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Friday 16, May 2025

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लातविया के रीगा में संपन्न हुआ भव्य गायत्री यज्ञ

लातविया के रीगा में संपन्न हुआ भव्य गायत्री यज्ञ

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हर क्षण में छुपा है सफलता का स्वर्ण अवसर

हर क्षण में छुपा है सफलता का स्वर्ण अवसर

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दुष्कर्मों का प्रतिफल भोगना पड़ता है, Dushkarmon Ka Fal Bhogna Pdata Hai

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श्रद्धावान ही आगे बढ़ते हैं

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आहार और उसकी शुद्धि | Aahar Aur Uski Shuddh

आहार और उसकी शुद्धि | Aahar Aur Uski Shuddh

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सरलता और सान्त्वना चाहिए | Sarlata Aur Saantwana Chahiye

सरलता और सान्त्वना चाहिए | Sarlata Aur Saantwana Chahiye

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गायत्री का अर्थ | Gayatri Ka Arth

गायत्री का अर्थ | Gayatri Ka Arth

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व्यावहारिक जीवन में हमे अपने पर काबू पाना हैं | Vyvharik Jivan Mei Kabu Pana Hai

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हम अपनी ही सेवा क्यों न करें? | अपना सुधार-संसार की सबसे बड़ी सेवा | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

हम अपनी ही सेवा क्यों न करें? | अपना सुधार-संसार की सबसे बड़ी सेवा | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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गुरुजी माताजी
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 16 May 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: यज्ञ के साथ साक्षरता का संकल्प | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



प्रातः काल सूर्योदय के समय पर भगवान का स्मरण करना इस समय बहुत आवश्यक है। सूर्योदय तो खास बात है, चाहे सुबह कर लेंगे, दोपहर को कर लेंगे, शाम को कर लेंगे, नहीं भाई साहब, बिल्कुल सुबह ही सूर्य निकलते समय पर ही करना चाहिए।

चाहे आप नहाए हों, चाहे नहीं नहाए हों, सूर्योदय का समय चूँकि एक ही समय पर, एक ही तरीके से, एक ही समय में काम किए जाने की शक्ति सौ गुनी हो जाती है, इसलिए प्रातः काल का जप आवश्यक बताया गया है।

इसे आप घरों में, घर-घर में जाकर के हर आदमी से मिलकर उसके बारे में कहिए कि प्रातः काल का जप हर आदमी करना शुरू करें, चाहे 10 मिनट का ही क्यों न हो।

इसके सिवाय एक और बात है, जो हमारे बेस को गिराने वाली कुछ चीजें हैं, उनसे अपने आप को उबारने की कोशिश करनी चाहिए।

शिक्षा की कमी इस तरह की है कि आदमी जानवर के बराबर हो जाता है। न उसके ज्ञान के कपाट खुलते हैं, न उसको नई जानकारियाँ मिलती हैं, न समाज में क्या हो रहा है, यह पता चलता है।

न पीछे वो किस तरह आगे बढ़ रहे हैं, न यह जानकारियाँ मिलती हैं। वह एक तरीके से कुएं का मेंढक बन के रहता है।

इसलिए आपको शिक्षा के बारे में प्रौढ़ शिक्षा आंदोलन को इन्हीं यज्ञों के साथ में जोड़कर प्रारंभ कर देना चाहिए।

आप लोगों में से जो कोई पढ़ा-लिखा आदमी हो, उसको यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि हम पाँच बिना पढ़े को जरूर पढ़ाएंगे।

चाहे आप उसके घर जाइए, चाहे उसको अपने घर बुलाइए, चाहे एक महीना पढ़ाइए, चाहे छह महीने पढ़ाइए, दो वर्ष में पढ़ाइए, लेकिन पाँच बच्चों का ये नियम दे के जाइए कि हम पाँच बच्चों को पढ़ाएंगे।

यही बात कुटुंब में, परिवार में होने वाले यज्ञों की बात है। वो पढ़ा नहीं सकते तो पढ़ तो सकते हैं।

घरों में बुजुर्ग, महिलाएं, जवान, ढेरों ऐसे होते हैं जो बिना पढ़े होते हैं। तो उनको पढ़ाने का एक आंदोलन अभी इसी यज्ञ योजना के साथ में हमें शामिल करना है।

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अखण्ड-ज्योति से



जिसे तुम अच्छा मानते हो, यदि तुम उसे अपने आचरण में नहीं लाते तो यह तुम्हारी कायरता है। हो सकता है कि भय तुम्हें ऐसा नहीं करने देता हो, लेकिन इससे तुम्हारा न तो चरित्र ऊंचा उठेगा और न तुम्हें गौरव मिलेगा। मन में उठने वाले अच्छे विचारों को दबाकर तुम बार बार जो आत्म हत्या कर रहे हो आखिर उससे तुमने किस लाभ का अन्दाजा लगाया है?

 शान्ति और तृप्ति, आचारवान व्यक्ति को ही प्राप्ति होती हैं। जो मन में है वही वाणी और कर्म में होने पर जैसी शान्ति मिलती है उसका एक अंश भी मन वाणी और कर्म में अन्तर रखने वाले व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता। बल्कि ऐसा व्यक्ति घुट-घुट कर मरता है और दिन रात अशान्ति के ही चक्कर में पड़ा रहता है।

 घुट-घुट कर लाख वर्ष जीने की अपेक्षा उस एक दिन का जीना अधिक श्रेयस्कर है जिसमें शान्ति है, तृप्ति है। परन्तु भय का भूत मनुष्य को न जिन्दा ही रहने देता है और न मरने ही देता है। भय की उत्पत्ति का कारण आशक्ति है, मोह है। शरीर का मोह, धन का मोह आदमी को कहीं का नहीं रहने देता, शरीर का चाहे जितना मोह करो उसे किसी न किसी दिन मिट्टी में मिलना ही है, अमर हो ही नहीं सकता तब फिर उसे आत्मोन्नति के साधन के लिए उपयोग में न लाकर जो लोग उसका भार ढोकर चलते रहना पसन्द करते हैं, पसन्द करते ही नहीं बल्कि चलते रहते हैं वे आत्मा को अन्धेरे की ओर ही गिराते हैं।

 धन और शरीर ये जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, जीवन का लक्ष्य तो है आत्मा की उन्नति, आत्मा की प्राप्ति। इसलिए शरीर और धन का जो लोग इसके लिए उपयोग नहीं करते वे प्राप्त साधनों का दुरुपयोग न करके अपने भावी जीवन में किसी महान संकट के लिए निमन्त्रण देते हैं।

जीवन और अच्छे जीवन के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए अपने आपकी खोज खबर रखता रहे। आत्म निरीक्षण करता रहे और फिर चतुर जर्राह की तरह जहाँ जहाँ आत्मोन्नति की बाधक शक्तियाँ और वृत्तियाँ काम कर रही हों। उनकी चीरफाड़ करता और उन्हें हटाता रहे। आत्म निरीक्षण और आत्म शुद्धि की वृत्ति को स्वभाव में बिना लाये कभी भी किसी व्यक्ति का चरित्र महान नहीं हुआ है। बल्कि चरित्र निर्माण के ये दोनों ही महान साधन हैं।

 मानव स्वभावतः कमजोर नहीं है पर आस-पास का वातावरण उसे कमजोर बना देता है। सामाजिक परिस्थितियाँ-कायदे कानून मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकते हैं और सामाजिक प्राणि होने के कारण मनुष्य समाज द्वारा परित्यक्त किये जाने के भय से आतंकित रहता है, इसलिए अन्दर गन्दगी बढ़ती रहती है। लेकिन जिसे अपने लक्ष्य का ज्ञान रहता है और अटूट श्रद्धा के साथ लक्ष्य पर पहुँचने की दृढ़ता को कायम रखता है उसे समाज के दुर्विधानों की बेड़ियां जकड़े नहीं रहती। वह इन्हें तोड़ता फोड़ता आगे बढ़ता है और स्वयं अपना ही उद्धार नहीं करता बल्कि समाज का भी पुनस्संस्कार कर डालता है। ऐसा व्यक्ति महान होता है।

 ज्ञान को आचरण में बदल कर मनुष्य महान बनता है। इस महानता का सबसे बड़ा गुण है अभयदान । इसलिए जो चरित्रवान होते हैं वे निर्भीक होते हैं। वे आत्मा को अजर अमर मानते हैं और दुःख सुख को मानसिक विकार। जिन्हें आत्मा की प्राप्ति नहीं होती वे ही इन विकारों में फँसे रहते हैं इसलिए सम्पन्न होने पर भी सुखी नहीं रहते। लेकिन जिन्होंने विकारों के तत्व को समझ लिया है और जिन्हें आत्मा की पूर्णता का परिचय मिल गया है। ऐसे आत्माराम पुरुष सिर्फ अपने को ही नहीं तारते बल्कि वे संसार के तरण तारण हो जाते हैं। 

 चरित्र, मानव-आत्मा को पूर्ण विकसित करता है इसलिए आरंभ में भले ही किन्हीं कठिनाइयों का सामना करना पड़े परन्तु अन्त में वे कठिनाइयाँ ही जीवन को उज्ज्वल करने वाली दिखने लगती हैं। इन कठिनाइयों को पार कर मानव तपःपूत हो जाता है। आत्मा निखर उठती है। तब अभाव नाम के किसी भी तत्व का उसके लिए कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इसलिए चरित्र की ही उपासना करनी चाहिए और चरित्रवान बनने का ही संकल्प । इस अकेले को लिया तो सब कुछ पा लिया समझो।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति 1948 सितम्बर पृष्ठ 3

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