Friday 15, August 2025
हिंदू धर्म का सिद्धांत है कि "जब कभी धर्म की बहुत अधिक हानि हो जाती है और अधर्म का बोलबाला हो जाता है, तो भगवान् अवतार लेकर बिगड़ी हुई परिस्थिति का सुधार करते हैं।" ऐसा ही समय भारतवर्ष में अब से लगभग ५ हजार वर्ष पहले आया था। उस समय सीधे-सीधे गणतंत्र राज्यों के स्थान पर बड़े-बड़े साम्राज्यों की स्थापना का सूत्रपात हो गया था और शक्तिशाली तथा कुचक्र रचने में निपुण राजा स्थानीय शासनों का नाश करके अपनी साम्राज्य स्थापित करने की लालसा की पूर्ति कर रहे थे। मगध नरेश जरासंध ने बहुत से छोटे-छोटे राजाओं को कैद करके उनके राज्यों पर कब्जा कर लिया।
शिशुपाल भी महा अभिमानी और महत्त्वाकांक्षी राजा था। प्राग्जोतिष (आसाम) के राजा नरकासुर ने दुराचार के लिए असंख्यों सुंदरी कन्याओं को पकड़कर अपने महल में बंद कर रखा था। मथुरा के राजा कंस की दुष्टता और राज्य-लोलुपता इतनी बढ़ गई थी कि उसने अपने वृद्ध पिता उग्रसेन को कैद कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया था। दुर्योधन की घोर स्वार्थपरता के उदाहरण और अन्य राजा-रानियों के चरित्रों से भी यह प्रकट होता है कि उस समय इस देश के बड़े आदमियों में से अधिकांश का चरित्र और धर्म की निगाह से पतन हो गया था और वे विलास और वैभव के आगे नीति और न्याय की परवाह नहीं करते थे।
ऐसे समय में स्वभावतः ही ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी, कि जिससे धर्म का चारों ओर से हास होने लग गया था और लोगों की रुचि अधर्म की ओर प्रवृत्त होने लगी थी। सज्जन कष्ट पाने लगे थे और अन्यायी, अत्याचारी, दुराचारी गुलछर्रे उड़ा रहे थे। द्रोणाचार्य जैसे विद्वान् और ज्ञानी भी कौरवों के धन से खरीद लिये गये थे, जिससे द्रौपदी पर घोर अत्याचार होता देखकर भी वे बोलने का साहस न कर सके।
भीष्म पितामह जैसे परम ज्ञानी भी वेद के अभ्यासी न थे। ऐसे संकट के समय में किसी महान् विभूति के आगमन की आवश्यकता थी, जो अधर्म का नाश करके पुनः धर्म की स्थापना करे। परमात्मा की इच्छा से ऐसा ही हुआ और अब (सं० २०५८ वि०) से ५२०८ वर्ष पूर्व भाद्रपद बदी अष्टमी, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र में भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। उनका जन्म कैसी कठिन परिस्थिति में कंस के कारागार में हुआ, किस प्रकार उनको गुप्त रूप से पालन-पोषण के लिए गोकुल निवासी गोपाधिपति नंद के यहाँ पहुँचा दिया गया और किस प्रकार छोटी अवस्था में ही उन्होंने अपूर्व तेजस्विता और वीरता का परिचय देकर लोगों को चकित कर दिया, यह सब कथा सर्व विदित है।
बाल्यावस्था ही नहीं, भगवान् कृष्ण का समस्त जीवन ही अन्याय का प्रतिकार और न्याय की रक्षा करने में बीता था। उनके चरित्र से हम भी जो सबसे बड़ी शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, वह यही है कि हमको किसी भी प्रलोभन या भय के वशीभूत होकर अन्याय के सम्मुख सिर नहीं झुकाना चाहिए, फिर चाहे वह अन्याय किसी एक व्यक्ति का हो या समाज का हो या राज्य का हो। इतना ही नहीं अगर अन्याय करने वाला अपना सगा भाई-बंधु व रिश्तेदार भी क्यों न हो, अगर वह अधर्म के मार्ग पर चलता है, तो उसका विरोध करना हमारा कर्तव्य है। भगवान् कृष्ण ने राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, कला संबंधी सभी क्षेत्रों में कार्य किया और लोगों को असत् मार्ग से हटाकर सत्मार्ग पर चलाया। इसी प्रकार हमको भी अपने समाज में, राज्य में, व्यक्तियों में जो दोष दिखलाई पड़ें, जो बातें अन्याय या अत्याचार की जान पड़ें, उनका निर्भय होकर विरोध करना चाहिए। यह एक बहुत बड़ी जन-सेवा का कार्य है और इसी के करने से हम भगवान् कृष्ण की जयंती मनाने के अधिकारी सिद्ध हो सकेंगे।
इस समय संसार की जैसी परिस्थिति हो रही है, उसमें भगवान् कृष्ण के उपदेशों को समझना और तदनुसार कार्य करना और भी आवश्यक हो गया है। दुनिया के अधिकांश देशों में साम्राज्यवाद का बोल-बाला है और वे कमजोरों को दबाकर अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं। इसके लिए न्याय-अन्याय का कोई विचार नहीं किया। जिसे दबाना चाहा जाता है, उसके लिए कोई सच्चा-झूठा बहाना निकाल लिया जाता है। ऐसी हालत में प्रत्येक स्वाभिमानी व्यक्ति का कर्तव्य है कि किसी आतातायी के अन्याय और अत्याचार के सम्मुख सिर न झुकाये और जो व्यक्ति दुर्भाग्यवश अन्याय के शिकार बन गये हैं, उनकी सहायता के लिए भी सदा तैयार रहे। यह सच है कि इस प्रकार किसी बड़े शक्तिशाली का विरोध कर सकना हर एक का काम नहीं है, पर अगर हम न्याय-पक्ष के अनुयायी हैं, तो अपनी शक्ति के अनुसार कुछ न कुछ कार्य कर ही सकते हैं और जब हम सच्चे हृदय से कार्य करेंगे, तो हमको अपने जैसे अन्य सहयोगी भी मिल जाएँगे। अगर हम अपने उद्देश्य में पूर्णरूप से सफल न भी हों, तो सच्ची कर्तव्य बुद्धि से किया गया कार्य निष्फल नहीं जाता और किसी न किसी रूप में अग्रसर होता हुआ समय आने पर अवश्य सफल होता है।
त्योहार और व्रत
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
जय श्री कृष्णा जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय हिन्द! जिसका ताज हिमालय है, जिसकी धड़कनों में गंगा बहती है, जहाँ की हर बोली में संस्कृति की सुगंध है और हर दिल में देश की एकता बसती है — वही पावन भूमि है भारतवर्ष।
🌼 79वाँ स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳
अमृतवाणी:- मालवीय जी द्वारा गायत्री का महात्म्य | Malviya Ji Dwara Gayatri Ka Mahatamya पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अगर हम नहीं देश के काम आए | आजादी का अमृत महोत्सव | 15th August Independence Day 2022 New Song
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 15 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: नए ढंग से विचार करने की आवश्यकता पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
मछली, मछली जो है, सब बहते चले जाते हैं। पानी जब बहता है, सब बह जाते हैं। पानी के साथ, चप्पल बह जाते हैं, कांटे बह जाते हैं, लकड़ियां बह जाती हैं, हाथी बह जाते हैं, घोड़े बह जाते हैं, भैंसे, गाय बह जाती हैं। जब बहाव आता है, सब बह जाते हैं। पर एक जानवर ऐसा है, जो पानी के बहाव को चैलेंज करता है। और यह कहता है, हम आपके साथ-साथ चलने के लिए कतई तैयार नहीं हैं। हम अपनी मर्जी से चलेंगे। और उस जानवर का नाम है मछली। मछली बीच पानी की धार में, बीच पानी की धार में छरछराती हुई उल्टी दिशा में चल पड़ती है। लहरें माने करती हैं, नहीं, नहीं, हम नहीं चलने देंगे। आप क्या कर सकते हैं? दिलेरी के सामने आप क्या कर सकते हैं? हम चलेंगे, और उल्टी दिशा में चलेंगे। उल्टी दिशा में चलेंगे, चीरती हुई। सारे के सारे लोग सीधी दिशा में चलते हैं। वह उल्टी दिशा में चल सकती है। बेटे, बस यही दिलेरी की आपको जरूरत है। कि आप इस तरीके से, आप इस तरीके से हिम्मत अपने भीतर संभाल के रखे रहें। ऐसी वाली हिम्मत जो समय को बदल डालने के लिए आवश्यक है। तो फिर समय से मुकाबला किससे करना पड़ेगा? बेटे, एक हवा चल रही है, एक प्रवाह चल रहा है, एक से एक लोगों की मनोवृत्तियां चल रही हैं, एक आदमी का सब ढर्रा चल रहा है। इस ढर्रे को नया बदलने के लिए, ढर्रे को नया बदलना है। तो किसी को शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी। शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी। आगे-आगे किसी को तो चलना ही पड़ेगा। लोग पीछे से चलेंगे। आदत लोगों की यही तो है ना, कोई आगे चले तो हम पीछे चले, कोई आगे चले तो हम पीछे चले। आगे आपको चलना पड़ेगा। अगर आपको आगे चलने की हिम्मत हो, और दिलेरी हो, और आपके भीतर इतना माद्दा हो कि हम जमाने की हवा और जमाने की ढर्रे का मुकाबला करते हुए नए ढंग से हम विचार कर सकते हैं, और नई परिस्थितियों को बुला लाने के लिए हिम्मत कर सकते हैं। अकेले आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ा सकते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
15 अगस्त राष्ट्र अर्चन का महापर्व है। आज इस शुभ घड़ी में एक अरब से भी अधिक भारतवासियों की उफनती-उमड़ती भावनाएँ राष्ट्र आराधन के लिए तत्पर हैं। चिर अतीत से भारतभूमि के निवासियों के लिए राष्ट्र उपास्य और ईष्ट रहा है। पश्चिमी दुनिया के लिए ‘नेशन’ या ‘स्टेट’ तकनीकी और आर्थिक इकाई भर है। यही कारण है कि वहाँ सभी ओर स्वार्थपूर्ण स्पर्धा व संघर्ष की ही सृष्टि हुई है। जबकि वैदिक ऋषियों ने राष्ट्र को प्रखर साँस्कृतिक चेतना के रूप में विकसित किया।
भारतभूमि के महान् महर्षियों ने यहाँ की प्रकृति प्रदत्त विविधताओं को सहज भाव से स्वीकार किया था। साथ ही उन्होंने मनुष्य के अन्तःकरण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके साँस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पायी। मानवीय चेतना विज्ञान के मर्मज्ञ ऋषियों ने अनुभव किया था कि केवल भौतिक आधारों पर बनाए गए सम्बन्ध टिकाऊ-चिरंजीवी नहीं हो सकते। प्रधानता यदि भौतिक आधारों को ही दी जाए तो पारस्परिक सम्बन्धों में देर-सबेर स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, शोषण आदि का समावेश हो ही जाता है। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय सहअस्तित्व को कालजयी बनाने के लिए साँस्कृतिक आधारों को प्रधानता दी। साँस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन-जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई में बिठाया।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है- रातियों का संगम स्थल। ‘राति’ शब्द देने का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र इसलिए कही जाती है, क्योंकि यहाँ सभी राष्ट्र जन अपनी-अपनी देन (समर्पण-त्याग की आहुति) राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते हैं। इसी वजह से उनमें राष्ट्र के लिए सर्वस्व त्याग एवं पूर्ण समर्पण की भावना उद्भूत होती है। राष्ट्रभूमि के प्रति प्रेम, सेवा और त्याग का भाव उनमें राष्ट्र निष्ठ बनकर प्रकट होता है। इस निष्ठ की व्याख्या करते हुए पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था- ‘जब एक मानव समुदाय के समक्ष-एक लक्ष्य, एक उद्देश्य और एक आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है।’
राष्ट्र अर्चन का महामंत्र देने वाले स्वामी विवेकानन्द ने कहा था- राष्ट्र अर्चन से श्रेष्ठता और कुछ भी नहीं। हमारे लिए एक ही श्रेष्ठतम देवता है-राष्ट्रदेवता। इसी की अर्चन-आराधना हमारा जीवन व्रत होना चाहिए। स्वामी जी कहते थे, प्रत्येक राष्ट्र का अपना जीवन व्रत है, जो विभिन्न जाति-समूह की सुश्रृंखल अवस्थिति के लिए विशेष आवश्यक है। और जब तक वह राष्ट्र उस आदर्श को पकड़े रहेगा, तब तक किसी भी तरह उसका विनाश नहीं हो सकता।
महर्षि अरविन्द के अनुसार- राष्ट्र एक साँस्कृतिक इकाई है। इसलिए राजनैतिक एकता चाहे न भी रहे तो भी राष्ट्र बना रहता है, कठोर प्रयत्न करता है, कष्ट उठाता है परन्तु नष्ट नहीं होता। श्री अरविन्द आश्रम की श्री माँ के शब्दों में - जैसे महिषासुर मर्दिनी भवानी देवों की सम्मिलित शक्ति है। उसी तरह से अपना राष्ट्र भी है। यह केवल एक भूखण्ड भर नहीं है। यह एक चेतन सत्ता है, स्वर्गादपि गरीयसी है। यह तप, शक्ति एवं संभावनाओं को अपने अन्दर धारण करने में उन्हें बीजों की तरह विकसित करने में समर्थ है।
अखण्ड ज्योति, अगस्त 2003, पृष्ठ 44
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