Friday 17, October 2025
अध्यात्म का लक्ष्य, आधार और प्रयोग, Adhyatm Ka Lakshya Aadhar Aur Prayog | Pt Shriram Sharma Acharya
बंधन से मुक्ति ही सच्चा सुख है | Bandhano Se Mukti Hi Saccha Sukh Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 17 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी:- उपासना की सरल परिभाषा क्या है पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
उपासना किसे कहते हैं, आप यहाँ से परिभाषा शुरू कीजिए।
भजन पीछे करना, भजन पीछे करना।
अगर ठहरिए, ठहरिए।
भजन करने से पहले आप...
भजन करने से पहले भजन की सारी और भजन का किस्सा सुन लीजिए।
पहले किस्सा सुनी जानी चाहिए, पहले करने के लिए व्याकुलता मत दिखाइए।
"हमें करना तो बताइये गुरुजी।"
"बेटा, हम करने को बता देंगे, तू भागा नहीं जाता, हम भागे नहीं जाते।"
लेकिन करने से पहले, करने से पहले उसकी फिलॉसफी समझ।
क्रिया से पहले फिलॉसफी समझानी पड़ती है।
ऑपरेशन इतनी जल्दी करने की जरूरत नहीं आपको।
"गुरुजी, मैं तो यह कह रहा था, आँख का ऑपरेशन करने में तो कुछ भी नहीं है।"
"बेटे, क्या क्या होता है आँख का ऑपरेशन करने में?"
एक आदमी को मैंने देखा है डॉक्टर को, यह मोतियाबिंद जो है, वो उसके आँख के ऊपर झिल्ली होती है।
इसकी यह वाल्व है, इसपे झिल्ली जो है, उसके नोक से पकड़ता है और झिल्ली को फाड़ के फेंक देता है — खट!
मोतियाबिंद अच्छा हो जाता है।
मैंने एक-दो दिन देखा था, आँख से कुछ भी नहीं है।
"गुरुजी, मैं एक घंटे में कर दूँगा।"
"कैसे करेगा?"
"यह देखिए, चिमटी और यह है उसका चाकू, खट से मोतियाबिंद का ऑपरेशन कर दूँगा, झिल्ली उखाड़ कर फेंक दूँगा, आँख अच्छी हो जाएगी।"
"बेटे, ऐसे मत करना गलती, नहीं तो मारा जाएगा बुरी तरीके से। इसकी फोड़ दी आँखें, फिर कहेगा — देखा नहीं?"
इसमें क्या करेगा?
अरे बेटे, क्रिया से पहले फिलॉसफी समझ।
आँख क्या हो सकती है? वाल्व क्या है? और यह मोतियाबिंद किसे कहते हैं? पानी क्यों आ जाता है?
और देख, अनाटॉमी पढ़ और फिजियोलॉजी पढ़।
"नहीं महाराज जी, इसमें तो बड़ा टाइम खराब होगा, मुझे तो जल्दी इस बात की है कि मैं करूँगा, करूँगा।"
"अरे, करूँगा से पहले फिलॉसफी समझ।"
"नहीं महाराज जी, मैं तो बिजली का फिटिंग करूँगा। और बिजली का आज से इंचार्ज हो गया।"
"तो क्या काम करेगा?"
"बिजली का फिटिंग कर दूँगा, और यह कर दूँगा, वह कर दूँगा।"
"और तुझे ये मालूम है, बिजली किसे कहते हैं? करंट किसे कहते हैं? और इसमें से निगेटिव क्या होता है, पॉजिटिव क्या होता है? यह तुझे मालूम है?"
"नहीं गुरुजी, ये तो नहीं मालूम है, फिटिंग करूँगा।"
"तो बेटे, फिटिंग करेगा तू?
तो अगर हम तुझे लोहे के उसमें, फिटिंग के बत्ती में लगा दें और तू तार खुले छोड़ देगा और उसमें से करंट आ जाएगा, और करंट आ करके सब में — लड़कियों से घूमता-घामता — सब जितने भी चार सौ आदमी बैठे हुए हैं, सबको करंट पकड़ लेगा और सब मारे जाएँगे।
"तो महाराज जी, ये मैं करूँ?"
"न, करना मत। अभी करने से पहले तू फिलॉसफी समझ।"
"करने से पहले फिलॉसफी समझ — कि यह बिजली क्या है, यह क्यों खर्च की जाती है, बिजली कहाँ से आती है, और बिजली में गलती होने से क्या परिणाम हो जाता है। यह जान ले, तब करना।"
"नहीं महाराज जी, मैं तो बहुत जल्दी करने वाला हूँ।"
"करे मत, समझ। करे मत — पहले समझ। पहले करे मत, पहले समझ। पहले समझता तो है नहीं — करूँगा, करूँगा, करूँगा, करूँगा, करूँगा... समझ पहले! समझने के पीछे करना।"
"जरा ठहर जा — पीछे करना।"
"नहीं, मुझे तो बहुत जल्दी करनी है, बहुत जल्दी करनी है, बहुत जल्दी करनी है।"
"समझता है नहीं, जानता है नहीं, पूछता है नहीं — बस करूँगा।"
अखण्ड-ज्योति से
शरीर को नित्य स्नान कराया जाता है, वस्त्र हम नित्य धोते हैं, कमरा नित्य बुहारी लगा कर साफ करते हैं। कारण यह कि एक बार की सफाई रोज काम नहीं दे सकती। मन को एक बार चिंतन−मनन− स्वाध्याय द्वारा साफ कर लिया तो सदा वह वैसा ही बना रहेगा, ऐसी आशा निरर्थक है।
अभी आकाश साफ है। उस पर कब आँधी, कुहासा धूलि−बादल छा जायेंगे प्रकृति कब कुपिता हो जाएगी कहा नहीं जा सकता। अन्तरात्मा पर निरन्तर छाते रहने वाले इन मलिन आवरणों की सफाई के लिये उपासना की नित्य निरन्तर आवश्यकता पड़ती है ईश्वरीय गुणों का समावेश अपने चिन्तन व्यवहार में इससे कम में हो ही नहीं सकता। आग के समीप बैठे बिना गर्मी आये कैसे?
अपने आपे को साधने, अनगढ़ से सुगढ़ बनाने हेतु सुसंस्कारिता की साधना की जाती है। यह तो पूर्वार्ध हुआ। इसका उत्तरार्ध है उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।
समाप्त
~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
-अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 4
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