Sunday 10, August 2025
अपने आप को ऊँचा उठाओ, उसे गिराओ मत। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
बनाने की सोचिए, बिगाड़ने की नहीं | Banane Ki Sochiye Bigadane Ki Nhi
हम बदलेंगें युग बदलेगा | Ham Badlenge Yug Badlega | श्रद्धेय डॉ प्रणव पण्ड्या
अमृतवाणी: विचारों का चमत्कार | Vicharon Ka Chamtkar | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
रुपान्तरण : हर मनुष्य में है प्रभु का अंश | Dr. Pranav Pandya जीवन पथ के प्रदीप
गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध | Gayatri Aur Yagya Ka Sambdhan
यदि वर्तमान परिस्थिति अनुपयुक्त लगती हो और उसे सुधारने बदलने का सचमुच ही मन हो तो सड़ी नाली की तली तक साफ करनी चाहिए। सड़ी कीचड़ भरी रहने पर दुर्गन्ध और विषकीटकों से निपटने के छुट पुट उपायों से कोई स्थायी समाधान मिल नही सकेगा। समाजगत विभीषिकाओं और व्यक्तिगत व्यथाओं के नाम रूप कितने ही क्यों न हो सबका आत्यन्तिक समाधान एक ही है कि दृष्टिकोण की दिशाधारा बदली जाय और अभ्यस्त ढर्रे की रीति नीति में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया जाय। उलटे को उलटकर सीधा किया जा सकता है। एक शब्द में इसी को युग क्रान्ति कहा जा सकता है जिसे नियोजित किये बिना और कोई गति नहीं। जहाँ तक उतर चुके उसके उपरान्त अब महा विनाश का, सामूहिक आत्म हत्या का ही अन्तिम पड़ाव है।
मानवी क्षमता इन दिनों अनुपयुक्त को अपनाने बढ़ाने में संलग्न है। हसेना यह चाहिए कि प्रवाह मुड़े और अदूरदर्शिता को निरस्त करके औचित्य को समर्थन मिले। मनुष्य शक्तियों का भण्डार है। दुर्भाग्य एक ही है कि उसे दुष्प्रवृत्तियों में नियोजित करके बर्बादी के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। यह स्थिति उलटी जानी चाहिए। क्षमताओं को अपव्यय से बचाया और सृजन प्रयोजनों में लगाया जाना चाहिए। यहाँ एक आवश्यक और भी है कि जो गन्दगी फैलाई जा चुकी है उसे हटाने के लिए भी तूफानी प्रयत्न किया जाय, अन्यथा मार्ग में बिखरे हुए काँटे प्रगति पथ के अवरोध ही बने रहेंगे।
‘‘हम बदलेंगे युग बदलेगा’’ के उद्घोष में निदान और उपचार के दोनों ही पक्षों का समावेश है। परिस्थितियों को बदलने के लिए मनःस्थिति को, समाज को सुधारने के लिए व्यक्ति परिष्कार को अनिवार्य माना जाना चाहिए। हर व्यक्ति को इस तथ्य से अवगत, सहमत करना चाहिए कि इन दिनों लोक मानस की दिशाधारा में समग्र परिवर्तन की आवश्यकता है। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य की संरचना तो दूर, बढ़ती हुई विपत्तियों के त्रास से भी आत्म रक्षा संभव न हो सकेगी।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- मिशन तुम्हारे व्यवहार पर टिका है | Mission Tumhare Vyavhar Par Tika Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृत वर्षा रसानुभूति ध्यान साधना | Amrit Varsha Rasanubhuti Dhyan Sadhna | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 10 August 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 10 August 2025
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 August 2025
!! शांतिकुंज दर्शन 10 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 August 2025
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!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 August 2025
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 10 August 2025
अमृतवाणी: भविष्य की चिंता और आदमी की भूमिका पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
भजन करने वाले क्षेत्रों में भी हम देखते हैं, हर जगह हम देखते हैं, जो आदमी अपने आप को दूसरों से अच्छा और ऊंचा बताते हैं, उनको भी हम देखते हैं। राष्ट्रीयता की दुहाई देने वालों को भी देखते हैं, और सामाजिकता की दुहाई देने वालों को भी देखते हैं।
और हम, हम बहुत शर्मिंदा हैं। हम अध्यात्मवादी, अध्यात्म के नाम पर हम लोहे के आदमी हैं, और पत्थर के आदमी हैं, और चट्टान के आदमी हैं। आदमी अगर चट्टानों के बनते चले गए तो आदमी के भीतर से मोहब्बत चली जाएगी।
और मोहब्बत चले जाने के बाद में सहकारिता चली जाएगी, और स्नेह चला जाएगा। स्नेह और सहकारिता चली जाएगी, इसके बाद में ईमानदारी चली जाएगी, और भलमनसाहत चली जाएगी। फिर क्या हो जाएगा?
आदमी के बराबर खौफनाक चाहे वह दुनिया के परदे पर और कोई नहीं हो सकता। शेर, शेर होता तो है, मारकाट में तो ताकत बहुत होती है, पर बेकल होता है और बेवकूफ होता है। हाथी, हाथी ताकतवर तो बहुत होता है, पर बेकल होता है और बेवकूफ होता है।
लेकिन आदमी इतना समझदार है, इतना समझदार है कि उसको दांत से खींच करके, पेट में से मुंह फुला करके खून पीने की जरूरत नहीं है। बिना दांत किसी के पेट में लगाए बिना वह आदमी का खून पी सकता है, और आदमी को मुर्गा बनाकर छोड़ सकता है।
यह कला हमको आती है। आदमी बड़ा खौफनाक है, और आदमी बड़ा खतरनाक है। खतरनाक और खौफनाक आदमी इस तेजी से बढ़ रहा है। आदमी के दांत और आदमी के सींग इस हिसाब से बढ़ रहे हैं, इससे मालूम पड़ता है कि अब यह राक्षस होने के लिए जाता है।
इसके अंदर से दया, करुणा और ममता, स्नेह और दुलार और सिद्धांतवाद के सारे सिद्धांत खत्म होते चले जा रहे हैं। अगर तरक्की इसी हिसाब से होती चली गई, तो आप फिर देखना, आदमी थोड़े दिनों में भूत-पलीत हो जाएगा, जिन्द-मसान हो जाएगा, जिससे कि एक दूसरे को डर मालूम पड़ेगा।
आदमी को देख करके डर मालूम पड़ेगा। आदमी जा रहा है, आदमी जा रहा है, अरे आदमी जा रहा है, होशियार रहना — ऐसा मालूम पड़ेगा। बेटे, आदमी को देखकर के हिम्मत बढ़ती थी कि आदमी आ गया, हमारी सहायता कर सकता है और हम एक से दो हो गए।
नहीं बेटे, अब हमको भय मालूम पड़ता है। कहीं ऐसा ना हो कि हमारे साथ-साथ चलता यही हमारे लिए पिशाच का काम करे। और हमारे लिए किसका काम करे? रेलगाड़ी के डिब्बे में हम बैठते हैं और पास में बैठा हुआ आदमी कहता है — बार-बार हम देखते हैं, यह हमारे पीछे जेब काट तो नहीं लेगा?
बार-बार आप, भाई साहब कहाँ से आए? आप कहाँ से आए? कहाँ जाएंगे? कहाँ जाएंगे भाई साहब? कैसे जाएंगे? देखते रहते हैं, हमारे गले की जंजीर ना काट ले जाए, और हमारी जेब ना काट ले जाए।
आदमी से उद्दंड, और यही तरक्की अगर होती रही, इसी हिसाब से सिद्धांतहीन आदमी, आदर्शहीन आदमी अगर बढ़ता रहा, समझदारी इसकी बढ़ती रही, शिक्षा इसकी बढ़ती रही, एम.ए. करता रहा, तो आदमी खा जाएगा।
एक आदमी को जिंदा नहीं रहने देगा। इन आदमियों की वजह से नरक बनता जा रहा है। जहां कहीं भी, जिस घर में ये आदमी रहेंगे, उस घर को नरक बनाकर के छोड़ेंगे। जिस मोहल्ले में रहेंगे, जिस गांव में रहेंगे, जिस नगर में रहेंगे, जिस देश में रहेंगे — उसका सफाया करके रहेंगे।
बेटे, यह ऐसी स्थिति सामने आ रही है कि हमको मालूम पड़ता है कि दुनिया अब मरने के लिए जा रही है।
अखण्ड-ज्योति से
शान्ति के साधारण समय में सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र मालखाने में जमा रहते हैं; पर जब युद्ध सिर पर आ जाता है, तो उन्हें निकाल कर दुरुस्त एवं प्रयुक्त किया जाता है। तलवारों पर नये सिरे से धार धरी जाती है। घर के जेवर आमतौर से तिजोरी में रख दिये जाते हैं; पर जब उत्सव जैसे समय आता है, उन्हें निकालकर इस प्रकार चमका दिया जाता है, मानो नये बनकर आये हों। वर्तमान युगसंधि काल में अस्त्रों-आभूषणों की तरह प्रतिभाशालियों को प्रयुक्त किया जायेगा। व्यक्तियों को प्रखर प्रतिभा सम्पन्न करने के लिए यह आपत्तिकाल जैसा समय है। इस समय उनकी टूट-फूट को तत्परतापूर्वक सुधारा और सही किया जाना चाहिए।
अपनी निज की समर्थता, दक्षता, प्रामाणिकता और प्रभाव-प्रखरता एक मात्र इसी आधार पर निखरती है कि चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश हो। अनगढ़, अस्त-व्यस्त लोग गई-गुजरी जिन्दगी जीते हैं। दूसरों की सहायता कर सकना तो दूर, अपना गुजारा तक जिस-तिस के सामने गिड़गिड़ाते, हाथ पसारते या उठाईगिरी करके बड़ी कठिनाई से ही कर पाते हैं; पर जिनकी प्रतिभा प्रखर है, उनकी विशिष्टताएँ मणि-मुक्तकों की तरह झिलमिलाती हैं, दूसरों को आकर्षित- प्रभावित भी करती हैं और सहारा देने में भी समर्थ होती हैं। सहयोग और सम्मान भी ऐसों के ही आगे-पीछे चलता है। बीमारियों, कठिनाइयों और तूफानों से वे ही बच पाते हैं, जिनकी जीवनी शक्ति सुदृढ़ होती है।
समर्थता को ओजस्, मनस्विता को तेजस् और जीवट को वर्चस्ï कहते हैं। यही हैं वे दिव्य सम्पदाएँ, जिनके बदले इस संसार के हाट-बाजार से कुछ भी मनचाहा खरीदा जा सकता है। दूसरों की सहायता भी वे लोग ही कर पाते हैं, जिनके पास अपना वैभव और पराक्रम हो। अगले दिनों ऐसे ही लोगों की पग-पग पर जरूरत पड़ेगी, जिनकी प्रतिभा सामान्य जनों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हो, संसार के वातावरण का सुधार वे ही कर सकेंगे, जिन्होंने अपने आपको सुधार कर यह सिद्ध कर दिया हो कि उनकी सृजन-क्षमता असंदिग्ध है। परिस्थितियों की विपन्नता को देखते हुए उन्हें सुधारे जाने की नितांत आवश्यकता है; पर इस अति कठिन कार्य को कर वे ही सकेंगे, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करके यह सिद्ध कर दिया हो कि वे आड़े समय में कुछ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सफल हो सकते हैं। इस स्तर को उपलब्ध कर सकने की कसौटी एक ही है-अपने व्यक्तित्व को दुर्गुणों से मुक्त करके, सर्वतोमुखी समर्थता से सम्पन्न कर लिया हो। सद्गुणों की सम्पदा प्रचुर परिणाम में अर्जित कर ली हो।
दूसरों को कैसा बनाया जाना चाहिए। इसके लिए मण्डल विनिर्मित करना होगा। उपकरण ढालने के लिए तदनुरूप साँचा बनाये बिना काम नहीं चलता। लोग कैसे बनें? कैसे बदलें? इस प्रयोग को सर्वप्रथम अपने ऊपर ही किया जाना चाहिए और बताया जाना चाहिए कि कार्य उतना कठिन नहीं है, जिनका कि समझा जाता है। हाथ-पैरों की हरकतें इच्छानुसार मोड़ी-बदली जा सकती हैं, तो कोई कारण नहीं है कि अपनी निज की प्रखरता को सदगुणों से सुसज्जित करके चमकाया-दमकाया न जा सके।
पिछले दिनों किसी प्रकार आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा और अनगढ़ता की स्थिति भी सहन की जाती थी; पर बदलते युग के अनुरूप अब तो हर किसी को अपने को नये युग का नया मनुष्य बनाने की होड़ लगानी पड़ेगी, ताकि उस बदलाव का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए, समूचे समाज को, सुविस्तृत वातावरण को बदले जाने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं विवश और बाधित भी किया जा सके।
काया-कलेवर जिसका जैसा ढल चुका है, वह प्राय: उसी आकार-प्रकार का रहेगा; पर गुण, कर्म, स्वभाव में अभीष्टï उत्कृष्टता का समावेश करते हुए ऐसा कुछ चमत्कार उत्पन्न किया जा सकता है, जिसके कारण इसी काया में देवत्व के दर्शन हो सकें। किसी अंधे के हाथ बटेर लग पाती हैं; किन्तु एक देवता ऐसा भी है, जिसकी समुचित साधना करने पर सत्परिणाम हाथों-हाथ नकद धर्म की तरह उपलब्ध होते देखे जा सकते हैं। वह देवता है- जीवन। इसका सुधरा हुआ स्वरूप ही कल्पवृक्ष है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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