक दिन प्रशा के राजदूत बिस्मार्क जार से भेंट करने उनके महल पर गये। बिरमार्क जहाँ बैठे थे उसके ठीक सामने खिड़की पडती थी बहुत पीछे तक का बाहरी दृश्य भी वहाँ से अच्छी तरह दिखाई दे रहा था। बिस्मार्क ने देखा कि बहुत देर से एक रायफलधारी संतरी मैदान मे खडा है जबकि रक्षा करने जैसी कोई वस्तु वहाँ पर नहीं है। शांतिकाल था- इसलिये सैनिक गश्त जैसी कोई बात भी नहीं थी।
बडी़ देर हो गई तब बिस्मार्क ने जार से पूछा-यह संतरी क्यों खडा़ है? जार को स्वयं भी पता नहीं था कि संतरी वहाँ किस बात का पहरा दे रहा है ?
जार ने अपने अंगरक्षक सेनाधिकारी को बुलाया और पूछा- यह संतरी इस पीछे के मैदान में किसलिए नियुक्त किया जाता है ? सेनाधिकारी ने बताया-सरकार! यह बहुत दिनों से ही यही खड़ा होता चला आ रहा है। जार ने थोडा कडे़ स्वर में कहा- यह तो मैं भी देख रहा हूँ मेरा प्रश्न यह है कि संतरी यहाँ किसलिए खडा होता है ' जाओ और पता लगाकर पूरी बात मालूम करो।''
सेनाधिकारी को कई दिन तो यह पता लगाने में ही लग गए थे। चौथे दिन सारी स्थिति का पता कर वह जार के सम्मुख उपस्थित हुआ और बताया- 'पुराने सरकारी कागजात देखने से पता चला कि ८० वर्ष पहले महारानी कैथरीन के आदेश से एक संतरी वहां खडा किया गया था। बात यह थी कि एक दिन जब वे घूमने के लिए निकली, तब इरा मैदान में बर्फ जमा थी। सारे मैदान में एक ही फूल का पौधा था और उसमें एक बहुत सुंदर फूल खिला हुआ था।
कैथरीन को वह फूल बेहद सुंदर लगा सो उसकी सुरक्षा के लिए तत्काल वहाँ एक संतरी खडा़ करने का आदेश दिया और इस तरह वहाँ संतरी खडा़ करने की परपरा चल पडी़। ८० वर्ष हो गए न किसी ने आदेश को बदला, न किसी ने उसकी आवश्यकता अनुभव की, सो उस स्थान पर व्यर्थ ही पहरेदारी बराबर चलती आ रही है। जार को गुस्सा भी आया और हँसी भी। गुस्सा इसलिए कि परंपराओं का निरीक्षण न होने से यह खर्च व्यर्थ ही होता रहा और हँसी इसलिये कि पहले तो एक भी फूल था पर ८० वर्ष से तो उस मैदान में अच्छी घास भी नहीं है, न जाने संतरी किसकी रखवाली कर रहा है ?
कहानी यहाँ समाप्त नहीं हो गई वरन् सही कहानी अब प्रारंभ होती है और वह यह है कि समाज में स्वय आज दहेज, पर्दा प्रथा जाति-पाँति ऊँच-नीच, मृतक भोज स्वस्थ परंपरा के रूप में प्रचलित किए गये थे। अब अंध परंपरा बन चुके हैं। वर्तमान परिस्थितियों में न तो उनकी आवश्यकता है और न उपयोगिता फिर भी न तो कोई यह देख रहा कि यह परंपराऐं आखिर किस उद्देश्य से बनी थी और न ही कोई उन्हें मिटाने का साहस कर रहा है। हम व्यर्थ ही उपहास और अपव्यय के पात्र बने उन्हें अपने छाती से वैसे ही चिपकाए है जैसे-रूस का यह बिना कारण-पहरा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 125, 126
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