Friday 16, May 2025
कृष्ण पक्ष पंचमी, जेष्ठ 2025
पंचांग 17/05/2025 • May 17, 2025
ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पंचमी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), बैशाख | पंचमी | नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा 05:44 PM तक उपरांत उत्तराषाढ़ा | साध्य योग 07:08 AM तक, उसके बाद शुभ योग | करण कौलव 05:39 PM तक, बाद तैतिल |
मई 17 शनिवार को राहु 08:50 AM से 10:32 AM तक है | 12:03 AM तक चन्द्रमा धनु उपरांत मकर राशि पर संचार करेगा |
सूर्योदय 5:27 AM सूर्यास्त 7:00 PM चन्द्रोदय 11:25 PM चन्द्रास्त 9:41 AM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु ग्रीष्म
- विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
- शक सम्वत - 1947, विश्वावसु
- पूर्णिमांत - ज्येष्ठ
- अमांत - बैशाख
तिथि
- कृष्ण पक्ष पंचमी [ वृद्धि तिथि ]
- May 17 05:13 AM – May 18 05:58 AM
नक्षत्र
- पूर्वाषाढ़ा - May 16 04:07 PM – May 17 05:44 PM
- उत्तराषाढ़ा - May 17 05:44 PM – May 18 06:52 PM
SHRAVAN
दिव्य चेतना का हस्तक्षेप | Divya Chetna Ka Hastkhesp
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संगठन करो उसी से तुम्हारी रक्षा होगी । गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
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अमृतवाणी:- गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करें | Guru Ki Aagya Shirodharya Karen Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 17 May 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: खर्चीली शादी हमें दरिद्र बनाती हैं | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। यह तो हमने आपको पच्चीसियों बार कहा है और कहते रहेंगे हमेशा।
हमारा देश जो तबाह हुआ है, जो गरीब हुआ है, जो बर्बाद हुआ है, इसमें ब्याह-शादियों वाली बात ऐसी है कि इसे कोई खर्चीला बनाए रखा गया तो आप समझिए कि हमारे आय बढ़ाने का चाहे जितना आप प्रयास करें, तो भी हम गरीब के गरीब रहेंगे।
इसके लिए क्या करना चाहिए? आप सब लोगों में से यह प्रतिज्ञाएं करनी चाहिए। अभिभावकों को यह प्रतिज्ञाएं करनी चाहिए कि हम अपने बच्चे और बच्चियों के ब्याह-शादियों में धूमधाम नहीं करेंगे।
एक, दिखावा नहीं करेंगे। दो, दहेज नहीं लेंगे- देंगे। तीन, और आभूषण (जेवर) नहीं चढ़ाएंगे।
यह आभूषण और दहेज का कितना बड़ा समन्वय है, आपको मालूम नहीं है। लड़के वाला मांगता है दहेज, क्यों मांगता है? कि उससे आभूषण (जेवर) मांगा जाएगा।
लड़की वाला मांगता है आभूषण, लड़के वाला मांगता है दहेज। यह दोनों ही बातें मरेगी तो एक साथ ही मरेगी, और जिंदा रहेंगी तो दोनों ही बातें जिंदा रहेंगी।
आप अकेले दहेज को बंद करना चाहें और यह चाहें कि आभूषण हमारी लड़की पर जरूर चढ़ाया जाए, तो बेचारा वो बेटे वाला कहां से लाएगा आभूषण के लिए?
यहाँ सोने का कितना महंगा भाव है, 4000 रुपये का 10 ग्राम बिक रहा है। इसमें अगर मान लें कोई आदमी 50 ग्राम का भी आभूषण बनवाना चाहे, तो उसे 20 हजार रुपये चाहिए।
यह कहां से आएगा? अगर वो दहेज के लिए दहेज मांगता है, तो क्या बेजा करता है?
दहेज को बंद करने की बात करनी चाहिए, तो आभूषण को भी बंद करने वाली बात करनी चाहिए।
चाहे आपको ब्याह-शादियाँ इस तरीके से करानी पड़ी कि जिसमें ना दहेज लिया जाए, न आभूषण लिया जाए।
अखण्ड-ज्योति से
क्या तुम सच्चे सेवक बनना चाहते हो? सच्ची समाज सेवा करने की इच्छा मन में है? तो आओ, आज हम कुछ ऐसे सच्चे सेवकों का परिचय आपसे करायें, जो हमारे लिए मार्ग दर्शक हो सकते है। संध्या समय पश्चिम आकाश में अस्त होने वाले सूर्य को देखो। बारह बारह घंटों तक पृथ्वी को प्रकाश देने के पश्चात् भी वह निश्चित होकर विश्राम लेने जाना नहीं चाहते हैं।
मैं चला जाऊँगा फिर सृष्टि को प्रकाश कौन देगा? उसे अन्धकार से कौन उभारेगा? इस चिन्ता में देखो उनका मुख मंडल म्लान हो गया है। सच्चे सेवक की सेवा की भूख कभी शांत नहीं होती। चन्द्र के पास स्वयं का प्रकाश नहीं है। फिर भी वह दूसरे का तेज उधार लेकर अपने को आलोकित करता है। सच्चे सेवक को साधन का अभाव कभी नहीं खटकता।
हमारी शक्ति बहुत थोड़ी है, इसलिए हमसे क्या सेवा हो सकेगी। क्या तुम ऐसा सोचते हो? नहीं, नहीं, ऐसा कभी मत सोचो। आकाश के तारों की ओर देखो। ब्रह्माण्ड की तुलना में कितने अल्प हैं, फिर भी यथाशक्ति सेवा करने- भूमण्डल को प्रकाशित करने - लाखों की संख्या में प्रकट होते है और अमावस्या की अँधेरी रात में अनेकों का पथ -प्रदर्शन करते हैं।
थक कर, ऊब कर सेवा क्षेत्र का त्याग करने का विचार कर रहे हो? तुम्हारे सामने बहने वाली इस सरिता को देखो। उद्गम से सागर तक संगम होने तक कभी मार्ग में वह रुकती है? ‘सतत कार्यशीलता’ यही उसका मूल मंत्र है। मार्ग में आने वाले विघ्नों से वह डरती नहीं तो तुम क्यों साधारण संकटों एवं अवरोधों से घबराते हो? वह नदी कभी ऊँच-नीच का भाव जानती ही नहीं। मनुष्य मात्र ही नहीं, पशु-पक्षी या वनस्पति सबकी निरपेक्ष सेवा करना ही वह अपना धर्म समझती है। सेवक के लिए कौन ऊँच और कौन नीच?
इन अज्ञानी लोगों की क्या सेवा करें? इनका सुधरना असम्भव है ऐसा मत सोचो। देखो कीचड़ में यह कैसा सुन्दर कमल खिला है? तुम भी अज्ञान के कीचड़ में कमल के समान खिलकर कीचड़ की सुरभि पैदा करो, सच्चे सेवक की यही कसौटी है।
स्वामी विवेकानन्द
अखण्ड ज्योति 1969 अप्रैल पृष्ठ 1
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