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Saturday 18, October 2025

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 धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ

धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ

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धनतेरस का आध्यात्मिक संदेश | समृद्धि से पहले संस्कार जरूरी |

धनतेरस का आध्यात्मिक संदेश | समृद्धि से पहले संस्कार जरूरी |

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क्या फिर से होगा भारतीय सस्कृति का सूर्योदय ? | Kya Phir Se Hoga Bharitya Sanskriti Ka Suryoday

क्या फिर से होगा भारतीय सस्कृति का सूर्योदय ? | Kya Phir Se Hoga Bharitya Sanskriti Ka Suryoday

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सूर्य गायत्री मंत्र, सूर्य- प्राण-शक्ति | Surya Gayatri Mantra | Lord Surya Mantra Chanting

सूर्य गायत्री मंत्र, सूर्य- प्राण-शक्ति | Surya Gayatri Mantra | Lord Surya Mantra Chanting

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 18 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी:- उपासना अधूरी क्यों रह जाती है पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



मित्रों, उपासना करने से पहले उपासना के सिद्धांत और उपासना के स्वरूप को हमको जानना चाहिए।
उपासना के सिद्धांत और उपासना का स्वरूप समझने की मैंने कोशिश की, और इस मायने में कोशिश की ताकि मेरी उपासना सार्थक और सफल होती चली गई।
इस तरीके से मैंने कोशिश की।
उपासना शब्द का क्या अर्थ होता है? शब्द का क्या अर्थ होता है?
उपासना का अर्थ होता है — उप मीन्स पास, आसन मीन्स बैठ जाना।
पास बैठ जाना, पास बैठ जाना।
पास बैठ जाने का स्वरूप क्या हो सकता है?
पास बैठने का स्वरूप बेटे, यह है — हम किसी सामर्थ्यवान के जब पास बैठते हैं, उनकी विशेषताएँ हमारे भीतर आना शुरू हो जाती हैं।
जब हम सूरज की रोशनी में बैठते हैं पास में, तो सूरज की गर्मी हमारे भीतर आना शुरू कर देती है।
आग के नज़दीक जब हम बैठते हैं, आग से हमारी ठंडक दूर होने लगती है।
आग से हमारे गीले कपड़े सूखने लगते हैं।
आग के पास बैठने का मतलब यह है — आग की गर्मी को अपने जीवन में ग्रहण करें।
बर्फ के यदि हम पास बैठते हैं, बर्फखाने में जब चले जाते हैं, और बर्फ को हम हाथ से छूते हैं और हाथ में पकड़ते हैं, तो बर्फ से हमारा हाथ ठंडा हो जाता है।
हमारा हाथ ठंडा हो जाता है, तो हम ठंडे हाथ से ठंडक अनुभव करते हैं।
बर्फ के पास जाकर के...
चंदन के बारे में मैंने सुना है — चंदन के पास बैठ करके, चंदन के पास जब बैठ जाते हैं, तो उनके पास झाड़ियाँ और झंखाड़ जो उगे होते हैं, वो सारे के सारे चंदन के पास उगे हुए झाड़ी और झंखाड़ उसी तरह के हो जाते हैं।
पुल के नीचे जो मिट्टी पड़ी होती है, पुल जब मिट्टी पर गिरते रहते हैं, मिट्टी उसकी सुगंधित हो जाती है।
और जब पानी बरसता है, तो मिट्टी गीली हो जाती है।
क्या मतलब है?
पास बैठने की बात मैं कहता हूँ — उपासना क्या होती है?
उपासना वह हो सकती है जिसमें कि जिस सामर्थ्यवान वस्तु के पास हम ज़्यादा देर बैठे, तो उसकी विशेषताएँ हमारे जीवन में आएं।
उसकी विशेषताएँ हमारे जीवन में आएं।
उसकी विशेषताओं को धारण करने का मतलब "पास बैठना" होता है।
और उसकी विशेषताएँ हमारे भीतर ना आएँ, तब बेटे फिर पास बैठना नहीं हो सकता।
उपासना नहीं हो सकती।
भगवान की विशेषताएँ, भगवान की महानताएँ अगर हमारे जीवन में आएं, तो समझना चाहिए — उपासना आपकी सार्थक हो गई और उपासना आपकी सफल हो गई।
अगर भगवान की कोई विशेषता आपके भीतर नहीं आ रही है, कोई विशेषता आपके पास नहीं आ रही है, तो हम यह कहेंगे —
आप भगवान के पास बैठने की कोशिश भले करते हों, तो आप वास्तव में भगवान के पास बैठ नहीं सकेंगे।
अपने पास भगवान को बिठाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि जैसे आप हैं वैसा बन जाए भगवान।
"हाँ महाराज जी, हम तो यही कोशिश कर रहे थे।"
"नहीं बेटे, ऐसा नहीं हो सकता।"
नाला... नाला यह कोशिश नहीं करता कि नदी हमारे जैसी हो जाए।
नाला यह कोशिश करता है... नाला यह कोशिश करता कि पास बैठने के बाद, हम जैसे भी जमते हैं, तो हैं, लेकिन हम नदी जैसे हो जाएँ।
नदी जैसे बनने की कोशिश करता है।
बेटे, तू क्या कह रहा था?"
"मैं तो यह कह रहा था कि जैसा मैं गंदा हूँ, वैसा भगवान हो जाए।"
"बेटे, भगवान वैसा गंदा नहीं हो सकता।"
हमारी मर्जी जैसी है, वही मर्जी भगवान की हो जाएगी?
बेटे, यह नहीं है। यह गलती है तेरी।

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अखण्ड-ज्योति से



 मानव व सूर्य के आदि काल से ही महान् भावनात्मक संबंध रहे हैं। वैदिक वाङ्मय सूर्य के माहात्म्य, उनकी विश्व संचालन में चेतनात्मक भूमिका तथा सूर्योपासना के लाभों के विवरणों से भरा पड़ा है। सूर्य मानव के लिए प्राणदाता, जीवन रक्षक व सांस्कृतिक विकास का परिचायक है।

संसार के हर तत्त्व की तरह सूर्य तत्त्व भी त्रिआयामी है। आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक ये उनके तीन आयाम हैं। वैज्ञानिकों  ने सूर्य देव के भौतिक रूप से सम्पर्क कर प्रकाश, ऊर्जा एवं काल ज्ञान प्राप्त किया है। प्राचीन भारतीय विचारक मात्र पदार्थ विद्या के जानकार नहीं होते थे, अपितु देवतत्त्व तथा आत्म-तत्त्व के भी मर्मज्ञ होते थे। उनकी अभिव्यक्ति-प्रणाली एक साथ त्रिस्तरीय थी। स्वाभाविक है कि इसके लिए अनुपम मेधा की आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति वे गायत्री मंत्र के द्वारा करते थे।

 सूर्य का दैविक पक्ष कहीं, अधिक सशक्त और रहस्यमय है। इसकी उपासना से पवित्रता, प्रखरता, वर्चस्, तेजस् प्राप्त होता है। ब्रह्माण्ड के रहस्य जाने जा सकते हैं। लोक-लोकान्तरों के रहस्यों को प्रत्यक्ष किया जा सकता है। सिर्फ भौतिक विज्ञान द्वारा तीनों स्तरों का ज्ञान संभव नहीं होगा। आजकल का विज्ञान आधिभौतिक स्वरूप की ही खोजबीन में जुटा है। आधिदैविक रहस्य को समझने के लिए उपकरण भी आधिदैविक चाहिए। यह भौतिकी से संभव नहीं है। देवता किसी की प्रतिकृति नहीं, वरन् विशिष्ट गुणों या शक्तियों के रूप में सूक्ष्म जगत् में क्रियाशील हैं।

सूर्य व सविता के स्वरूप को वेद स्पष्ट करता है। सविता अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के सूर्यों में समान विराजमान, प्रेरक दिव्य शक्ति रूप परब्रह्म परमात्मा। ऋषि के अनुसार ब्रह्माण्ड का प्रत्येक सूर्य सविता है। ऋग्वेद के ‘ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव, यद्भद्रं तन्न आसुव’ मन्त्र में श्रेष्ठ विचारों को सूर्य के माध्यम से आमंत्रित किया गया है। सविता अमृत तत्त्व का स्रोत है। आदित्य देवताओं का मधु है।

 आदित्य का आधिभौतिक रूप हैै परमाणु, आधिदैविक रूप है- ग्यारह प्रमुख देवगणों में से एक आदित्य देव तथा आध्यात्मिक रूप है चेतना। आदित्य-सविता सर्वव्यापी ब्रह्म है। सूर्य जगत् की आत्मा है। यहाँ सूर्य शब्द से विश्व को प्रकाशित करने का व आकाश में उगने वाले सूरज से किसी को अर्थ नहीं लगाना चाहिए और न यह भ्रम पालना चाहिए कि यही विश्वात्मा है। जिस प्रकार शरीर व आत्मा का संबंध है, कुछ इसी प्रकार का संबंध सूर्य और सविता में है।

 सविता वह चेतन सत्ता है, जिससे सूर्य प्रकाशित होता है, जो स्वयं चेतना है। वही प्राण चेतना के रूप में अन्यत्र प्रगट हो सकता है। सविता में ही यह गुण है। यजुर्वेद में कहा गया है ‘ब्रह्म सूर्य समं ज्योतिः’ अर्थात् ब्रह्म सूर्य ज्योति के समतुल्य है। जिस प्रकार भौतिक दिनमान संसार को प्रकाशित करता  रहता है, उसी प्रकार चैतन्य सविता उसकी ज्योति से जगत् का समस्त जड़ चेतन, कण-कण, अणु-अणु समान रूप से प्रकाशित हो रहा है। यह सविता प्रकाश ही ब्रह्म है।

मानवीय मन इतना चलायमान है कि उसे ईश्वर व एकाग्र करने के लिए दृश्य माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है। जिसने निराकार ब्रह्म को देखा नहीं, उसे साकार साधनों से काम चलाना पड़ता है। अतः जड़ सूर्य को ब्रह्म का मूर्तिमान् प्रकाश मानकर सूर्य की ध्यान साधना का विधान किया गया है। इतने पर भी अंतिम लक्ष्य वह सर्वव्यापी तेजोमय ब्रह्म की उपलब्धि ही होता है।

सूर्य को त्रयी विद्या कहा गया है तथा पापनाशक माना गया है। उसका भर्ग ब्रह्मतेज व पापनाशिनी शक्ति वाला है। इसलिए पापों से मुक्ति व सद्बुद्धि की याचना वाला गायत्री मंत्र सविता के ध्यान के साथ जपा जाता है। आद्य शंकराचार्य ने संध्या भाष्य में सूर्य माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा है कि चराचर जगत् के उत्पादक सूर्य की आराधना पापों का नाश करती है। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं। प्राचीनकाल में सर्वत्र सूर्योपासना के प्रमाण मिलते हैं। प्राचीनकाल की तरह वर्तमान में भी सूर्य की उपासना करके उनके त्रिस्तरीय आयामों से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए कहा गया है कि नित्य सूर्य का ध्यान करेंगे, अपनी प्रतिभा प्रखर करेंगे।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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