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Monday 11, August 2025

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 Ep:- 17/21 भावी देवासुर संग्राम और उसकी भूमिका | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, Rishi Chintan

Ep:- 17/21 भावी देवासुर संग्राम और उसकी भूमिका | महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, Rishi Chintan

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अमृतवाणी:- पंचमुखी गायत्री के पाँच चरण | Panchmukhi Gayatri Ke Panch Charan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- पंचमुखी गायत्री के पाँच चरण | Panchmukhi Gayatri Ke Panch Charan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 11 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: मानवीय गरिमा और सिद्धांतों का महत्व पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



हम किसी भयानक बीमारी की तरफ तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। वह क्या चीज है? वह है, बेटे, संतानों की संख्या। संतानों की संख्या, संतानों की संख्या — जिस तेजी से बढ़ती जा रही है।
और उसका, उसका गवर्नमेंट प्रक्रिया के हिसाब से, रिकरिंग प्रक्रिया के हिसाब से, चक्रवृद्धि ब्याज के हिसाब से जिस तरीके से औलाद बढ़ रही है, उसी हिसाब से भले से मुझे दिखाई पड़ता है — 100 वर्षों के अंदर।
अभी तो स्कूलों में जगह नहीं मिलती है, रेल गाड़ियों में जगह नहीं मिलती, नौकरी के लिए जगह नहीं मिलती, या अमुक जगह नहीं मिलती। आगे जाकर के सड़क पर चलने के लिए जगह नहीं मिलेगी, और पानी पीने के लिए नहीं मिलेगा।
खराब की तो मैं क्या कहूं। आदमी को तड़प-तड़प के, भूख से तड़प-तड़प के मरना पड़ेगा। जिस हिसाब से औलाद आदमी जिस तरीके से पैदा करते चले जा रहे हैं, किसी आदमी की हालत ऐसी भयंकर हालत है, जिससे कि आप देख लेना — इससे क्या परिणाम होते हैं।
और बहुत सी बातें हैं, जिनसे मालूम पड़ता है कि हम किसी बड़े भयंकर समय की तरफ तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।
पर क्या यह भयंकर समय आएगा, गुरुजी?
नहीं बेटे, मेरा विश्वास है कि नहीं आएगा। नहीं आएगा। क्योंकि आदमी बड़ा समझदार है, आदमी अकलमंद है। यह गिरता तो है, पर ठोकर खाने के बाद में समझ जाता है।
समझ जाता है। अक़ल आदमी को ज़रूर आती है।
कितने ही युग आ चुके। हिम के युग आ चुके। जब ठंडक पड़ी, तब बर्फ से दुनिया जम गई। लेकिन यह आदमी इतना होशियार है कि उससे भी मुकाबला कर लेता है, और समझ जाता है।
मैं आपको बताता तो हूं कि खौफनाक परिस्थितियां कैसी आ रही हैं, खतरे कैसे आ रहे हैं।
पर मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं — आदमी के अंदर जो सुपीरियॉरिटी है, आदमी के भीतर जो महता है, वह समय अनुसार समझ जाती है।
बढ़ता तो है, मरने के लिए। चलता तो है, आग के पास जाने की कोशिश तो करता है। लेकिन जब तक थोड़ी उंगलियां झुलसती हैं, तभी तक झुलसता है। हाथ को पूरे का पूरा नहीं देता है — पीछे खींच लेता है।
हम देखते हैं, आदमी को — बच्चा भी जब जाता है, गलती से आग के पास चला जाता है — तो ज़रा सी उंगलियां जलती हैं तो पीछे भाग खड़ा होता है।
आदमी समझदार है। और इस समझदारी पर मुझे विश्वास है।
विश्वास है। इसीलिए मैं समय जानता हूं कि नया युग आएगा।
वर्तमान परिस्थितियों का विकल्प यही हो सकता है कि हम मानवीय गरिमा और मानवीय सिद्धांतों को ठीक करें।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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अखण्ड-ज्योति से



 राष्ट्रीय दृष्टि से स्वार्थपरता, व्यक्तिवाद, असहयोग, संकीर्णता हमारा एक प्रमुख दोष है। सारी दुनियाँ परस्पर सहयोग के आधार पर आगे बढ़ रही है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह परस्पर सहयोग के आधार पर ही बढ़ा और समुन्नत हुआ है। जहाँ प्रेम, ममता, एकता, आत्मीयता, सहयोग और उदारता है वहीं स्वर्ग रहेगा। समाजवाद और साम्यवाद की मान्यता यही है कि व्यक्ति को अपने लिए नहीं समाज के लिए जीवित रहना चाहिए। सामूहिक सुख-शान्ति बढ़ाने के लिए अपनी समृद्धि और सुविधा का त्याग करना चाहिए। धर्म और अध्यात्म की शिक्षा भी वही है कि व्यक्ति अपने लिए धन, वैभव जमा न करके अपनी प्रतिभा, बुद्धि, क्षमता और सम्पदा को जीवन निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए ही उपयोग करे और शेष जो कुछ बचता हो सबको सामूहिक उत्थान में लगा दे।

 जिस समाज में ऐसे परमार्थी लोग होंगे वही फलेगा, फूलेगा और वही सुखी रहेगा। जहाँ स्वार्थपरता आपाधापी, जमाखोरी की प्रवृत्ति पनप रही होगी वहाँ अनैतिकता के सभी कुकर्म बढ़ेंगे और फैलेंगे। सामान्य नागरिकों के स्तर से अत्यधिक ऊँचे स्तर का सुखोपभोग करने की प्रवृत्ति जहाँ भी पनपेगी वहीं शोषण, अन्याय, दुराचार, द्वेष, संघर्ष, ईर्ष्या आदि बुराइयाँ विकसित होंगी। प्राचीनकाल में जिनकी प्रतिभा अधिक कमाने की होती थी वे अपने राष्ट्रीय स्तर से अधिक उपलब्ध धन को लोकहित के कार्यों में दान कर देते थे। जीवन की सार्थकता, सेवा कार्यों में लगी हुई शक्ति के आधार पर ही आँकी जाती थी।
             

आज जो जितना धनी है वह उतना बड़प्पन पाता है, यह मूल्याँकन गलत है। जिसने राष्ट्रीय स्तर से जितना अधिक जमा कर रखा है वह उतनी ही बड़ी गलती कर रहा है। इस गलती को प्रोत्साहित नहीं, निरुत्साहित किया जाना चाहिए, अन्यथा हर व्यक्ति अधिक धनी, अधिक सुख सम्पन्न, अधिक विलासी होने की इच्छा करेगा। इससे संघर्ष और पाप बढ़ेंगे। सहयोग, प्रेम, त्याग, उदारता और परमार्थ की सत्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यक्तिगत स्वार्थपरता ही कर रही है। इसे हटाने और उदारता, सहकारिता, लोकहित, परमार्थ की भावनाओं को पनपाने के लिए हमें शक्ति भर प्रयत्न करना होगा, तभी हमारा समाज सभ्य बनेगा। अन्यथा शोषण और विद्रोह की, जमाखोरी और चोरी की, असभ्यता फैलती ही रहेगी और मानव जाति का दुख बढ़ता ही रहेगा।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

 

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