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Saturday 20, September 2025

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अमृतवाणी:- जीवन कैसे जीयें? | Amritvanni Jeevan Kaise Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya

अमृतवाणी:- जीवन कैसे जीयें? | Amritvanni Jeevan Kaise Jiyen | Pt Shriram Sharma Acharya

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उपासना अधूरी क्यों रह जाती है ? | Upasana Adhuri Kyun Reh Jati Hai  | पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

उपासना अधूरी क्यों रह जाती है ? | Upasana Adhuri Kyun Reh Jati Hai | पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 20 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4

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अमृतवाणी: प्राण निकल जाए तो क्या बचेगा पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



कलेवर हमारा शरीर है और कलेवर ही हमारा प्राण है, लेकिन यह शरीर अपने आप में कुछ भी नहीं है। शरीर क्या है हमारा? केवल एक ढांचा है, जिसमें मिट्टी, मांस, हड्डियाँ, मल, मूत्र सब भरे पड़े हैं। यह शरीर बिल्कुल बेकार है बेटे — ऐसा बेकार कि यदि इसमें प्राण न हो, तो इसका कोई मोल नहीं। हम इस कलेवर के माध्यम से ही काम करते हैं, बोलते हैं, लिखते हैं, चलते हैं। आज आपके सामने हम जो व्याख्यान दे रहे हैं, वह इसी शरीर के सहारे दे पा रहे हैं, लेकिन जो बोल रहा है, वह हमारा प्राण है और जो माध्यम है, वह जीभ है। यदि हमारी जीभ में लकवा हो जाए तो हम बोल नहीं सकेंगे, और यदि शरीर से प्राण ही निकल जाए तो हम भूत हो जाएंगे। फिर क्या कर पाएंगे? हम छप्पर के ऊपर बैठे रह जाएंगे, बोल भी नहीं पाएंगे, दीक्षा भी नहीं दे पाएंगे। कोई कहे कि “गुरु जी, दीक्षा दे दीजिए,” तो हम कहेंगे कि “बेटा, हम नहीं दे सकते, क्योंकि अब हमारे पास शरीर ही नहीं है।“
यदि कोई कहे कि “तो आप एक लेख लिख दीजिए,” तो भी जवाब यही होगा कि “हम लेख नहीं लिख सकते क्योंकि अब हम भूत हो गए हैं, शरीर ही नहीं है हमारे पास।” हमारे मन में हज़ारों बातें हैं, लेकिन हम उन्हें न बोल सकते हैं, न लिख सकते हैं, न चल सकते हैं, क्योंकि ये सभी कार्य शरीर के बिना संभव नहीं हैं। इसीलिए कलेवर की आवश्यकता है, लेकिन यह कहना कि कलेवर ही सब कुछ है — यह बड़ी भूल होगी। यदि आप ऐसा कहेंगे तो मैं आपसे नाराज हो जाऊँगा और आपकी अक्ल पर संदेह करने लगूंगा, क्योंकि असल में शरीर नहीं बोलता, अक्ल नहीं बोलती — बोलने वाला तो प्राण है।
अगर शरीर से प्राण निकल जाए तो वही गुरु, वही विद्वान, वही नेता — सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। वह केवल मुर्दा रह जाता है। फिर कोई कहे कि “गुरु जी तो बड़े विद्वान थे,” तो लोग कहेंगे — “हाँ बेटा, विद्वान तो थे, लेकिन अब जल्दी ले चल गंगा में बहा आ।” कोई और कहे कि “नहीं साहब, हम आपको बहुत सुरक्षित रखेंगे,” तो हम कहेंगे — “बेटा, सुरक्षित रखोगे तो सड़न हो जाएगी, बदबू आने लगेगी, कीड़े पड़ जाएंगे। इसलिए जल्दी हमें जला दो।” यही सच्चाई है कि जब तक प्राण है, तब तक ही शरीर की कीमत है। एक बार प्राण चला गया, तो शरीर की कोई अहमियत नहीं रहती। गुरु तो वह होता है, जिसमें प्राण होता है — चेतना होती है। बिना प्राण के, वह केवल मिट्टी का पुतला है।

 

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अखण्ड-ज्योति से



मनुष्य जो कुछ सोचता और विचार करता है, उसे वाणी के माध्यम से व्यक्त करता है।  मनुष्य ने अपने विचारों और भावों को सर्वप्रथम वाणी के माध्यम से व्यक्त करना सीखा। वाणी और मस्तिष्क का सीधा सम्बन्ध है, विशेषत: अभिव्यक्ति के लिए तो सबके लिए वही सर्वाधिक सुलभ है। इसलिए मानसिक शक्तियों का बहिर्गमन मुख्यत: वाणी के द्वारा होता है। अहंता, मोह-तृष्णा, वासना आदि के द्वारा तो मानसिक शक्तियाँ अन्दर-अन्दर ही जलती रहती हैं। वाणी के माध्यम से उनकी ज्वालाएँ बाहर भी धधकने लगती हैं। इसलिए वाणी के संयम को मानसिक संयम के साथ भी जोड़े रखा गया है।
  
 विचारों पर संयम कर लिया जाय और वाणी को असंयमित ही रहने दिया जाय तो विचार संयम का आधार भी लडख़ड़ा उठता है। हमेशा कुछ न कुछ कहते रहने की आदत व्यक्ति को कोई विषय ढूँढऩे के लिए भी बाध्य करती है। इसलिए विचार संयम के साथ-साथ वाणी का संयम भी अनिवार्य है। वरन्ï वाणी का संयम-मानसिक संयम का ही अंग है। मानसिक संयम के साथ वाणी के संयम की महत्ता को भी समझना चाहिए और उसे हल्के रूप में नहीं इतना अधिक महत्व नहीं देते। उसकी मान्यता होती है बोलने में क्या लगता है? बोलने में बड़ी शक्ति खर्च होती है। एक घण्टे लगातार बोलने पर व्यक्ति इतना अधिक थक जाता है कि आठ घण्टे तक शारीरिक श्रम किया जाता तो थकान नहीं आती। कारण वाणी का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है और काम तो हाथ पैर से भी किए जा सकते हैं, उन्हें करते समय ध्यान कहीं और भी रह सकता है, पर बोलते समय सारा ध्यान बोलने पर ही रखना पड़ता है।
    
 बेहोश होने अथवा मरने से पूर्व अन्य अंग बाद में निष्क्रिय होते हैं, सबसे पहले वाणी ही अवरुद्ध होती है, क्योंकि मस्तिष्क जैसे-जैसे शिथिल या अचेत होता जाता है। वाक्ï इन्द्रिय वैसे-वैसे असमर्थ होती जाती है। उस समय न शरीर में इतनी शक्ति रह जाती है और न मन मस्तिष्क में ही इतनी चेतना रहती है कि कुछ शब्द भी कहे जा सकें। शरीर में जो शक्ति और मस्तिष्क में जो चेतना बची रहती है वह इतनी अपर्याप्त रहती है कि उससे कुछ शब्द भी नहीं बोले जा सकते। यद्यपि वह शक्ति अन्य अंगों को हिलाने डुलाने के लिए पर्याप्त रहती है। मरते हुए कोई बात सुनकर उसका उत्तर सिर हिलाकर ही दे पाते हैं-कुछ कह पाना अधिकांश लोगों के लिए कठिन ही होता है। शारीरिक क्रिया-कलापों में जिन कार्यों में सर्वाधिक मानसिक शक्ति खर्च होती है वह वाणी ही है। इसीलिए मौन की गणना मानसिक तप से की गई है।
  
 सामान्य जीवन में भी कार्य करते समय बोलने और मौन रहने का अन्तर समझा जा सकता है। किसी को करते समय यदि बात भी करते रहा जाय तो मनोयोग उस कार्य में पूरी तरह जुट नहीं पाता। कारण कि बात करते रहने से वह एकाग्रता और दक्षता नहीं आ पाती जिसके द्वारा अधिक व्याकुलता तथा दक्षता से कार्य किया जा सके। बातूनी व्यक्ति का काम भली-भाँति सम्पन्न नहीं हो पाता। अधिक बातें करने वाले व्यक्ति तुरन्त उत्तेजित हो उठते हैं, क्योंकि वाचालता के कारण मनुष्य की प्राण-शक्ति नष्ट होती रहती है और तज्जनित मानसिक दुर्बलता व्यक्ति को असहिष्णु बना देती है। व्यक्ति को जिस प्रकार जल्दी क्रोध आ जाता है उस प्रकार वाचालता के कारण मानसिक दृष्टि से दुर्बल भी शीघ्र उत्तेजित हो उठता है।

 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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