Saturday 16, August 2025
अखिल विश्व गायत्री परिवार के मुख्यालय शांतिकुंज, हरिद्वार में तीन दिवसीय युवा जागरण शिविर का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। शिविर में प्रयागराज, कौशांबी, कुशीनगर, चंदौली (उत्तर प्रदेश) और पश्चिम बंगाल से 300 से अधिक युवा शामिल हुए।
शांतिकुंज प्रतिनिधियों ने युवाओं को समाज की विषमताओं से लड़ने और युग निर्माण व विचार क्रांति में सक्रिय भूमिका निभाने का संदेश दिया। युवाओं ने पूज्य गुरुदेव और परम वंदनीया माताजी के स्वप्न "मानव में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण" को साकार करने का संकल्प लिया।
Krishna Janmastami Bhajan Special | Krishna janmastami | Krishna New Song
अमृतवाणी:- क्रिया-योग किसे कहते हैं? Kriya Yog Kise Kehte Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 16 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: पीले कपड़ों की विशेषता और पहचान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जहां दूसरे आदमी तरह-तरह के कपड़े पहनते हैं। आपको पीले कपड़े हमने पहनाए थे। क्यों पहनाए थे? हमने ये पहनाए थे कि दूसरा कोई आदमी पीले कपड़े नहीं पहनता। बाजार में घूम आइए, आप बाजार में घूम आइए, आपको नीले पेंट पहनने वाले मिलेंगे। ब्लू पेंट पहनने वाले मिलेंगे। अमुक रंग के मिलेंगे। पीले रंग का कोई नहीं मिलेगा। आप पीले रंग के आपको शर्म लगेगी नहीं? साहब, हमको कोई शर्म नहीं लगती। देखो, यह आया पीले कपड़े वाला। यह आया बाबा जी। यह आया भिखारी। देखो, यह आया पंडित। यह आया जोगी। यह आया ठग। आप कहिए, कहने दीजिए। यह पीले कपड़े से आपने हिम्मत तो नहीं हारी। लोग क्या कहते हैं? लोग कहें, अपनी जुबान है, जो भी चाहे कह सकते हैं। लेकिन गुरु जी ने हमको पीला कपड़ा पहनाया है, तो हमको पीले कपड़ों में अपनी इज्जत मालूम पड़ती है और शान मालूम पड़ती है। नहीं, यह भिखारी है, और यह भीख मांगते होंगे। हां, हां, मांगते हैं। भीख जा, तेरे घर मांगने आए तो मत देना। चलो, अकेली अकेली, जिस तरह का आदमी की दिलेरी हो, दिलेरी आदमी की जिसके अंदर है, और जो आदमी सारे दुनिया को हंसता हुआ देख कर भी अपनी जगह पर खड़ा रह सकता है। बेटे, मैं उसको दिलेर आदमी कहता हूं, और मैं कहता हूं इस आदमी से मैं उम्मीदें कुछ कर सकता हूं कि नया जमाना लाने के लिए और नई फिजाएं पैदा करने के लिए शायद ये कुछ आदमी काम आ जाए। जो आदमी ढर्रे पर बह रहा है, ढर्रे पर बह रहा है, मैं क्या कर सकता हूं बेटे? मुझे तो नया ढर्रा पैदा करना है, नया वक्त लाना है, नई जिंदगी पैदा करनी है, नया आदमी पैदा करना है, और नए स्वभाव और नए संस्कारों से आदमी को ढालना है। इसीलिए मुझे नया आदमी चाहिए, और ऐसा आदमी चाहिए जो हवा से प्रभावित न होता हो। ढर्रे के बहाव में, ढर्रे के बहाव में, चीरने के लिए जिसके अंदर कुवत और जिसके अंदर कलेजा हो। मुझे सिर्फ ऐसे आदमी चाहिए, दूसरे आदमी नहीं चाहिए।
अखण्ड-ज्योति से
भगवान श्री कृष्ण, जिनको हम परमात्मा का अवतार मानते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में ऐसे महान् कार्य किये हैं कि उनका अनुकरण करके हम भी क्षुद्रता से महानता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। किन्तु धर्म में उनकी इतनी लोक प्रियता है कि लाखों व्यक्ति उनको अपना आदर्श मानकर पूजते हैं। सच्चे अर्थों में उनकी पूजा यही है कि हम भी उनके व्यवहार रूप में बताए हुए मार्ग पर चलें।
जिस समय भगवान कृष्ण ने अवतार लिया था उस समय कंस अपने राज्य में जनता पर बहुत अत्याचार कर रहा था, अन्याय और अधर्म करता था। सन्त, महात्मा और ब्राह्मणों को बहुत कष्ट देता था, यज्ञों को विध्वंस करता था। जनता उससे बहुत दुःखी थी। वह समस्त ग्रामों से दूध और दही मंगवा लिया करता था ताकि लोगों को दूध, दही और घी आदि पौष्टिक पदार्थ न मिले तो उनके शरीर शिथिल ही रहेंगे और उसका मुकाबला न कर पायेंगे। उस समय लोग गौओं के महत्ता को भूल गये थे। भगवान कृष्ण ने गौओं की महत्व को बढ़ाने के लिए उनको स्वयं चराया और उनके दूध दही की ओर प्रेम प्रकट किया। जो ग्वालिनें दूध और दही कंस को देने के लिए जाया करती थीं।
उनको वह वहाँ जाने नहीं देते थे और उनका दूध, दही लूट लिया करते थे और कहते थे कि कंस को कहना कि कृष्ण ने उन्हें मना किया था। कंस इतना जालिम था कि बड़े-बड़े राजा भी उसका मुकाबला करने का साहस न कर सकते थे, परन्तु भगवान कृष्ण ने उसके विरोध में जन क्रान्ति खड़ी कर दी और जनता को उसके खिलाफ भड़काया। जनता तो चाहती ही थी कि कोई जन नायक आगे बढ़े और वह उसके पीछे चलकर कंस के राज्य को उलट दें। आतताई तो स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ा मारता है, उसके स्वयं के दुष्कर्म उसे खा जाते हैं। सार यह कि कंस के साथ भी वैसा हुआ जैसा कि संसार में ऐसे व्यक्तियों के साथ होता आया है।
भगवान् कृष्ण के जीवन में “गोवर्धन” के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण घटना आती है। उन्होंने जनता को समझाया था कि गौ का गोबर एक प्रकार का धन है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इसका एक महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसके द्वारा खेती में उन्नति होती है। खेती में उन्नति धन की उन्नति ही मानी जायगी। पुराणों की एक कथा में बताया गया है कि लक्ष्मी का निवास गोबर है।
जब कंस मारा गया और उसके पिता उग्रसेन को जेल से निकाला गया तो महाराज उग्रसेन (कृष्ण के नाना) ने यह चाहा कि वह अब वृद्ध हो चुके हैं और कृष्ण को ही वह राजगद्दी सौंपना चाहते हैं परन्तु उन्होंने स्पष्ट रूप से इन्कार कर दिया कि यदि मैं राजा बन गया तो मुझ से समाज कल्याण का कार्य छूट जायगा। उन्होंने इतने बड़े राज्य को समाज हित के लिए ठुकरा दिया।
माता रुक्मणी ने एक बार पुत्र की इच्छा प्रकट की थी तो उन्होंने उत्तर दिया “अभी हम सन्तान के योग्य नहीं हैं। हमें 12 वर्ष तक बद्रिका आश्रम में बेर खा कर तपश्चर्या करनी चाहिए तब हम उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के योग्य होंगे।” तब उन दोनों ने 12 वर्ष तक गायत्री माता की आराधना की थी और उन जैसे गुणों का पुत्र प्राप्त हुआ था। भागवत में उनकी दिनचर्या के सम्बन्ध में आता है कि वह नित्य प्रति गायत्री जाप व हवन किया करते थे। हमें भी उनका अनुकरण करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति, अगस्त 1959, पृष्ठ 28
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