Wednesday 15, October 2025
प्रज्ञा साहित्य का महत्व :छोटे स्वाध्याय मंडलों की बड़ी तथा महती भूमिका|Rishi Chintan Youtube Channel
अमृत सन्देश:- आप यह तीन कार्य कर लीजिए ? Aap Yah Teen Karya Kar Lijiye
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 15 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृत सन्देश:- आप यह तीन कार्य कर लीजिए ? Aap Yah Teen Karya Kar Lijiye
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आपकी श्रद्धा जीवंत होनी चाहिए और आपकी श्रद्धा नेक होनी चाहिए।
अंधश्रद्धा का ये परिणाम है, हमारा विश्वास खत्म होते चले जा रहे हैं।
उपासना के लिए जब कोई आदमी ये कहता है — “हमको, हमको साहब फुर्सत नहीं है।”
एक और जब कोई आदमी यह कहता है — “मेरा भजन में मन नहीं लगता।”
दो बात कहता है — “मन नहीं लगता गुरू जी मेरा।”
एक और जब यह कहता है — “मुझे फुर्सत नहीं मिलती है भजन करने को।”
तो मैं यह कहता हूँ — वो आदमी नास्तिक है।
क्यों नास्तिक? क्यों है?
इसकी निष्ठाएं खत्म हो गईं।
निष्ठाएं खत्म हो गईं।
निष्ठाएं खत्म ना होतीं, तो...?
“मुझे टाइम नहीं मिलता, टाइम पान की दुकान चलाने के लिए।”
सवेरे 5:30 बजे से जब पैसेंजर आता है, तब कोको-कोला बेचने के लिए और चाय-कॉफी बेचने के लिए 5:30 बजे दुकान खोल देते हैं।
स्टेशन के पास दुकान है और रात को 12:30 बजे सेकंड शो जब खत्म होता है सिनेमा का, तो उस वक्त जो काम करते हैं, वो 5 रुपए की सिगरेट माँगने आते हैं और पान माँगते आते हैं।
उनको 5 रुपए की सिगरेट और पान देने के लिए हम रात को 12:30 बजे तक दुकान खोले बैठे रहते हैं, और सवेरे 5:00 बजे से शुरू कर देते हैं।
टाइम है कि नहीं?
“साहब टाइम नहीं होगा, तो बाल-बच्चों को कहाँ से खिलाएँगे?”
मकान भी तो इसी में से बना लिया है।
दुकान ही तो हम लोगों को जिंदा रखती है।
तो दुकान कैसे नहीं खोलेंगे?
टाइम है कि नहीं? टाइम तो है।
भजन में?
भजन में टाइम नहीं है क्यों?
हमारा ईमान और हमारा भगवान यह कहता है —
"बेटा बेकार की बातें।"
अंदर तक की बातें हैं।
जितने भी भजन करने वाले हैं, इनकी हम शक्ल देखते हैं और सूरत देखते हैं ना,
न इनके चेहरे पर है तेज, न इनके चेहरे पर है चमक,
न इनके अंदर कोई विवेक है, न कोई वर्चस्व है, न कोई गुण है।
इतने आदमी जो लाखों आदमी हमको दिखाई पड़ते हैं —
इनके अंदर कुछ भी नहीं है।
तो फिर हमको भी वैसे ही मिल जाएगा।
जबान से तो नहीं कह सकते यह बात को।
जबान से तो कहेंगे, तो सारे आदमी हमको बुरा कहेंगे।
"नास्तिक कहेंगे।"
पर हमारा ईमान कहता है —
"वास्तव में यह बेकार बात है।"
इसीलिए बेकार बात के लिए टाइम नहीं मिलता है, तो कोई हर्ज की बात नहीं है।
हमारा अंतःचेतना कहती है — "बेकार है।"
इसलिए हम को टाइम नहीं मिलता।
टाइम किसके लिए नहीं मिलता है?
टाइम उस चीज के लिए नहीं मिलता है, जिसको हम बेकार बात समझते हैं और बेवकूफी की बात समझते हैं।
बेकार और बेवकूफी की बात के लिए टाइम नहीं मिलता।
हमेशा ये याद रखना —
फुर्सत न मिल जाए कोई बात नहीं।
फुर्सत, जिनको हम काम की बात समझते हैं — उसके लिए हम तो चौबीस घंटे लगे रहते हैं।
बेकार की बात के लिए फुर्सत है।
और “मन नहीं लगता” — क्या मतलब है इसका?
मन लगाने का मतलब सिर्फ एक है।
कौन सा वाला? कौन सा मतलब है?
इसकी उपयोगिता और महत्ता के बारे में पूरा संदेह है।
जिस बात की उपयोगिता मालूम पड़ती है, उसमें हमारा मन लगा रहता है।
बीवी में हमारा मन लगा रहता है।
ए.सी. में हमारा मन लगा रहता है।
सिनेमा में हमारा मन लगा रहता है।
रुपया कमाने में हमारा मन लगा रहता है।
मनोरंजन में हमारा मन लगा रहता है।
क्यों?
हमारा मन स्वीकार करता है कि यह लाभदायक चीजें हैं।
इससे हमारा मनोरंजन बनता है।
हमको साधन भी होता है।
अखण्ड-ज्योति से
चन्द्रमा तभी चमकता है जब वह सूर्य का प्रकाश पाता है। अपने आप में वह प्रकाशवान नहीं, उसकी अकेली कोई सत्ता नहीं। सूर्य का आलोक जब उसे प्राप्त नहीं होता तो अमावस्या के दिन चन्द्रमा के यथा स्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। परमात्मा वह दिव्य शक्ति आलोक से भरा प्रकाश पुंज है जिससे हम सभी अनुप्राणित प्रकाशवान होते हैं।
उपासना हमें उसके समीप ले जाकर स्थायी बल प्राप्त कराती है। जितना सामीप्य हमें ईश्वर का–परमात्मा सत्ता का–मिलता है, उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती चली जाती हैं। इसी अनुपात में हमारी आत्मिक शाँति–प्रगति का पथ–प्रशस्त होता चला जाता है।
उपासना का बहिरंग स्वरूप क्या हो– इसके विस्तार में अभी न जाकर यह देखा जाय कि परमेश्वर साधक के आन्तरिक स्तर को कैसा चाहता है? रामकृष्ण परमहंस कहते थे–”ईश्वर का दर्शन तब होता है जब पाँच सत्प्रवृत्तियाँ अन्दर प्रवेश पाने व फलने–फूलने लगती है। ये पाँच सत्प्रवृत्तियाँ हैं–उत्कृष्टता, निर्मलता, सहृदयता, उदारता, आत्मीयता। ये ही परमात्मा के–ईश्वरीय सत्ता के–भी गुण हैं। जैसे −जैसे इन गुणों का अनुपात अपने अन्दर बढ़ने लगता है, समझना चाहिए जीव उतना ही ईश्वर के समीप पहुँच गया है।”
इन पाँच सत्प्रवृत्तियों को परमेश्वर का प्रतिनिधि–पंचदेव भी कह सकते हैं। इन्हीं पाँच पाण्डवों को आजीवन आँतरिक असुर कौरवों से लड़ना होता है। जब असुरता के उन्मूलन का हृदय मंथन आक्रोश पूर्वक हो रहा हो–स्पष्ट मान लेना चाहिये कि जीव रूपी अर्जुन ने गीता का ज्ञान स्वीकार कर लिया और वह कृष्ण की आज्ञा मान कर्त्तव्य पारायण–सच्चा योगी–ईश्वर भक्त हो गया। उपासना स्थली पर बैठकर इन सद्गुणों के सम्वर्धन का ही ध्यान किया जाय तो उल्टे ऋषिकेश को ही पार्थ अर्जुन का रथ चलाने–सफलता का पथ–प्रशस्त करने आना पड़ता है। भक्त और भगवान के बीच अनादिकाल से यही क्रम चलता आया है व चलता रहेगा।
क्रमशः जारी
~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
-अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 2
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