Thursday 16, October 2025
अमृत सन्देश:- क्या सीमित साधनों में बड़ा कार्य संभव हैं ? Kya Simit Sadhno Mei Bda Karya Sambhav Hai
सर्वसमर्थ गायत्री माता | Sarv Samarth Gayatri Mata | Shantikunj Rishi Chintan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 16 October 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 16 October 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 16 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
उपासना में मन क्यों नहीं लगता
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
उपासना के बारे में मन ना लगने की शिकायत, समय न मिलने की शिकायत का सीधा मतलब अगर मुझसे पूछे तो मैं एक अर्थ बता देता हूँ — कि हमारा इस बात पर कोई विश्वास नहीं है।
हमारी अंतःचेतना कहती है — भजन करते तो हैं हम, पर यह हम ट्राई करते हैं।
ट्राई करते हैं, काहे की ट्राई करते हैं?
देखें, इसमें तुक्का मिलेगा कि नहीं मिलेगा।
हनुमान चालीसा पढ़ेंगे ग्यारह दिन — देखें ग्यारह दिन के बाद में लक्ष्मी आती है कि नहीं आती है।
देखते हैं हम, इम्तिहान लेते हैं।
लगे रात भर हनुमान चालीसा — देखेंगे नहीं, तो पाँच पैसे का जुआ खेल लिया।
हनुमान चालीसा खरीद कर लाए थे पाँच पैसे का — लग गया तो तीर, नहीं लगा तो तुक्का इधर-उधर फेंक देंगे।
बेटे, पैसा फेंकते हैं, हमारी कोई निष्ठा नहीं है। क्यों? तब क्यों नहीं है निष्ठा?
निष्ठा न होने का कारण सिर्फ एक है — एक है उसका।
जो लाभ, समुचित लाभ होना चाहिए था, वो मिल नहीं सका।
समुचित लाभ नहीं मिल सका। क्यों?
क्योंकि हमारी उपासना अपूर्ण है।
हमारी उपासना अपूर्ण है।
अपूर्ण इसीलिए है कि कोई हमको यह बताता हुआ चला गया है — कि भजन करने से सारे उद्देश्य पूरे हो जाते हैं।
कोई मूर्ख ये बताता चला गया है इनको।
कोई मूर्ख हमको यह बहकाता चला गया है — “राम नाम लेने से उद्धार हो सकता है”, और “राम नाम लेने से बेड़ा पार हो सकता है।”
राम नाम लेने से बेड़ा पार बन सकता है, लेकिन —
सहज राम को नाम है, कठिन राम को काम।
करत राम को काम, जब परत राम ते काम।
राम का नाम भी लेना चाहिए और राम का काम भी करना चाहिए।
राम का तो काम नहीं करते हैं, काम तो करते हैं रावण का। और नाम लेते हैं राम का।
ऐसे राम के नाम से कभी किसी का उद्धार नहीं हुआ, न भविष्य में होगा।
मैं यह कहता हूँ आपसे।
मैंने यह निवेदन किया —
हमारी उपासना की क्रिया-पद्धति, क्रिया-पद्धति, क्रिया-पद्धति,
जिसमें हमारे में चार चीजें समन्वित हुई हैं।
मैं और आपसे निवेदन करूँगा —
जब भगवान का भजन अथवा गायत्री मंत्र की उपासना से आप कुछ भी सही कीजिए,
आत्मिक उन्नति के लिए — अगर आपको वास्तव में, वास्तव में करना हो।
मखौल करनी हो, तो आपकी इच्छा की बात है।
अगर आपको मन समझाना हो, तो आपकी इच्छा की बात है।
कदाचित आपके मन में यह आवे — “हमको वस्तुतः कुछ आत्मिक प्रगति करनी है, और भगवान का अनुग्रह प्राप्त करना है, और अपनी जीवात्मा का विकास करना है।”
तो मैं आपसे फिर प्रार्थना करूँगा —
आप करें चाहे ना करें, पर इतना जान जरूर लें — चार आधार के बिना उपासना संपन्न नहीं हो सकती।
चार आधार को अपनाए बिना आत्मिक उन्नति संभव नहीं है।
कौन-कौन से चार?
चार बेटे, हमने बताए थे — साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा।
पहली उपासना, आपको मैं बताता हूँ — साधना।
साधना किसे कहते हैं?
साधना कहते हैं, बेटे, अपने आप को भगवान के अनुरूप साध लेना।
साध लेना किसको?
साध लेना अपने आप को।
तो साहब, हम तो ये समझ रहे थे कि भगवान को अपने अनुरूप साध लेना।
यह क्या? यह क्या गजब कर दिया!
हम तो यह समझ रहे थे —
देवी और संतोषी माता को हम इस तरह से बना दें कि हमारी ये सवारी के काम आ सके, और हमारी मर्जी के गुलाम चला करें।
अरे बेवकूफ! ऐसे मत करा करो।
सुन लेगी संतोषी माता — तेरे कान उखाड़ ले जाएगी।
और हनुमान को तो यह समझा कि हनुमान को तो ये करने वाले थे — कि हमारे बस में हो जाए हनुमान।
और जो कुछ भी, हनुमान को हुकुम दे चलने लगे।
और तू क्या बनना चाहता था? बॉस बनना चाहता था हनुमान का?
अरे महाराज जी, हनुमान को मैं खरीदना चाहता था। आह...
यह गलती मत करना।
हनुमान कभी आ गया — तो बस एक मारेगा, तेरी पूँछ से तेरा सारा कचूमर निकाल लेगा।
ऐसे मत करना गलती।
अखण्ड-ज्योति से
आत्मा−परमात्मा के निकट पहुँचने पर भौतिकी का ऊर्जा स्थानान्तरण वाला सिद्धान्त ही सार्थक होता है। गरम लोहे को ठण्डे के साथ बाँध देने पर गर्मी एक से दूसरे में जाती है और थोड़ी देर में तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाबों को यदि परस्पर सम्बद्ध कर दिया जाय तो अधिक पानी वाले तालाब का जल दूसरे कम पानी वाले तालाब में पहुँचकर दोनों का स्तर समान कर देता है। उपासना के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से सम्बन्धित करने का प्रयास किया जाता है।
यों तो वह हर समय, हर एक के पास, हर स्थिति में कोई भी काम करते समय बना रहता है। किन्तु सामान्य व्यक्ति उसके सान्निध्य की अनुभूति नहीं कर पाते। यदि मनुष्य अपने हर काम को परमात्मा को सौंप दे, हर काम उसी को जान समझ कर करे और हर क्रिया को उपासना जैसी श्रद्धा व आस्था से करे तो मनुष्य के साधारण नित्य नैमित्तिक कार्य भी ईश्वरोपासना के रूप में बदल जाये व वैसी ही शाँति–सन्तोष–आनन्द के पुण्यफल देने लगे।
ऋषियों और सन्त भक्तों के जीवन इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। उन्होंने अपार आत्म−शान्ति पाई, अपने आशीर्वाद और वरदान से असंख्यों के भौतिक कष्ट मिटाये, अन्धकार में भटकतों को प्रकाश दिया और उन दिव्य विभूतियों के अधिपति बने जिन्हें ऋद्धि एवं सिद्धि कहा जाता है। नाम गिनाये जायें तो रैदास, दादू, नानक, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम ऐसे अनेकों हैं जिन्होंने गृही और विरक्त सन्त का जीवन जिया। इनके जीवन–चरित्रों को कसौटी पर कसा जा सकता है और देखा जा सकता है कि कोल्हू के बैल की तरह ढर्रे का नीरस जीवन बिताने की अपेक्षा यदि उनने ईश्वर का आश्रय लेने का निर्णय लिया तो वे घाटे में नहीं रहे।
कम लाभ की अपेक्षा अधिक लाभ का व्यापार करना बुद्धिमत्ता ही कहा जायेगा। फिर उपासना का अवलम्बन लेना क्यों अदूरदर्शिता माना जाय? निस्सन्देह यही सही जीवन की रीति−नीति है कि शरीरगत स्वार्थों का ध्यान रखने के अतिरिक्त आत्म−कल्याण की भी आवश्यकता समझी जाय और उपासना का आश्रय इसके लिये लिया जाय। इसे नियमित दिनचर्या का अंग बनायें तो हर व्यक्ति अनुपम लाभ प्राप्त कर सकता है।
क्रमशः जारी
~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
-अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 3
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