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Sunday 17, August 2025

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अमृतवाणी:- अध्यात्म भावना से संबंध रखता है | Adhyatm Bhawna Se Sambdhan Rakhta Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- अध्यात्म भावना से संबंध रखता है | Adhyatm Bhawna Se Sambdhan Rakhta Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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आतंरिक चेतना की पुकार : दिव्य चेतना का हस्तक्षेप | चेतना की शिखर यात्रा | डॉ प्रणव पण्ड्या जी

आतंरिक चेतना की पुकार : दिव्य चेतना का हस्तक्षेप | चेतना की शिखर यात्रा | डॉ प्रणव पण्ड्या जी

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 17 August 2025

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!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 17 August 2025

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!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 17 August 2025

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 17 August 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 17 August 2025

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!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 17 August 2025

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!! शांतिकुंज दर्शन 17 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 17 August 2025

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अमृतवाणी: बेटा तू भलमनसाहत का रास्ता चुनना पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



मुझे खुशी है कि आप लोग ऐसे ही आदमियों में से हैं जिन्होंने ये निश्चय किया कि हम अपना मनोबल संग्रह करेंगे। मनोबल संग्रह करेंगे तो बेटे फिर मनोबल का क्या इस्तेमाल करेंगे? मनोबल के लिए आपको कई इस्तेमाल करने चाहिए ये हथियार। कौन सा? जो आपने पीले कपड़े के साथ-साथ आपने पहना, और मैंने जिसके लिए उम्मीदें की और जिस काम की दीक्षा दी आपको, आपको मैंने मनोबल की दीक्षा दी। और यह मनोबल वह है जो श्रेष्ठ कामों के लिए, आदर्श क्रियाकलापों के लिए, लोगों की कोई चिंता न करते हुए। लोग क्या कहते हैं? लोग बड़े गंदे हैं, और लोग बड़े वाहियात हैं, बड़े वाहियात और गंदे लोग हैं। इनकी सलाह, इनका मशवरा, इनका परामर्श से हमारा कोई काम बनने वाला नहीं है। यह शिवाय चोरी के अलावा, चालाकी के अलावा, बदमाशी के अलावा, बेवकूफी के अलावा कोई सलाह नहीं दे सकते। इनके पास भलमनसाहत की सलाह कहां है? एक आदमी मुझे पकड़ के लाइए जो आपको भलमनसाहत की और शराफत की सलाह देने के लिए तैयार हो। शराफत की सलाह देने वाले हैं ही नहीं तो मैं क्या कर सकता हूं? बेटे, आपको हिम्मत के साथ भगवान की सलाह और अपनी आत्मा की सलाह लेकर के आगे बढ़ना चाहिए। आगे अगर बढ़ेंगे तो वो उद्देश्य पूरा हो जाएगा, जिसको हम वानप्रस्थ जीवन कहते हैं।
वानप्रस्थ जीवन का उद्देश्य यही है। तो क्या करना पड़ेगा बेटे? एक-एक करके कदम बढ़ाता चल। ऐसे कदम बढ़ाता चल। जिसमें कि तेरी हिम्मत, सिद्धांतों के प्रति निष्ठा का सबूत मिलता हो। क्या-क्या काम करूं बेटे? पहला तो काम ये कर, एक बंटवारा कर। काहे का बंटवारा कर दूं? बंटवारा इसका कर दे बेटे कि तेरी दुकान में दो आदमियों का हिस्सा है। तेरी दुकान में दो आदमियों का हिस्सा है। एक आदमी तो 99% माल खाता रहता है, और पार्टनर तो वो भी है। पार्टनर तो वो भी है, पर वो उसको अंगूठा दिखा देता है, कुछ भी नहीं देता। तो पहला इंसाफ ये करा। इंसाफ। दुनिया में बेइंसाफी सब जगह हो रही है, और बेइंसाफी को पहली बार अपने पास से दूर कर। ये बेइंसाफी दूर हो जाए। इंसाफ चालू हो जाए। इंसाफ की दुनिया, ये तो हमको लानी है। न्याय की तो दुनिया लानी है। भलमनसाहत की दुनिया तो लानी है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



अब हम युग निर्माण परिवार का प्रारम्भिक सदस्य उन्हें मानेंगे जिनमें मिशन की विचारधारा के प्रति आस्था उत्पन्न हो गई है, जो उसका मूल्य महत्व समझते हैं, उसके लिए जिनके मन में उत्सुकता एवं आतुरता रहती है। जिनमें यह उत्सुकता उत्पन्न न हुई हो उनका हमसे व्यक्तिगत सम्बन्ध परिचय भर माना जा सकता है, मिशन के साथ उन्हें सम्बन्ध नहीं माना जायेगा।

 यहाँ इन दो बातों का अन्तर स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए कि हमारा व्यक्तिगत परिचय एक बात है और मिशन के साथ सम्बन्ध दूसरी। व्यक्तिगत परिचय को शरीरगत संपर्क कहा जा सकता है और मिशन के प्रति घनिष्ठता को हमारे प्राणों के साथ लिपटना। शरीर संबंधी तो नाते रिश्तेदारों से लेकर भवन निर्माण, प्रेस, खरीद फरोख्त आदि के सिलसिले में हमारे संपर्क में आने वाले ढेरों व्यक्ति हैं। वे भी अपने संपर्क का गौरव अनुभव करते हैं। किन्तु हमारे अन्तःकरण का हमारी आकांक्षाओं एवं प्रवृत्तियों का न तो उन्हें परिचय ही है और न उस नाते, सम्बन्ध सहयोग ही है। उसी श्रेणी में उन्हें भी गिना जायेगा जिन्होंने कभी गुरु दीक्षा अथवा भेंट वार्तालाप के नाते सामयिक संपर्क बनाया था। इस बहिरंग शरीरगत संपर्क को भी झुठलाया नहीं जा सकता। उनके स्नेह, सद्भाव के लिए हमारे मन में स्वभावतः जीवन भर कृतज्ञता एवं आभार के भाव बने रहेंगे। किन्तु जो हमारे अन्तःकरण को भी छू सके हैं, छू सकते हैं, उनकी तलाश हमें सदा से रही है, रहेगी भी।

यदि किसी को हमारा वास्तविक परिचय प्राप्त करना हो तो नवयुग के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में ही हमारे समूचे जीवन का-समूचे व्यक्तिगत का मूल्यांकन करना चाहिए। हमारे रोम रोम में चेतना के रूप में बसा हुआ भगवान यह रास रचाए हुए हैं। पन्द्रह वर्ष की आयु में अपना जीवन जिस भगवान-जिस सद्गुरु को समर्पित किया था, वह शरीर सत्ता नहीं, वरन् युग चेतना की ज्वलन्त ज्वाला ही कही जा सकती है। उसके प्रभाव से हम जो कुछ भी सोचते और करते हैं उसे असंदिग्ध रूप से भजन कहा जा सकता है। यह भजन मानवी आदर्शों को पुनर्जीवित करने का विविध प्रयोगों के रूप में समझा जा सकता है। हमारी दैनिक उपासना भी इसी का एक अंग है।

उसके माध्यम से हम अपनी सामर्थ्य पर-अन्तरात्मा पर प्रखरता की धार रखते हैं, इसलिए उसे साधना भर कहा जायेगा। साध्य तो वह भगवान है, जिसकी झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म, सूक्ष्म शरीर में सद्ज्ञान एवं कारण शरीर में सद्भाव के रूप में भासित होती है। एक वाक्य में कहना हो तो हमारा प्राण स्पंदन और मिशन, एक ही कहा जा सकता है। इस तथ्य के आधार पर जिनकी मिशन की विचारधारा के प्रति जितनी निष्ठा और तत्परता है, उन्हें हम अपने प्राण जीवन का उतना ही घना सम्बन्धी मानते हैं। भले ही वे व्यक्तिगत रूप से हमारे शरीरगत संपर्क में कभी न आये हों, हमारी आशा भरी दृष्टि उन्हीं पर जा टिकती है।
   

 उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर हम युग निर्माण परिवार का पुनर्गठन कर रहे हैं। हम हर माह आत्ममंथन से जो कुछ उपार्जित करते हैं, उसे भाव भरे नवनीत की तरह स्वजनों को बाँटते हैं। यह वितरण नियमित रूप से मिशन की पत्रिकाओं के माध्यम से किया जाता है। जिन्हें यह रुचिकर लगता है, जो उत्सुकतापूर्वक उसकी प्रतीक्षा करते हैं, उन्हें हम अपने सुख दुःख-दर्द सम्वेदना का साथी-सहभागी मानते हैं। आज वह चेतना जहाँ उत्सुकता के रूप में है, वहाँ कल तत्परता भी उत्पन्न होकर रहेगी, ऐसी आशा करना निरर्थक नहीं-तथ्यपूर्ण है। आज जो हमारी सम्वेदनाओं में सम्मिलित हैं कल वे हमारे कदम से कदम और कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने का भी साहस करेंगे, इस आशा का दीपक हम मरण के दिन तक सँजोये ही रहेंगे।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५१

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