Tuesday 14, October 2025
ईश्वरीय सत्ता का तत्त्व-ज्ञान | Ishwariya Satta Ka Tatwa Gyan | Pt Shriram Sharma Acharya
अमृत सन्देश:- मिलकर कार्य करें, तभी परिवर्तन संभव | Milkar Karya Kare Tabhi Parivartan Sambhav
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 14 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आपकी उपासना चार खंडों में बटी होनी चाहिए। इसमें चारों का समन्वय होना चाहिए, तो आपकी उपासना सर्वांगपूर्ण हो जाएगी। अगर आपकी एकांगी है, जीवन आपका एकांगी है, बाकी बातों से कोई संबंध नहीं आपका, तो मैं कहता हूँ — यह आपकी उपासना अपूर्ण है।
कैसे? एक कोई आदमी था। कहीं मेला हो रहा था। मेला हो रहा था और वो चिल्ला-चिल्ला कर यह चिल्ला रहा था — "चारपाई बिकाऊ है, चारपाई बिकाऊ है, चारपाई आप खरीद लीजिए, बहुत कम दाम की है, दो रुपए की चारपाई है। आप जिसकी मर्जी हो खरीद ले जाए।"
बड़ा मेला हो रहा था। जगह भी नहीं थी बैठने को, तनिक कीचड़ हो रही थी, कहीं पानी। लोगों ने कहा — "भाई, दो रुपए की चारपाई मिलती है तो खरीद लें। रात को चारपाई पर सोएंगे, अच्छी तरीके से नींद नहीं आती, जमीन में कहीं कंकड़ है, कहीं पत्थर है। चारपाई पर रात को सोएंगे, तीन-चार दिन का मेला है। दो रुपए में चारपाई मिलती है तो क्या हर्ज है? फिर देख लेंगे, किसी को आठ आने में बिक जाएगी।"
चारपाई खरीद लेंगे — बात आ गई। किसी को लेना हो तो आ जाए हमारे पास। किसी को लेना हो तो आ जाए हमारे पास।
"अच्छा, लाइए, लाइए, लाइए, हम खरीदेंगे।"
चारपाई लेने के लिए ग्राहक आ गए।
"सब बैठ गए? तब आप बैठ जाइए। चारपाई की अच्छाइयाँ, चारपाई की खराबियाँ आपको बताऊँगा। तब आपको लेने में सुगमता पड़ेगी। बताइए। सब बैठ गए? शांति से बैठिए।"
उनने कहा — "इसमें थोड़ी सी कमी है, चारपाई में। बाकी तो तैयार है। अच्छी होती तो इसके दाम पच्चीस रुपए होते। लेकिन चूंकि ये दो रुपए में बिक रही है, इसीलिए इसके दाम... इसमें थोड़ी कमी है। आप इसको समझ लें, फिर खरीद लें।"
"अच्छा, बताइए वो।"
"यह बोला — कौन सी?"
"वही — दो दाएँ नहीं, दो बाएँ नहीं।"
दाएँ मीनिंग्स — खाट की जो पाटी होती है, सिरे होते हैं ना, दाएँ-बाएँ। वो दो दाएँ-बाएँ नहीं हैं इसके अंदर।
लेकिन सिरे और पाटी इसके अंदर नहीं हैं।
दाएँ वाले लंबे वाले और चौड़ाई वाले, जिन्हें पाटी और सिरे कहते हैं — यह इसमें नहीं हैं चारपाई में।
"और क्या नहीं है?"
"तीन नहीं हैं — पाया।"
"क्या बात है? कौन सी कमी है?"
"कोई कमी नहीं है। दाएँ-बाएँ भी नहीं हैं। एक और भी कमी है इसमें, कि तीन पाए भी नहीं हैं।"
"आ तेरे की! तो कैसी चारपाई है ये?"
उन्होंने कहा — "अभी एक और कमी रह गई है।"
"और क्या? और क्या कमी रह गई?"
"बीच के बाँध तो हैं नहीं।"
बीच के बाँध — वो जो रस्सी वगैरा होती है, जो उसमें बाँध के बुनी जाती है रस्सी — वो होती है। वो रस्सियाँ भी नहीं हैं।
फिर वो बोला —
"खाट लो मेरे भाया!"
राजस्थान में भाई को भाया कहते हैं। भाया, भाया, भाया — मीनिंग भाई से आता है। कोई रिश्तेदार को भाई जी कहते हैं, कोई भाया कहते हैं। ऐसे कुछ शब्द राजस्थान में काम आते हैं। एक तो दाई जो होता है — दाई जी वाले, कोई समधी वगैरह के काम आता है। और भाया? भाया बेचारा किसका? कहेंगे — भाई को कहते हैं। भाई को कहते हैं भाया, भाया कहते हैं। वो साथी लोग कहते हैं — "भाया!"
वो चिल्ला के कहने लगा —
"भाया, क्या आप सुन लीजिए!
दो दाएँ नहीं, दो बाएँ नहीं, दो सिरे नहीं, दो पाटी नहीं, तीन नहीं है पाया, और बीच का झागा है नहीं।
खाट ले लो मेरे भाया!"
आपका भजन है।
आपका भजन है।
आपका भजन — यह देखिए।
खाट क्यों बेच रहा है?
आप बेच रहे हैं!
आप बेच रहे हैं।
कैसा है खाट?
यह माला सटक, सीताराम सटक, सीताराम...
आ... पीछे वाला तो है ही नहीं!
मूर्ख! इसको कैसे बेचेगा?
इडियट!
अखण्ड-ज्योति से
साधना विधान का महत्वपूर्ण अंग है– उपासना। विडंबना यह है कि इस सम्बन्ध में जितने भ्रम−जंजाल फैले हैं उतने साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता।
लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं। असफलता मिलने पर बहुतायत ऐसों की ही होती है जो अपने को नहीं, दोष दैव को−भाग्य को−देते देखे जाते हैं। प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के अभाव में तथा श्रुतियों के भ्रम−जंजालों के कारण भोले साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
उपासना को सही अर्थों में समझाना हो तो पहले उसके अर्थ पर एक दृष्टि डाली जाय। उपासना अर्थात् उप−आसन। समीप बैठना। ईश्वर उपासना का अर्थ है ईश्वर का सामीप्य पाना– ईश्वर अर्थात् सद्.गुणों का समुच्चय आदर्शों से ओत−प्रोत परम सत्ता। ऐसी सत्ता जिसका वरण कर हम श्रेष्ठ बन सकें– वर्तमान स्थिति से स्वयं को ऊँचा उठा सकें। ईश्वर और जीवों में यों समीपता तो है, पर है वह उथली। जीव की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊँचा उठे।
शिश्नोदर परायण जीवन जीते हुए मनुष्य अपनी आस्थाओं को– आकाँक्षाओं को–दिव्य नहीं बना सकता। फिर तो उसे नर–कीट या नर–पशु ही कहना उचित होगा। कायिक विकास तो सभी कर लेते हैं, पर चेतना की दृष्टि से विकास न हो सका, ईश्वर का सामीप्य पाने की पात्रता न बन सकी तो आयु की दृष्टि से प्रौढ़ होते हुए भी ऐसे व्यक्ति अविकसित ही कहे जाएँगे।
पिछली योनियों की निकृष्टताओं से अपना पीछा छुड़ाने के लिये ही उपासना का, ईश्वर की समीपता का उपक्रम अपनाया जाता है। संगति का−समीप बैठने का– महत्व सर्वविदित है– चन्दन के समीप बहने वाली सुगन्धित पवन आस−पास के वृक्षों को भी वैसा ही सुरभित बना देती है। टिड्डा हरी घास में रहता है तो उसका शरीर वैसा ही हो जाता है और जब सूखी घास में रहता है तो पीला पड़ जाता है। महामानवों का सामीप्य पाने वाले उनकी शक्ति से–संगति से– लाभान्वित होते, उन्हीं गुणों से ओत−प्रोत होते देखे जाते हैं। महात्मा गाँधी एकाकी सत्ता के रूप में विकसित हुए पर इस वट वृक्ष के नीचे पलने – बढ़ने वाले पटेल, जवाहर, लाल बहादुर बने। यह संगति का सामीप्य का ही प्रतिफल है। कीट−भँगी का तद्रूपता का उदाहरण सुप्रसिद्ध है।
क्रमशः जारी
~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
-अखण्ड ज्योति – मार्च 1982 पृष्ठ 2
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