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Thursday 15, January 2026

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सूक्ष्म शरीर का उत्कर्ष ज्ञान योग से | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां

सूक्ष्म शरीर का उत्कर्ष ज्ञान योग से | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां

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You Hold the Key to Perfect Life | The Angelic Light Of Rishi Thought

You Hold the Key to Perfect Life | The Angelic Light Of Rishi Thought

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देने वाला धन्य होता है | गुरु अपनी शक्ति शिष्यों मे समा देते हैं | माताजी जन्मशताब्दी समारोह–2026

देने वाला धन्य होता है | गुरु अपनी शक्ति शिष्यों मे समा देते हैं | माताजी जन्मशताब्दी समारोह–2026

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शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्ता मोहनलाल जी से विशेष बातचीत

शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्ता मोहनलाल जी से विशेष बातचीत

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आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य क्या है? | Aatmotkarsh Ka Uddeshya Kya Hai | Rishi Chintan

आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य क्या है? | Aatmotkarsh Ka Uddeshya Kya Hai | Rishi Chintan

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अमृत सन्देश:- सही अवसर की पहचान | Sahi Avsar Ki Pehchan

अमृत सन्देश:- सही अवसर की पहचान | Sahi Avsar Ki Pehchan

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सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्त करें | Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | Dr Chinmay Pandya

सिद्धियाँ कहाँ है और कैसे प्राप्त करें | Siddhiyan Kahan Aur Kaise Prapt Karen | Dr Chinmay Pandya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 15 January 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 15 January 2026 !!

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!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 15 January 2026 !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



 प्रातः काल के समय या किसी भी समय, प्रातः काल सूर्योदय के समय पर आप एक माला गायत्री मंत्र की कम से कम जरूर जप कर लिया करें। जब किया करेंगे तो चैबीस लाख जो हमारे व्यक्ति हैं, चैबीस लाखों कि चैबीस लाख मालाएँ अर्थात दो सौ चालीस करोड़ जप नित्य हो जाया करेगा। यह हमारा संकल्प खंडित नहीं होना चाहिए और आप, आपकी भागीदारी उसमें बराबर रहनी चाहिए। भूलना मत। आप भूल जाएँगे तो हमको अच्छा नहीं लगेगा। एक दूसरी बात। दूसरी बात यह थी कि आपको कभी यह मन आया करें गुरुजी के साथ संपर्क मिला ले, जरा बातचीत तो कर ले, टेलीफोन तो मिला ले।तो बेतार का तार बना करके हमने एक रखा है कि सूर्योदय से एक घंटा पहले से लेकर के सूर्योदय के समय तक अगर आप एकांत में ध्यान में स्थिर चित्त करके बैठेंगे और यह अनुभव करेंगे कि हमारे साथ आप जुड़ गए,मिल गए, हमारे पास बैठे हुए हैं, तो हमारे संदेश आपके भीतर तक जाना शुरू कर देंगे। हमारे गुरुदेव के संदेश भी हमारे भीतर आते हैं। कान से कहते हैं नहीं, तार देते हैं। नहीं, चिट्ठी डालते नहीं, ऐसा नहीं करते। उनके संदेश हमारे भीतर आना शुरू हो जाते हैं। उसको हम यह मान लेते हैं कि यह संदेश सही है। आप भी ऐसा कर सकते हैं। यह दोनों ही रास्ते आपके लिए खुले हुए हैं। आप क्या चाहते हैं? अब आप? हम क्या चाहते हैं आपसे और क्या चाहेंगे? हमारे बच्चे हैं। जो हम करें, वह आप कीजिए। जुलाहे का बेटा जुलाहा, जुलाहा होता है। लोहार का बेटा लोहार होता है। पंडित का बेटा पंडित होता है। आपको भी वह करना चाहिए, जिस परंपरा पर हम चले हैं, उसी परंपरा पर आपके कदम बढ़ने चाहिए। 

परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



सुख कैसे प्राप्त करें? यह प्रश्न सदियों से हजारों मनुष्य करते चले आये हैं, करते रहते हैं और करते रहेंगे। विचार करना है सुख किसे कहते हैं? कहाँ कैसे प्राप्त किया जा सकता है? कुवासनाओं एवं नीची प्रवृत्तियों की सन्तुष्टि को सुख नहीं कहते। वह केवल मन का भ्रम है और भ्रम का आवरण हटते ही हमें त्रुटि दिखलाई देने लगती है। क्या ही आश्चर्य की बात है कि किसी को मोटर खरीदने में, किसी व्यक्ति को सिनेमा इत्यादि देखने में और किसी-किसी को अति मधुर खाद्य-पदार्थों में सुख मिलता है जबकि दीन को केवल पेट भर भोजन मिल जाने से ही सुख प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न यह उठता है—क्या लोहे से बनी हुई मोटर में सुख है, अथवा मधुर खाद्य-पदार्थों में सुख है, या फिर अन्य किसी बाह्य पदार्थ में उसकी स्थिति है? यदि सुख किसी बाहरी पदार्थ में होता तो फिर जो वस्तु एक को सुखकर होती है वह दूसरे को किसी और को भी उतना ही आनन्द देती परन्तु अनुभव से ज्ञात होता है कि ऐसा नहीं है। जो वस्तु एक को सुख या आरामदायक है वह दूसरे को कभी-कभी उससे भी हानिकारक है। जैसे अफीम का व्यसन आदत पड़े हुए व्यक्ति को किसी भी भ्रमात्मक अंश तक लाभदायक हो सकता है परन्तु जो उसे खाने का आदी नहीं है उसे वह हानि पहुँचाता है।

यदि सुख इन पदार्थों में ही निहित होता तो फिर हम त्यागी महात्माओं को सर्व प्रकार से सुखी कैसे पाते? और इन पदार्थों के पाने वालों को फिर भी दुःखी क्यों देखते? सुख दैवी वस्तु है। आत्मिक आनन्द है। नश्वर शरीर से उसका कोई लगाव नहीं, जो ऐसा समझते हैं कि सुख का सम्बन्ध शरीर से है वे भ्रम में हैं जड़ता से सुख की उपलब्धि कभी नहीं हो सकती, वह तो अपने ही अन्दर विद्यमान है, परंतु खेद है कि हम उसे अपने में खोजने का प्रयत्न नहीं करते और कस्तूरी नाभि में बसे हुए मृग के समान बाहर रेतीले मैदानों में उसे खोजते फिरते हैं।

हमारी बुद्धि का कितना हास्यास्पद कृत्य है जबकि हम जड़ता से जड़ता की सन्तुष्टि में सुख निहित समझते हैं। यह ठीक उसी प्रकार की मूर्खता है जिस प्रकार हमें जाना तो मन्दिर को है और हम चल रहे हैं अस्पताल की राह पर, सोचते यह जा रहे हैं कि जब चल रहे हैं तो मन्दिर ही पहुँचेंगे।

मानव शरीर भौतिक पदार्थों के अनुपात से सृजित होने के कारण भौतिक पदार्थों से सम्पन्न और संकलन में ही सुख समझता है जबकि पूर्वी दर्शन उसे व्यामोह, मतिभ्रम या माया जाल कहता है। केवल भौतिकता से कभी सुख नहीं मिल सकता यह पाश्चात्यों की स्थिति से प्रत्यक्ष है। जिस देश में भौतिकता का सम्मान होगा वह देश पतनोन्मुख होगा और जिस देश में आध्यात्मिकता को सम्मानित किया जायगा वह उन्नतिपूर्ण होगा।

कोई-कोई यह भी प्रश्न करते हैं-क्या सुख का स्थान बदलता रहता है। यह एक स्वाभाविक प्रश्न है। पात्र, देश और काल के साथ-साथ सुख का स्थान भी परिवर्तित होता रहता है बचपन में बालक अपनी माँ के स्तन्य के समतुल्य संसार की कोई वस्तु नहीं समझता। वह बालक जब कुछ और बड़ा हो जाता है तो फिर खेलने के खिलौनों को अधिक महत्व देने लगता है। युवावस्था प्राप्त होने पर वह अपनी पत्नी के प्रेम में रंग जाता है, और सन्तान उत्पन्न होते ही उसका प्रेम बच्चों पर केन्द्रित हो जाता है।

प्रेम करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। प्रेम हीन हृदय की साहित्य में पाषाण से समता की गई है। सच्चे प्रेम से परम सुख की प्राप्ति होती है परन्तु सच्चा प्रेम त्याग की नींव पर ही दृढ़ रह सकता है। त्याग अभाव में प्रेम न रह कर विकार का रूप धारण कर लेता है। शारीरिक इन्द्रिय जन्य सुख की कोई स्थिति नहीं। यह भी क्षणिक होता है, और ग्लानि उत्पन्न करता है।

सुख किसी से बदला लेने में नहीं वरन् क्षमा करने में है, बलिदान में है, आत्मोत्थान में है। सत्य कर्मों के करने से, सत्य वचनों के बोलने से आत्मा विभोर हो उठती है। सत्कर्म शील मनुष्य के चेहरे पर ओज होता है। उसकी वाणी एक प्रकार का राग और मुद्राओं में सम्मोहन की शक्ति होती है जिसके प्रति हमारा हृदय अपने आप खिंचने लगता है। वह हर कार्य ईश्वर के लिए करता है। उसकी कीर्ति ज्योति से विश्व चमकने लगता है।

अखण्ड ज्योति 1952 अगस्त, पृष्ठ 16

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