Sunday 20, July 2025
कौशाम्बी: अखिल विश्व गायत्री परिवार के माध्यम से कौशाम्बी जनपद में 7 नवंबर को भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का आयोजन किया जाएगा। परीक्षा को लेकर आयोजन समिति की बैठक भरवारी नगर स्थित गायत्री चेतना केंद्र में 20 जुलाई दिन रविवार को आयोजित हुई जिनमें शांतिकुंज के प्रतिनिधि और जोनल प्रभारी श्री राधेश्याम त्रिपाठी ने परीक्षा आयोजित कराए जाने को लेकर योजना से परिचय कराया।
जनपद समन्वयक राम सनेही श्रीवास्तव ने बताया कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा शांतिकुंज हरिद्वार के मार्गदर्शन में आयोजित होने वाली एक प्रतिष्ठित परीक्षा है, जो छात्र-छात्राओं में भारतीय संस्कृति, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के बारे में ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए आयोजित की जाती है। इस अवसर पर प्रमुख रूप से सुरेश जायसवाल, ज्ञानेश्वर त्रिपाठी, अजय केसरवानी, राम चन्द्र, अभिषेक जायसवाल, अजीत कुशवाहा, सौरभ वर्मा, बृजेश द्विवेदी, पीयूष कुशवाहा, संतोष सिंह, दिलीप दिवाकर, शुभम, संध्या कुशवाहा, नीरज देवी, सीता केसरवानी, सलोनी, पिंकी देवी आदि लोग मौजूद रहें।
कौशाम्बी: अखिल विश्व गायत्री परिवार के माध्यम से कौशाम्बी जनपद में 7 नवंबर को भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का आयोजन किया जाएगा। परीक्षा को लेकर आयोजन समिति की बैठक भरवारी नगर स्थित गायत्री चेतना केंद्र में 20 जुलाई दिन रविवार को आयोजित हुई जिनमें शांतिकुंज के प्रतिनिधि और जोनल प्रभारी श्री राधेश्याम त्रिपाठी ने परीक्षा आयोजित कराए जाने को लेकर योजना से परिचय कराया।
जनपद समन्वयक राम सनेही श्रीवास्तव ने बताया कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा शांतिकुंज हरिद्वार के मार्गदर्शन में आयोजित होने वाली एक प्रतिष्ठित परीक्षा है, जो छात्र-छात्राओं में भारतीय संस्कृति, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के बारे में ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए आयोजित की जाती है। इस अवसर पर प्रमुख रूप से सुरेश जायसवाल, ज्ञानेश्वर त्रिपाठी, अजय केसरवानी, राम चन्द्र, अभिषेक जायसवाल, अजीत कुशवाहा, सौरभ वर्मा, बृजेश द्विवेदी, पीयूष कुशवाहा, संतोष सिंह, दिलीप दिवाकर, शुभम, संध्या कुशवाहा, नीरज देवी, सीता केसरवानी, सलोनी, पिंकी देवी आदि लोग मौजूद रहें।
जाल लेकर उड़े-पर गिरे प्रज्ञा पुराण प्रेरणा दायक कहानी | Pragya Puran Motivational Story
परमात्मा को भूलो मत | Paramatma Ko Bhulo Mat
तुम्हारे पद्म चरणों में, नमन सौ बार है गुरुवर।
साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व | Aasan Evam Disha Ka Bhi Mahatva | Guru Gita
शिक्षा ही नहीं विद्या भी : क्यों आवश्यक है विद्या | Siksha Hi Nhi Vidya Bhi | Safal Jivan Ki Disha
गायत्री से व्याधि-निवारण | Gayatri Se Vyadhi Nivaran
आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है–आज का अध्ययन व्यायाम, व्यवसाय आज ही कहाँ फल देता है? परिणाम में देर लगने पर बालक निराश हो सकते हैं, पर विचारशील लोग अपनी निष्ठा विचलित नहीं होने देते और आशा, विश्वास के साथ काम करते रहते हैं। असंयम बरतने पर उसी दिन शरीर रुग्ण नहीं हो जाता–जिस दिन चोरी की जाय, उसी दिन जेल भुगतनी पड़े ऐसा कहाँ होता है? तो भी समझदारी सुझाती है कि कल नहीं, परसों परिणाम मिलकर ही रहेगा। यही दूरदर्शिता सत्कर्मों, दुष्कर्मों के सुनिश्चित परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनाई जानी चाहिए। पर लोग भ्रम ग्रस्त होकर–कर्मफल के सम्बन्ध में विश्वास छोड़ बैठते हैं। इसी इनकारी को वास्तविक नास्तिकता कहना चाहिए।
दुष्कर्मों का प्रतिफल कई रूपों में भुगतना पड़ता है। लोक निन्दा होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अप्रामाणिक−अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें किसी का सघन विश्वास एवं सच्चा सहयोग नहीं मिलता। श्रद्धा और सम्मान तो उसी को मिलता है, जिसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होती है। जन−विश्वास एवं सहयोग के आधार पर कोई व्यक्ति प्रगति करता और सफल होता है। संदिग्ध चरित्र व्यक्तियों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ता है और वे मित्र विहीन एकाकी नीरस जीवन जीते हैं। घनिष्ठता का लाभ तो उन्हें स्वजनों से भी नहीं मिलता। वे भी सदा आशंका की ही दृष्टि से देखते हैं और दिखावे का सहयोग दे पाते हैं, आत्म प्रताड़ना का दुरूह दुःख ऐसे ही लोगों को सहना पड़ता है। दूसरों को झुठलाया जा सकता है, पर अपनी ही आत्मा को कैसे बहकाया जाय? वह दुष्कर्मों से स्वयं खिन्न रहती है। आत्मधिक्कार से आत्मबल निरन्तर गिरता जाता है।
समाज तिरस्कार, असहयोग, विरोध, उपेक्षा से प्रत्यक्ष हानि है। जिसके ऊपर घृणा और तिरस्कार बरसता है, उसकी अन्तरात्मा को पत्थर बरसने से भी अधिक अन्तःपीड़ा सहनी पड़ती है। धन छिन जाना उतनी बड़ी हानि नहीं है जितना कि विश्वास, सम्मान और सहयोग चला जाना। दुष्कर्मों का यह सामाजिक दण्ड हर कुमार्गगामी को भुगतना पड़ता है। पाप और पारा छिपता नहीं। वह फूट−फूट कर देर−सबेर में बाहर निकलता ही है। सत्कर्म छिप सकते हैं, दुष्कर्म नहीं। हींग की गन्ध कई थैलियों में बन्द करके रखने पर भी फैलती है और दुष्कर्मों की दुर्गन्ध हवा में इस तरह उड़ती है कि किसी के छिपाए नहीं छिपती। समाज दण्ड−असहयोग बहिष्कार के रूप में तो बरसता है।
कई बार वह प्रतिशोध और प्रत्याक्रमण के रूप में भी सामने आता है। लोग अनीति के विरुद्ध उबल पड़ते हैं तो दुरात्मा का कचूमर ही निकाल कर रख देते हैं। न केवल अध्यात्म क्षेत्र में वरन् भौतिक जीवन में भी यही सिद्धान्त काम करता है। रक्त विकार जैसे रोगों को दूर करने के लिए कुशल वैद्य पेट की सफाई करने के उपरान्त अन्य रक्त शोधक उपचार करते है। काया−कल्प चिकित्सा में बलवर्धक औषधियों को नहीं, संचित मलों का निष्कासन करने वाले उपायों को ही प्रधान रूप से कार्यान्वित किया जाता है। नमन, विरेचन, स्वेदन आदि क्रियाओं द्वारा मल निष्कासन का ही प्रयास किया जाता है। इसमें जितनी सफलता मिलती जाती है। उसी अनुपात से जरा−जीर्ण रोग ग्रस्त व्यक्ति भी आरोग्य लाभ करता और बलिष्ठ बनता चला जाता है। काया कल्प चिकित्सा का विज्ञान इसी सिद्धान्त पर आधारित है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1982 पृष्ठ 47
अमृतवाणी:- पीले कपड़ों की विशेषता और पहचान | Pile Kapdo Ki Visheshta Aur Pehchan पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
संयमपूर्वक जीवन जियें, स्वस्थ रहें, मस्त रहें | Sammanpurvak Jivan Jiyen, Swasth Rahen, Mast Rahen
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 20 July 2025
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 20 July 2025
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 20 July 2025
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 20 July 2025
!! शांतिकुंज दर्शन 20 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 20 July 2025
!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 20 July 2025
अमृतवाणी: मन की कमजोरी भी बाधा है पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हमारे गुरु ने अपनी कमाई का और तप का बहुत सारा हिस्सा हम को दे दिया साधना का हिस्सा हमको दे दिया हम भी इतने निष्ठुर नहीं हैं कि आपको अपनी साधना का अंश और अपनी उपासना का अंश जिंदा रहे तब और ना जिंदा रहे तब यहाँ रहे तब और हिमालय पर चले जाएं तब आपका हक और आप का हिस्सा आपको ना दें ऐसी बात नहीं है बेटे हम जरूर देंगे अपना हक भी देंगे और हिस्सा भी देंगे उस हक और हिस्से से आपको सिद्धियाँ मिलेंगे हम वादा करते हैं कि आपको सिद्धियाँ मिलेंगी लेकिन बात वहीं आ गई बात वहीं आ गई बेटे तू हजम कैसे करेगा यह बता पहले हजम कैसे करेगा हजम नहीं कर सकता बच्चे को बच्चे को हम सोन हलवा खिला दें और बादाम का हलवा खिला दे तो बेटे बच्चे का पेट जाम हो जाएगा वो हजम नहीं कर सकता उसके लिए तो थोड़ी चीज देनी चाहिए यह हजम कैसे करेगा सिद्धियाँ तू हजम कैसे करेगा यह बता तुझे मैं आशीर्वाद दिला कर दूँ तो तू हजम कैसे करेगा पहले यह बता दे मुझे यह सबूत दे दे हजम कर सकता है तो मैं तुझे देना शुरू करूं देना शुरू करूंगा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए व्यक्तिगत लोभ के लिए देवी शक्तियों का आश्रय नहीं लेना चाहिए और ना माँगा जाना चाहिए और ना वो देंगी इस लिए आपको क्या करना पड़ेगा पात्रता का विकास करना चाहिए प्रत्येक शरीर के हिस्सो का जो हमारे पास है कल्पवृक्ष है अपना जीवन लेकर के आये है कल्पवृक्ष इसके लेकर के आए हैं अमृत इसी के भीतर पड़ा है पारस इसी के भीतर पड़ा है और अमृत पारस और कल्पवृक्ष तीनों के तीनों इसी के अंदर भीतर पड़े हैं अगर हम ठीक तरीके से इस्तेमाल कर सके तब तब बेटे मैंने शरीर की बात आपको बताई थी और प्राण की बात बताई थी हिम्मत के बारे में बताई थी हिम्मत का मतलब चोरी डकैती के लिए हिम्मत नहीं कल मैं आप लोगों से यह निवेदन कर रहा था कि हमारी हिम्मत हमारी हिम्मत श्रेष्ठ काम करने के लिए चारों तरफ से दबाव पड़ते हैं और चारों तरफ से लोग दिखाई पड़ते हैं चारों तरफ से बहकावे वाले और बुलावे वाले जहाँ कहीं भी जाइए आप के मार्ग में अडंगा अटकाने वाले यह बताया जाता है अध्यात्म के मार्ग में बड़ी रुकावट आती है बड़ी रोक आतीे हैं बेशक बेटे बड़ी रुकावट और बड़ी रोक आती है यह कहाँ से आती हैं कहीं से नहीं आती है यह हमारे पड़ोसियों से आती हैं हमारे घर वालों से आती हैं हमारे मित्रों से आती हैं और हमारे संम्बधियों से आती हैं वही अभागे हमको बार-बार यह कहते हैं आपको अच्छे कामों से बाज आना चाहिए और सारी जिंदगी आपको सिवाय चालाकी और बेईमानी के किसी काम में खर्च नहीं करनी चाहिए लोभ और मोह से दायरे से एक कदम जब बाहर निकालते हैं तो आप के हितैषी हितैषी शुभ चिन्तक का बाना बनाने वाले वही सबसे बड़े अड़ंगे अटकाते है दीवार वाही बनके खड़े हो जाते है बेटे हमारे मन की कमजोरियां भी रुकावट पैदा कर देती है
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है–आज का अध्ययन व्यायाम, व्यवसाय आज ही कहाँ फल देता है? परिणाम में देर लगने पर बालक निराश हो सकते हैं, पर विचारशील लोग अपनी निष्ठा विचलित नहीं होने देते और आशा, विश्वास के साथ काम करते रहते हैं। असंयम बरतने पर उसी दिन शरीर रुग्ण नहीं हो जाता–जिस दिन चोरी की जाय, उसी दिन जेल भुगतनी पड़े ऐसा कहाँ होता है? तो भी समझदारी सुझाती है कि कल नहीं, परसों परिणाम मिलकर ही रहेगा। यही दूरदर्शिता सत्कर्मों, दुष्कर्मों के सुनिश्चित परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनाई जानी चाहिए। पर लोग भ्रम ग्रस्त होकर–कर्मफल के सम्बन्ध में विश्वास छोड़ बैठते हैं। इसी इनकारी को वास्तविक नास्तिकता कहना चाहिए।
दुष्कर्मों का प्रतिफल कई रूपों में भुगतना पड़ता है। लोक निन्दा होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अप्रामाणिक−अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें किसी का सघन विश्वास एवं सच्चा सहयोग नहीं मिलता। श्रद्धा और सम्मान तो उसी को मिलता है, जिसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होती है। जन−विश्वास एवं सहयोग के आधार पर कोई व्यक्ति प्रगति करता और सफल होता है। संदिग्ध चरित्र व्यक्तियों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ता है और वे मित्र विहीन एकाकी नीरस जीवन जीते हैं। घनिष्ठता का लाभ तो उन्हें स्वजनों से भी नहीं मिलता। वे भी सदा आशंका की ही दृष्टि से देखते हैं और दिखावे का सहयोग दे पाते हैं, आत्म प्रताड़ना का दुरूह दुःख ऐसे ही लोगों को सहना पड़ता है। दूसरों को झुठलाया जा सकता है, पर अपनी ही आत्मा को कैसे बहकाया जाय? वह दुष्कर्मों से स्वयं खिन्न रहती है। आत्मधिक्कार से आत्मबल निरन्तर गिरता जाता है।
समाज तिरस्कार, असहयोग, विरोध, उपेक्षा से प्रत्यक्ष हानि है। जिसके ऊपर घृणा और तिरस्कार बरसता है, उसकी अन्तरात्मा को पत्थर बरसने से भी अधिक अन्तःपीड़ा सहनी पड़ती है। धन छिन जाना उतनी बड़ी हानि नहीं है जितना कि विश्वास, सम्मान और सहयोग चला जाना। दुष्कर्मों का यह सामाजिक दण्ड हर कुमार्गगामी को भुगतना पड़ता है। पाप और पारा छिपता नहीं। वह फूट−फूट कर देर−सबेर में बाहर निकलता ही है। सत्कर्म छिप सकते हैं, दुष्कर्म नहीं। हींग की गन्ध कई थैलियों में बन्द करके रखने पर भी फैलती है और दुष्कर्मों की दुर्गन्ध हवा में इस तरह उड़ती है कि किसी के छिपाए नहीं छिपती। समाज दण्ड−असहयोग बहिष्कार के रूप में तो बरसता है।
कई बार वह प्रतिशोध और प्रत्याक्रमण के रूप में भी सामने आता है। लोग अनीति के विरुद्ध उबल पड़ते हैं तो दुरात्मा का कचूमर ही निकाल कर रख देते हैं। न केवल अध्यात्म क्षेत्र में वरन् भौतिक जीवन में भी यही सिद्धान्त काम करता है। रक्त विकार जैसे रोगों को दूर करने के लिए कुशल वैद्य पेट की सफाई करने के उपरान्त अन्य रक्त शोधक उपचार करते है। काया−कल्प चिकित्सा में बलवर्धक औषधियों को नहीं, संचित मलों का निष्कासन करने वाले उपायों को ही प्रधान रूप से कार्यान्वित किया जाता है। नमन, विरेचन, स्वेदन आदि क्रियाओं द्वारा मल निष्कासन का ही प्रयास किया जाता है। इसमें जितनी सफलता मिलती जाती है। उसी अनुपात से जरा−जीर्ण रोग ग्रस्त व्यक्ति भी आरोग्य लाभ करता और बलिष्ठ बनता चला जाता है। काया कल्प चिकित्सा का विज्ञान इसी सिद्धान्त पर आधारित है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति फरवरी 1982 पृष्ठ 47
मनुष्य उतना तुच्छ नहीं है जितना कि वह अपने को समझता है। वह सृष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। न केवल वह प्राणियों का मुकुटमणि हेै, वरन् उसकी गतिविधियाँ भी असाधारण हैं। प्रकृति की पदार्थ सम्पदा उसके चरणों पर लोटती है। प्राणि समुदाय उसका वशवर्ती और अनुचर है। उसकी न केवल संरचना अद्भुत है, वरन् इन्द्रिय समुच्चय की प्रत्येक इकाई अजस्र आनन्द- उल्लास हर जगह उड़ेलते रहने की विशेषताओं से सम्पन्न है। ऐसा अद्भुत शरीर सृष्टि में कहीं भी किसी भी जीवधारी के किस्से नहीं आया।
मनः संस्थान उससे भी विलक्षण है। जहाँ अन्य प्राणिमात्र अपने निर्वाह तक की सोच पाते हेैं, वहाँ मानवी मस्तिष्क भूत- भविष्य का तारतम्य मिलाते हुए वर्तमान का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने में समर्थ है। ज्ञान और विज्ञान के दो पंख उसे ऐसे मिले हैं जिनके सहारे वह लोक लोकान्तरों का परिभ्रमण करने, दिव्य लोक तक पहुँचने का अधिकार जमाने में समर्थ है।
इतना सब होते हुए भी स्वयं को तुच्छ मान बैठना एक विडम्बना ही है। यह दुर्भार्र्ग्य जिस कारण उस पर लदता है , वह आत्म- विश्वास की कमी। अपने ऊपर विश्वास न कर पाने के कारण वह समस्याओं को सुलझाने, कठिनाइयों से उबरने और सुखद सम्भावनाओं को हस्तगत करने में दूसरों का सहारा तकता है। दूसरे कहाँ इतने फालतू होंगे कि हमारी सहायता के लिए दौड़ पड़ें? बात तभी बनती है, जब मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा होता है, अपनीक्षमाताओं पर भरोसा करके, अपने साधनों व सूझ- बूझ के सहारे आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है। यह भली भाँति समझा जाना चाहिए कि आत्म- विश्वास संसार का सबसे बड़ा बल है, एक शक्तिशाली चुम्बक है, जिसके आक र्षण से अनुकूलतायें स्वयं खिंचती चली आती हैं।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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