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Saturday 19, July 2025

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की शक्ति कैसे कार्य करती हैं? मन को मनाइए अपना सहयोगी बनाइये | बिन पानी पिए

की शक्ति कैसे कार्य करती हैं? मन को मनाइए अपना सहयोगी बनाइये | बिन पानी पिए

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अमृतवाणी:- नए ढंग से विचार करने की आवश्यकता | Naye Dhang Se Vichar Krne Ki Avashyakta पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- नए ढंग से विचार करने की आवश्यकता | Naye Dhang Se Vichar Krne Ki Avashyakta पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 19 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: ईश्वर की कृपा कैसे मिलती है पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



 मुझे बराबर मेरा गुरु अनुदान देता चला गया पैसे की दृष्टि से जब उसने जान लिया इस आदमी के हाथ में पैसा देने से कोई जोखिम नहीं है जोखिम नहीं है यह पैसे का ठीक इस्तेमाल करेगा तो बेटा पैसा मेरे ऊपर कहाँ से बरसता हुआ चला आया अपनी जिंदगी में मैंने करोड़ों रुपया खर्च किया  समझ ले तू एक हजार कुंड के यज्ञ जब मैं विदा हुआ था तो सात प्रांतों में सात हिंदी भाषी प्रांतों में और हिंदी से मिलते जुलते प्रांतों में एक-एक हजार कुंड के यज्ञ हुए थे और मैं समझता हूँ कोई भी यज्ञ ऐसा नहीं हुआ होगा जिसमें एक लाख रूपये से कम खर्च हुआ हो और बेटे मैंने एक साल में खर्च करा दिए और कितना कितना कितनों लाखों की तादाद गांधी जी को तो करोड़ो आते थे पर करोड़ों तो मुझे नहीं आता पर लाखों की तादाद में मुझे भी गिनना नहीं आता एक हजार कुंड यज्ञ हुआ था चार लाख आदमी आए थे पाँच दिन तक रहे थे बीस लाख रुपया खाने पीने में खर्च हुआ था और  और बीस लाख के करीब ही टेंटो में और बिजली में और रोशनी में और हवन में और पंडाल में इसमें खर्च हुआ था चालीस लाख रूपया खर्च हुआ था कहाँ से आया था बेटे मैं नहीं बताऊंगा तुझे कहाँ से आया था कहीं से आया था लेकिन इंसान का दिया हुआ नहीं था इंसान का दिया हुआ नहीं था तो कहाँ से आता चला जाता है ऐसी एक शक्ति है जो प्राचीन काल में भी थी सतयुग में भी थी द्वापर में भी थी त्रेता में भी थी और कलयुग में भी है सूरज सतयुग में भी था और द्वापर में भी था त्रेता में भी था और कलयुग में भी है ज्यों की त्यों ही गर्म निकलता है और जैसे यह पहले निकलता था वैसा ही अभी निकलता है चंद्रमा रात को ही निकलता था ठंडा ही निकलता था द्वापर में सतयुग में त्रेता में अभी भी निकलता है भगवान वही है ज्यों का त्यों भगवान की परंपरा ज्यों की त्यों ही है इंसान इंसान घटिया होता हुआ चला गया मंत्र वही है बेटे गायत्री मंत्र वही है गायत्री मंत्र कोई और नहीं है जो विश्वामित्र के पास था जो वशिष्ठ के पास था वही है पर घटिया आदमी क्या करेगा इस मंत्र का घटिया आदमी के लिए क्या करेगा इसीलिए व्यक्तित्व का परिष्कृत करना आवश्यक है आवश्यक है हमको मंत्र की शक्ति देखने के लिए भगवान की शक्ति देखने के लिए आध्यात्मिक शक्ति देखने के लिए यह मैं आपको शिक्षित करता हूँ शिक्षित करता हूँ आप अपना कर्तव्य पूरा कीजिए हम अपना करेंगे |

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

 

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अखण्ड-ज्योति से



मन का शरीर पर अटूट अविच्छिन्न एवं अकाट्य प्रभाव है और यह सब काल, सब स्थितियों तथा समस्त अवस्थाओं में समान रूप से रहता है। मानसिक जर्जरता, मानसिक अशान्ति, उद्वेग, आवेश, विकार, मन में उद्भूत अनिष्ट कल्पना, चिंतन की अकल्याणकारी मूर्ति, ईर्ष्या, द्वेष इत्यादि मन की विभिन्न भूमिकाओं का शरीर पर भयंकर प्रभाव पड़ता है। मनोविकार निरन्तर हमें नाच नचाया करते हैं, काम, क्रोध, इत्यादि मनुष्य के षट्रिपु हमें समूल नष्ट करने को प्रस्तुत रहते हैं। अनेक व्यक्ति सर्वत्र इनके मिथ्या प्रलोभनों में ग्रसित होकर अनेक स्नायु रोगों के शिकार बनते हैं।

शरीर में प्रत्येक प्रकार की अनुकूल अथवा प्रतिकूल अवस्था का निर्माण करने की सामर्थ्य मनुष्य के मन में अंतर्निहित है। मन के गर्भ भाग में जो कुटिल अथवा भव्य मनः संस्कार अंकित होते हैं, वही सिद्धान्त एवं निश्चय रूप धारण करके प्रतिमा रूप बन कर बाह्य जगत में प्रकट होते हैं और तद्रूप जीवन निर्माण करते हैं।

जो मनः स्थिति हमारे अन्तःकरण में वर्तमान है, उसी ने हमारी रूप रेखा का निर्माण किया है। यदि मनुष्य की आन्तरिक स्थिति तुच्छ एवं घृणित है, तो उसके पीछे दुःख तथा क्लेश इस प्रकार लगे हैं जैसे जीव के पीछे उसकी परछाहीं। मनुष्य अपने विचारों का फल है। बाह्य स्वरूप मन द्वारा विनिर्मित शरीर वह ढांचा (Mould) है, जिसमें वह निरन्तर अविच्छिन्न गति से निज शक्तियाँ संचारित किया करता है। आन्तरिक भावनाओं की प्रतिकृति मुख, अंग प्रत्यंगों, क्रियाओं, वार्तालाप, मूक चेष्टाओं, रहन-सहन, व्यवहार में क्षण-क्षण में परिलक्षित होती हैं। जिस प्रकार जिह्वा द्वारा उदर की गतिविधि जानी जाती है, उसी प्रकार मुखमण्डल आन्तरिक भावनाओं का प्रतिबिम्ब है।
                  
मन की शरीर पर क्रिया एवं शरीर की मन पर प्रतिक्रिया निरन्तर होती रहती है। जैसी आपका मन, वैसा ही आपका शरीर, जैसा शरीर वैसा ही मन का स्वरूप। यदि शरीर में किसी प्रकार की पीड़ा है, तो मन भी क्लान्त, अस्वस्थ, एवं पीड़ित हो जाता है। वेदान्त में यह स्पष्ट किया गया है कि समस्त संसार की गतिविधि का निर्माण मन द्वारा ही हुआ है। जैसी हमारी भावनाएं, इच्छाएँ, वासनाएँ अथवा कल्पनाएँ हैं, तदनुसार ही हमें शरीर, अंग-प्रत्यंग, बनावट प्राप्त हुई है। मनुष्य के माता-पिता, परिस्थितियाँ, जन्म स्थान, आयु, स्वास्थ्य, विशेष प्रकार के छिन्न-भिन्न शरीर प्राप्त करना, स्वयं हमारे व्यक्तिगत (Personal) मानसिक संस्कारों पर निर्भर है। हमारा बाह्य जगत हमारे प्रसुप्त संस्कारों की प्रतिच्छाया मात्र है।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति-फर. 1946 पृष्ठ 3

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