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Monday 12, May 2025

कृष्ण पक्ष प्रथमा, जेष्ठ 2025




पंचांग 13/05/2025 • May 13, 2025

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), बैशाख | प्रतिपदा तिथि 12:36 AM तक उपरांत द्वितीया | नक्षत्र विशाखा 09:09 AM तक उपरांत अनुराधा | वरीयान योग 05:52 AM तक, उसके बाद परिघ योग | करण बालव 11:32 AM तक, बाद कौलव 12:36 AM तक, बाद तैतिल |

मई 13 मंगलवार को राहु 03:35 PM से 05:16 PM तक है | चन्द्रमा वृश्चिक राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 5:29 AM सूर्यास्त 6:57 PM चन्द्रोदय 7:53 PM चन्द्रास्त 6:04 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु ग्रीष्म

 

  1. विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
  2. शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत - ज्येष्ठ
  4. अमांत - बैशाख

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष प्रतिपदा   - May 12 10:25 PM – May 14 12:36 AM
  2. कृष्ण पक्ष द्वितीया   - May 14 12:36 AM – May 15 02:29 AM

नक्षत्र

  1. विशाखा - May 12 06:17 AM – May 13 09:09 AM
  2. अनुराधा - May 13 09:09 AM – May 14 11:47 AM


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Vicharo_Ki_Aparmit_Shakti

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13_Sadguru Vachnamrit 1.mp4

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मन को सुधारिए-वह सुधर जाएगा, Man ko Sudhariye Wah Sudhar Jayega

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आंतरिक दुर्बलताओं से लड़ पड़िए भाग 02

आंतरिक दुर्बलताओं से लड़ पड़िए भाग 02

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गायत्री मंत्र की महिमा | Gayatri Mantra Ki Mahima

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पुरोहित लोग राष्ट्र को जागृत रखें। पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

पुरोहित लोग राष्ट्र को जागृत रखें। पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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विचारशील लोग दीर्घायु होते हैं | Vicharshil Log Dirghayu Hote Hai |

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अपने को श्रेष्ठ बनाओ और आगे बढ़ो | Apne Ko Shresth Bnao | अमृत सन्देश

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 13 May 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृत सन्देश:वायुमंडल को शुद्ध करने में यज्ञ सहायक है| गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



याज्ञवल्क्य और जनक का संवाद ऐसा ही है। जनक ने पूछा, "कोई खराब वस्तु हो तो हम जो है, घी ना पाए तो कैसे हवन करें?" तो याज्ञवल्क्य जी ने कहा, "यज्ञ तो करना आवश्यक है, वो तो करना चाहिए। उस से तो हमारी भारतीय संस्कृति के माता-पिता हैं, इनका पूजन तो इनको भोजन कराना ही चाहिए। वायुमंडल और वायु संशोधन के कार्य के लिए तो करना ही चाहिए। वातावरण संशोधन का काम तो हाथ में लेना ही चाहिए। पर वस्तुएं कम कर सकते हैं।"

तो जनक जी ने पूछा, "क्या वस्तुएं कम कर सकते हैं?" तो उन्होंने कहा, "घी अगर आपके पास ना हो तो हवन सामग्री जो वनस्पतियों से बनती है, उससे ही आप हवन कर लें। बिना घी के हवन कर लें।"

तो उन्होंने कहा, "जब वर्षा नहीं होगी तो वनस्पतियां भी पैदा नहीं होंगी। तो फिर कैसे हवन करेंगे?" तो फिर याज्ञवल्क्य जी ने कहा, "आप लकड़ियों की समिधाओं से हवन कर सकते हैं।"

कहने का अर्थ है कि कम से कम वस्तुओं से हवन कर सकते हैं। पर यह दीपक यज्ञ जो है, यह मुसीबत के समय पर, आपत्ति कालीन परिस्थितियों के समय में हमने यह कहा है लोगों से और लोगों ने स्वीकार भी किया है।

उसको भी आप करते हैं, तो इसमें जो श्लोक बोले जाएंगे, मंत्र बोले जाएंगे, भावना जो आपकी मिलेगी, उसके कारण से पुण्य उसमें भी मिलेगा। जितना की आप यज्ञ कुंडों को खोदकर के हजारों रुपया इकट्ठा करके जो खर्च किया करते थे, लगभग उतना ही पुण्य मिल जाएगा।

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अखण्ड-ज्योति से



मौत के जरा से आघात से मेरा स्वरूप यह कैसा हो गया। अब तो मेरी मृत काया-हिलती डुलती भी नहीं-बोलती, सोचती भी नहीं? अब तो उसके कुछ अरमान भी नहीं है। हाय, यह कैसी मलीन, दयनीय, घिनौनी बनी जमीन पर लुढ़क रही है। अब तो यह पलंग बिस्तर पर सोने तक का अधिकार खो बैठी। कुशाओं बान से ढकी-गोबर से लिपी गीली भूमि पर यह पड़ी है। अब कोई चिकित्सक भी इसका इलाज करने को तैयार नहीं। कोई बेटा, पोता गोदी में नहीं आता।

 पत्नी छाती तो कूटती है पर साथ सोने से डरती है। मेरा पैसा-मेरा वैभव-मेरा सम्मान हाय रे! सब छिन गया-हार से मैं बुरी तरह लुट गया। मेरे कहलाने वाले लोग ही-मेरा सब कुछ छीन कर मुझे इस दुर्गति के साथ घर से निकाल रहें हैं। क्या यही अपनी दुर्दशा कराने के लिए मैं जन्मा? यही है क्या मेरा अन्त-यही था मेरा लक्ष्य, यही है क्या मेरी उपलब्धि। जिसके लिए कितने पुरुषार्थ किये थे-क्या उसका निष्कर्ष यही है? यही हूँ मैं-जो मुर्दा बना पड़ा हूँ-और लकड़ियों की चिता में जल कर अगले ही क्षण अपना अस्तित्व सदा के लिए खोने जा रहा हूँ।

  लो अब पहुँच गया मैं चिता पर। लो, मेरा कोमल मखमल जैसा शरीर-जिसे सुन्दर, सुसज्जित, सुगन्धित बनाने के लिए घण्टों शृंगार किया करता था, अब आ गया अपनी असली जगह पर। लकड़ियों का ढेर-उसके बीच दबाया हुआ मैं। लो यह लगी आग। लो, अब मैं जला। अरे मुझे जलाओ मत। इन खूबसूरत, हड्डियों में मैं अभी और रहना चाहता हूँ, मेरे अरमान बहुत हैं, इच्छायें तो हजार में से एक भी पूरी नहीं हुई। मुझे उपार्जित सम्पदाओं से अलग मत करो, प्रियजनों का वियोग मुझे सहन नहीं। इस काया को जरा सा कष्ट होता था तो चिकित्सा, उपचार मैं बहुत कुछ करता था। इस काया को इस निर्दयतापूर्वक मत जलाओ।

.... क्रमशः जारी
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति मार्च 1972 पृष्ठ 4

 

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