Wednesday 14, January 2026
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आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं
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शताब्दी नगर, बैरागी द्वीप श्रद्धालुओं की नज़र से
अमृत सन्देश:- समय पर उपस्थित रहें | Samaya Par Upasthit Rahe
Book: 04, EP: 07, ईमानदारी की कमाई ही स्थिर रहती है | Dhan Ka Sadupyog | Gayatri Mantra Ke 24 Akshar
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 14 January 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
मने आपको बड़ा ढूंढ निकाला है। हमने गहरे पानी में डुबकी लगाई है और डुबकी लगा कर के मोतियों को ढूंढ कर निकाला है। मोती सड़क पर पड़े थे, आपने बीन लिए नहीं। सड़क पर नहीं पड़े थे। आपने संगठन के लिए एक फार्मेट छापा और संगठन बन गया नहीं। इसके लिए हमको बहुत गहरी डुबकी लगानी पड़ी है, और आप हीरे और मोतियों को बड़ी मुश्किल से जोड़ करके जमा करना पड़ा है। अब क्या करना चाहिए? अब आगे क्या करना चाहिए? आगे आपको हमारा सहयोगी बना रहना चाहिए। आजकल हम एकांत साधना में लगे हुए हैं। बड़ा काम हमारे सामने है। दुनिया के सामने एक ऐसी मुसीबत है या तो वह तबाह हो जाएगी या खुशहाल हो जाएगी। इस तबाही और खुशहाली के समय पर हम एक काम चुप नहीं बैठ सकते। इसीलिए हमने बड़ा कदम उठाया है। कितना बड़ा कदम? बैठ सकते। इसीलिए हमने बड़ा कदम उठाया है। कितना बड़ा कदम? जितना की भागीरथी ने गंगा को जमीन पर लाने के लिए उठाया था, और जितना दधीचि ने अपनी हडियों को वज्र बनाने के लिए बनाया था ताकि समय की मुसीबतें दूर की जा सके। लगभग हम उसी प्रयास में लगे रहे हैं। तो आपका भी कुछ फर्ज हो जाता है। हम कुछ करें, तो उसमें आपको सहयोगी और सहभागी बनना ही चाहिए और बनना ही पड़ेगा।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
प्रायः अधिकाँश व्यक्ति मानसिक रूप से आलसी होते हैं। जब वे परीक्षा के लिए किसी पुस्तक को तैयार करने बैठते हैं, तो वे उसका अध्ययन नहीं करते प्रत्युत घोड़े की तरह सरपट दौड़े जाते हैं। पुस्तक पढ़ने के पश्चात् यदि आप उनसे प्रश्न करें कि क्या पढ़ा है, तो वे कुछ भी उत्तर नहीं दे पाते। कारण उनकी स्मृति पुस्तक से कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाती। ज्ञान ऊपर से ही निकल जाता है,नवीन संस्कारों को दृढ़ता से मन नहीं पकड़ पाता। प्रतिदिन वे नई पुस्तक पढ़ते हैं किन्तु उनके मन में केवल एक हलकी-सी छाया मात्र रह जाती है।
हमें चाहिए कि मन की इस भाग-दौड़ और भँवर वृत्ति से छुटकारा प्राप्त करें। किसी पुस्तक से स्थायी लाभ प्राप्त करने के लिए हमें चाहिए कि पुस्तक को धीरे-धीरे शान्तिपूर्वक पढ़ें। कुछ पढ़ने के पश्चात् रुकें तथा अपने आप से प्रश्न करते रहें, “हमने अभी तक क्या पढ़ा है?” यदि मन पर नये संस्कार नहीं पड़े हैं तथा स्मृति ने कुछ ग्रहण नहीं किया है तो हमें पुनः उस भाग को पढ़ना चाहिए, यहाँ तक कि नये संस्कार जटिलता से अंकित हो जाय। अध्ययन करते समय इन तत्वों पर विशेष ध्यान रखिए :—
1—मनन :- अर्थात् पढ़ी हुई बात पर पुनः पुनः चिंतन, सोचना, विचार करना जिससे कि वह मन में बैठ सके और भूला न जा सके। पढ़ी बात पर जितना ही चिंतन किया जायगा, वह उतनी ही स्मृति में अच्छी तरह बस जायगी।
2—पूर्व पर्यवेक्षण :- जो कुछ आप पहले पढ़ चुके हैं, उसे नये ज्ञान से संयुक्त करना, उसे न भूलना, वरन् नये विचार से उसका मिलान करना। यदि पिछला भूलते जायं और आगे पढ़ते जायं, तो कोई लाभ नहीं है। अध्ययन का सम्बन्ध विचार से है। टामस हाव्स ने कहा कि यदि मैं उतना ही पढ़ता जितना दूसरे लोग पढ़ते हैं तो मेरा ज्ञान उतना ही कम होता। कारण लोग पहले पढ़े पर सोच विचार करना नहीं चाहते। उनकी मानसिक पाचन क्रिया ठीक नहीं है।
यूनानी तत्वज्ञानी डीमाक्रोटस ने जो ईसा से तीन सौ वर्ष पूर्व हुए थे, उन्होंने अपने नेत्र इसीलिए निकलवा डाले थे जिससे व्यर्थ कागज पर नेत्र दौड़ाने के स्थान पर वह मनन और चिंतन कर सके। पुनः पुनः स्मृति में संगृहीत ज्ञान की आवृत्ति करने से ज्ञान दृढ़ होता है और संस्कार परिपुष्ट होते हैं।
3—ध्यानावस्थिति :-मन का तेजी से पुस्तक के मैटर पर दत्तचित्त रूप में लगा रहना। जितना ही अधिक आपका ध्यान विषय में लगा रहेगा, उतना ही आपका मन नये ज्ञान को ग्रहण करेगा। प्रायः लोग रुचि पूर्वक पुस्तक के विषय में दिलचस्पी नहीं लेते, अतः ध्यान उस पर नहीं लगता। कोई भी लाभ पठन-पाठन से नहीं होता। ध्यान को अधिक से अधिक लगाये रहने से ही नया ज्ञान अन्तस्तल में अंकित होता है। बहुधा लोगों की आंखें तो पुस्तक पर रहती है, मन कहीं अन्य चक्कर लगाता रहता है, जब तक मन की आँखें नये ज्ञान पर केन्द्रित नहीं होंगी, विचार मन में न ठहरेंगे। अधूरे विचारों को नोट करने से ध्यान लगा रहता है।
4—स्मृति को दृढ़ बनाना :- स्मृति को मजबूत करना चाहिये। स्मृति के खजाने में ही सब ज्ञान संचित रहता है। स्मृति हमारे बौद्धिक विकास की प्रथम सोपान है। यदि हमारा ज्ञान स्मृति में सुरक्षित होता रहे, तो निरन्तर ज्ञानवृद्धि होती रहे।
अखण्ड ज्योति 1952 अगस्त, पृष्ठ 14
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