Sunday 21, September 2025
उत्तर प्रदेश राज्य के जनपदों में अखिल विश्व गायत्री परिवार से जुड़े परिजनों ने 21 सितंबर को सामूहिक रूप से रक्तदान महायज्ञ शिविर का आयोजन किया। शिविर में सुल्तानपुर जनपद द्वारा कीर्तिमान स्थापित करते हुए 1008 यूनिट रक्तदान किया गया। उसके बाद बुलंदशहर में 220 यूनिट रक्तदान किया गया। रक्तदान महायज्ञ माता भगवती देवी शर्मा जी के 99वें जयंती के अवसर पर आयोजित हुआ। शिविर का आयोजन 21 सितंबर को प्रातः 10 बजे से प्रारंभ करते हुए सायं 5 बजे तक चलाया गया। शिविर में वरिष्ठ परिजनों के साथ ही युवा मंडल, महिला मंडल की टीम ने भी बढ़ चढ़ कर प्रतिभाग किया।
• माता भगवती देवी शर्मा जी की जयंती के अवसर पर लोगों ने रक्तदान कर दी आहुति
• जनपद के 21 परिजनों ने स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय के रक्त केंद्र मंझनपुर में किया रक्तदान
कौशाम्बी: अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज के तत्वावधान में रक्तदान महायज्ञ के तहत 21 सितंबर दिन रविवार को जिलास्तरीय रक्तदान शिविर का आयोजन किया है। रक्तदान शिविर का आयोजन जनपद के स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय स्थित राजकीय रक्तकेंद्र मंझनपुर में किया गया। रक्तदान महायज्ञ शिविर माता भगवती देवी शर्मा जी के 99वें जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया जिसका शुभारंभ मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ हरिओम कुमार सिंह, सीएमएस कौशाम्बी डॉ सुनील कुमार शुक्ला के साथ गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस दौरान प्राचार्य हरिओम कुमार सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि गायत्री परिवार के प्रत्येक कार्य समाज में सच्ची प्रेरणा स्थापित करती हैं जिससे हम सभी प्रेरित होकर ऐसे आयोजन के साक्षी बन पाते हैं कौशाम्बी गायत्री परिवार के परिजनों के साथ ही बेटियों का रक्तदान में प्रतिभाग करना बहुत ही अभिनंदनीय है। वहीं सीएमएस सुनील कुमार शुक्ला ने अपने वक्तव्य में कहा कि गायत्री परिवार एक वैश्विक आदर्श संस्था के रूप नए युग के निर्माण का कार्य करते हुए रक्तदान महायज्ञ का एक साथ प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजन कर मानव सेवा की मिशाल प्रस्तुत किया है। शिविर में गायत्री परिवार के 21 परिजनों ने रक्त दान किया। इस रक्तदान महायज्ञ शिविर में सहयोगी रहें ब्लड बैंक इंचार्ज डॉ रवि सिंह एवं डॉ नंदिनी राघव व कर्मियों की देख रेख में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
इस अवसर पर वरिष्ठ गायत्री परिजन सुरेश जायसवाल ने सभी को प्रेरित करते हुए कहा कि रक्तदान से बढ़कर कोई दान नहीं है। रक्तदान लोगों को जीवन दान देने का माध्यम है और यह एक महान कार्य है। गायत्री परिवार की ओर से यह कार्यक्रम प्रदेश के समस्त जिलों में आयोजित किया जा रहा है।
शिविर में रक्तदान करने वाले राम सनेही श्रीवास्तव, ज्ञानेश्वर त्रिपाठी, अभिषेक जायसवाल, शिव अवतार, संतोष केसरवानी, वीरेंद्र जायसवाल, अजीत कुशवाहा, सूरज कुशवाहा, उमेश निषाद, लवलेश कुमार, शिवम् केसरवानी, अजय जायसवाल, शिखर, विवेक, प्रियांशु, विनोद, दीपेंद्र व आयुषी जायसवाल, निधि आदि लोग रहें।
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 21 September 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 21 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 21 September 2025 !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 21 September 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 21 September 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 21 September 2025 !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर #Prageshwar_Mahadev 21 September 2025 !!
अमृतवाणी: सफल साधना का रहस्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
अध्यात्म के दो नाम हैं। एक का नाम है कलेवर और एक का नाम है प्राण। कलेवर वो है, जिसको हम क्रियाकृत्य कहते हैं, कर्मकांड कहते हैं, विधि-विधान कहते हैं, पूजा-उपासना कहते हैं, माला घुमाना कहते हैं, जप करना कहते हैं, हवन करना कहते हैं, ध्यान करना कहते हैं, पूजन करना कहते हैं।
यह सारे का सारा जो कृत्य है, यह कलेवर है। कलेवर की उपयोगिता बहुत ज्यादा है, बहुत बड़ी आवश्यकता है। ऋषियों ने बताया है, शास्त्रकारों ने बताया है, हमने बताया है, हम करते हैं।
लेकिन क्यों साहब, अगर हम कलेवर पूरा कर लें, तो क्या हमारा उद्देश्य पूरा हो जाएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं होगा। उद्देश्य आपका तभी पूरा होगा जब कलेवर के साथ में प्राण रहेगा। पूजा-उपासना की विधियों के साथ मनुष्य की जीवात्मा रहनी चाहिए, आदमी का दृष्टिकोण रहना चाहिए, आदमी का चिंतन रहना चाहिए।
और यदि चिंतन और दृष्टिकोण का समावेश है, तो आपकी साधना सफल होकर रहेगी।
मैंने कल और परसों दो दिन एक बात बताने की कोशिश की — गायत्री का प्राण क्या हो सकता है? गायत्री के पीछे रहस्य क्या है? गायत्री के पीछे तत्वज्ञान क्या है? चिंतन क्या होना चाहिए, दृष्टि क्या होनी चाहिए?
मैं कल यह बताता रहा आपको — कि श्रद्धा हमारा कड़ा शरीर है। श्रद्धा से भरा-पूरा होना चाहिए। और हमारा चिंतन, अर्थात हमारा चरित्र, अर्थात हमारा सूक्ष्म शरीर ऐसा होना चाहिए, जिसको हम निर्मल कह सकें, शुद्ध कह सकें, पवित्र कह सकें।
पवित्र कह सकेंगे, तो आपको लाभ मिल जाएगा। और हमारा उद्देश्य अगर ऊँचा है, तो भगवान हमें देगा। और ऊँचा उद्देश्य नहीं है, नीचा उद्देश्य है, तो भगवान देने से इंकार कर देगा और यह कहेगा — ‘नीचे उद्देश्यों के लिए हम नहीं दे सकते आपको।’
आपको व्यक्तिगत सुख-सुविधा के लिए हाथ-पाँव और अक्ल इतनी ज्यादा हमने पैदा की है, जिससे आप अपनी जिंदगी का मजे में गुज़ारा कर सकते हैं। आपको अपने हाथों से, कलाइयों से माँगना चाहिए कि आप हमारे छह इंच के पेट को भरिए।
यह छह इंच का पेट आप खुद पूरा कर सकते हैं। छह फुट लंबे हाथ दे दिए हैं। यह देवता हैं। छह फुट के हाथों से आप ज़मीन खोदिए, रिक्शा चलाइए, योग्य खास कीजिए। अब तक छह इंच का पेट भर लीजिए।
इसके लिए क्या माँगना भगवान से? और क्यों देगा भगवान आपको?
अक्ल हमारे पास ऐसी है, जो हम अपने सामान्य जीवन यापन के लिए इस्तेमाल करें, तो बहुत सुखी जीवन जी सकते हैं। हम अपने पारिवारिक जीवन को सुखी बना सकते हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो थोपे जा सकते हैं। कोई हानि होने या आपत्ति आने पर लोग करने भी हैं। कई तो अपने ऊपर आई हुई आपत्ति का कारण तक पूजा को मान लेते हैं और उसी पर सारा दोष थोपकर छोड़कर अलग हो जाते हैं। मनुष्यों में दोष ढूँढ़ते रहने पर तो उनमें असंख्य दोष निकाले या सोचे जा सकते हैं। ऐसी छिद्रान्वेषी प्रकृति के लोगों को सारी दुनियाँ बुराइयों से भरी हुई दुष्ट दुराचारी और अपने प्रति शत्रुता रखने वाली दिखाई देती हैं। उन्हें अपने चारों ओर नारकीय वातावरण दृष्टिगोचर होता है। निन्दा और आलोचना के अतिरिक्त कभी किसी के प्रति अच्छे भाव वे प्रकट ही नहीं कर पाते किसी की प्रशंसा उनके मुख से निकलती ही नहीं। ऐसे लोग अपनी इस क्षुद्रता के कारण ही सब के बुरे बने रहते हैं।
पीठ पीछे की हुई निन्दा नमक-मिर्च मिलकर उस आदमी के पास जा पहुँचती है जिसके बारे में बुरा अभिमत प्रकट किया गया था। आमतौर पर सुनने वाले लोग अपनी विशेषता प्रकट करने के लिए उस सुनी हुई बुराई को उस तक पहुँचा देते हैं जिसके संबंध में कटु अभिमत प्रकट किया गया था ऐसी दशा में वह भी प्रतिरोध की भावना में शत्रुता का ही रुख धारण करता है और धीरे−धीरे उसके विरोधी एवं शत्रुओं की संख्या बढ़ती जाती है। रूठे बैठे रहने वाले, मुँह फुलाकर बात करने वाले, भौहें बढ़ाये रहने वाले और कर्कश स्वर में बोलने वाले व्यक्ति किसी के मन में अपने लिए आदर भाव प्राप्त नहीं कर सकते उन्हें बदले में द्वेष, घृणा, विरोध ही उपलब्ध होते हैं। अपना मन हर घड़ी खिन्न, संतप्त और क्षुभित रहता है उसकी जलन से होने वाले शारीरिक एवं मानसिक दुष्परिणामों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जून 1962
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