Thursday 17, July 2025
अमृतवाणी:- आदमी की बढ़ती उद्दंडता और खतरा | Aadmi Ki Badhti Uddanta Aur Khatra पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
महत्वाकाँक्षायें अनियन्त्रित न होने पावें | Pt Shriram Sharma Acharya, Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 17 July 2025
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 17July 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! शांतिकुंज दर्शन 17July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: तप का सार है सादगी पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हमने एक एक पाई को इस तरीके से खर्च किया है एक पैसा हीरे का होता है, मोती का होता है और जवाहरात का होता है जवाहरात का होता है हमने बहुत किफाईश्यारी की है बहुत किफाईश्यारी की है कई बार लोगों ने कहा आपको सोलह घंटे काम करना पड़ता है दिमागी काम करना पड़ता है आप की खुराक कुछ होनी चाहिए खुराक कुछ होनी चाहिए मैंने कहा सब भगवान के काम करते हैं तो भगवान खुराक देगा ही किसी ने माता जी को बता दिया कि माता जी इनको आचार्य जी को एक गिलास नारंगी का रस दिया करो जाने कैसे समझ में आ गया? एक दिन ले आई कई बार तो मैंने भी मना कर दिया फिर मैंने भी मन मे आ गया देखें कि शायद फायदा हो जाए मैं ज्यादा काम कर सके ऐसी मेरी अक्ल ने गवाही दी गवाही दी मैंने पहला घुट पिया और बेटे मुझे क्या हो गई उल्टी हो गई उल्टी हो गई मेरे ईमान ने कहा यह कैसे हो सकता है इस गायत्री तपोभूमि में हम इतने सारे कार्यकर्ता रहते हैं जो अपने घर छोड़ करके आये हैं जिन्होंने अपने बच्चों को छोड़ा है जो रूखी रोटी खाते हैं उनको रूखी रोटी खाते रहे और तू संतरे का रस पिएगा यह कैसे होगा बेटे मुझे उल्टी हो गई उल्टी हो गई और दोबारा मैंने गले में उंगली डाल करके फिर उल्टी करने की कोशिश की कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारी गलें में कोई और उसका नारंगी का अंश रह गया हो सारे जब मुझे विश्वास हो गया कि उल्टी पूरी तरीके से हो गई तो मैंने एक दिन का उपवास किया और एक घूँट पी करके पिया फिर नहीं कहँूगा तो क्या बात थी किसी ने दे दिया था दिया नहीं था बेटा हमने पैसे से ही लिया था अपने ही पैसे से नारंगी से खरीदी थी तो आपने क्यों नहीं खाया बेटे हम नहीं खा सकते क्योंकि जिस समाज में हम रहते हैं जिस देश में हम रहते हैं जिस धर्म और संस्कृति में हम रहते हैं वह सब हमारे भाई हैं गाँधी जी की स्त्री कस्तूरबा गाँधी जब किसी गाँव में गई सफाई की शिक्षा देने के लिए तो उस गाँव वालों ने यह कहा कि सफाई की नसीहत देने हमको आई हैं पर यह बताइए धोती एक ही है हमारे पास इसको आधी को हम धो लेते है और आधी को हम पहन लेते हैं फिर आधी को धो लेते हैं आधी को हम पहन लेते हैं बताइए हम कैसे कर सकते हैं सफाई धुलाई गाँधी जी की स्त्री ने कस्तूरबा ने गाँधी जी से बताया जिस देश में हम लोग रहते हैं इतने गरीब लोग रहते हैं गाँधीजी की आँखों में से आँसू आ गए उन्होंने उसी दिन से आधी धोती पहनना और आधी को ओढ़ना शुरू कर दिया उन्होंने कहा जिस प्रकार हमारे लाखों-करोड़ों व्यक्तियों को जब तक हम खुशहाल नहीं बना सकते जब तक हम पैसे वाले नहीं बना सकते इस लायक नहीं बना सकते तो हम को हक नहीं है कि हम अच्छी जिंदगी जीये और अच्छी मौज करें मजाक करें विलासिता करें बेटे तपश्चार्य यहाँ से प्रारंभ होतीै है |
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
मानव जीवन एक प्रकार से देवत्व प्राप्ति का अवसर है। इस अवसर का सदुपयोग कर मानव से महामानव, नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम तक बना जा सकता है। मानव शरीर की संरचना भगवान्ï की श्रेष्ठïतमï कृति है। इस सृष्टि में मनुष्य से बढक़र अन्य कोई प्राणी उसने इतना अद्भुत एवं प्रतिभावान् नहीं बनाया। इस मानव जीवन में ही शिक्षा, कला, विज्ञान, आवास के सुंदर-सुंदर भवन, जल, थल एवं नभ में विचरण का अवसर प्राप्त हुआ है। नाना प्रकार के रंग-बिरंगे सपनों को साकार करने का अवसर इसी जीवन में उपलब्ध है। यह सुविधा तो देवयोनि में भी संभव नहीं है।
पूर्णता की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय आदर्श एवं पवित्रतम दैवी जीवन यापन किया जाय तथा अपनी उपार्जित शक्ति-सम्पदा का न्यूनतम अपने लिए तथा अधिकतम दूसरों के लिए खर्च किया जाय, इसी को मानव जीवन का श्रेष्ठïतम उपयोग माना गया है। राजा का बड़ा पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाता है, किन्तु उसका कत्र्तव्य है कि वह अपने अन्य छोटे भाई-बहिनों की देखरेख व सुरक्षा का समुचित प्रबंध करे। परम पिता का सर्वश्रेष्ठï युवराज होने के नाते मनुष्य का भी उत्तरदायित्व यही है कि अपने से अविकसित, पिछड़े प्राणियों को, जो हमारे छोटे भाई-बहिन के समान हैं, उनको विकसित करने, आगे बढ़ाने में उदारतापूर्वक सहयोग करे। उनको सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करे।
शरीर और मन जीवन रूपी रथ के दो पहियों के समान हैं। इन दोनों का अपना स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं है। यह अंत:करण की आस्था एवं आकांक्षा के अनुरूप दोनों स्वामिभक्त सेवक के समान सदैव उसकी आज्ञा का पालन मात्र करते रहते हैं। शरीर द्वारा क्रिया मन द्वारा विचारणा उसी ओर घूमती एवं चलती है, जिधर अंतरात्मा की भावना प्रेरित करती है। भावनाएँ ही श्रद्धा, आस्था, निष्ठा एवं मान्यता आदि नामों से जानी जाती हैं। इन्हीं सबके समन्वय से आकांक्षाएँ उभरती हैं और फिर उन्हीं के अनुरूप मन अपना तर्क, वितर्क, चिंतन एवं क्रिया प्रणाली निर्धारित करता है। तदुपरान्त गुलाम की तरह शारीरिक हलचलें क्रिया रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। ऐसे में शरीर और मन दोनों को निर्दोष ही माना जाएगा। भला या बुरा, उत्थान या पतन जिस भी मार्ग में बढ़ जाता है, उसका सारा दारोमदार अंत:करण पर ही जाता है।
आत्मज्ञान, आत्म बोध का अभिप्राय अंतराल के गहन स्तर में यह अनुभूति एवं विश्वास उत्पन्न करते रहना कि हम सत्, चित्, आनंद स्वरूप परमात्मा के ही अभिन्न अंग हैं। हमें यह भावना भी उत्पन्न करनी चाहिए कि संकीर्ण स्वार्थपरता त्याज्य है। व्यक्तिवादी आपाधापी अंततोगत्वा पतन के ही मार्ग में धकेलती है। अस्तु व्यक्ति से उठकर समष्टि पर ध्यान दिया जाना चाहिए। भगवान् बुद्ध को जब आत्मबोध प्राप्त हुआ था, तब वे संकीर्ण स्वार्थ युक्त राजपाट को त्यागकर समष्टिïगत हित साधना में लग गए थे। स्वयं ही नहीं अपने अबोध बालक एवं पत्नी को भी लोकहित के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित किया था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति की क्रिया पद्धति में आदर्शवादिता ही आदर्शवादिता उभरती, उछलती रहती है। ऐसे लोग स्वयं तो कृतकृत्य होते ही हैं, समाज के लाखों-करोड़ों सामान्यजनों के लिए मार्गदर्शन का भी कार्य कर जाते हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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