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Monday 21, July 2025

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अमृतवाणी:- आत्मा और शरीर | Atma Aur Sharir पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- आत्मा और शरीर | Atma Aur Sharir पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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 समाज की अभिनव रचना सद्विचारों से | Samaj Ki Abhinav Rachna Sadvicharo se | Shantikunj Rishi Chintan

समाज की अभिनव रचना सद्विचारों से | Samaj Ki Abhinav Rachna Sadvicharo se | Shantikunj Rishi Chintan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 21 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: आध्यात्मिकता की पहली शर्त क्या है पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भौतिक जीवन में सफलतायें पाने के लिए तीन वृक्षों की आपको साधना करनी पड़ेगी तीन देवताओं की साधना करनी पड़ेगी जिसका एक का नाम आपको  मैंने बताया था शरीर आप निरोग होंगे तो पैसा भी कमा सकते हैं स्वास्थ्य भी कमा सकते हैं अय्याशी भी कर सकते हैं विलासिता भी कर सकते हैं काम सेवन भी कर सकते हैं रोटी भी हजम कर सकते हैं दंगल भी पछाड़ सकते हैं बैंरी का मुकाबला भी कर सकते है यह सिद्धियां और चमत्कार है किसके हैं शरीर के हैं शरीर के हैं क्यों महाराज जी भगवान देगा हाँ बेटे भगवान ही देगा लेकिन भगवान का पूजन केवल वस्तुओं से नहीं हो सकता गुणों और कर्मों के द्वारा होता है और भगवान का पूजन जो हमारे शरीर में कर्म रूप से रहता है उसका पूजन हमको संयम के आधार पर और श्रम के आधार पर करना पड़ता है श्रम और संयम श्रम और संयम श्रम और संयम इन दो आधारों पर आप शरीर के देवता की उपासना कर सकते हो तो बेटे वो आप को निहाल कर देगा और आपको  मालदार बनायेगा और आपको समर्थ बनाएगा और सुशक्त बनाएगा यहीं तो हम सवेरे आपको कुंडलिनी योग में सिखाते हैं कल हम आप को यह सिखा रहे थे कि सांसारिक सांसारिक सफलतायें पीछे  जा करके तो अध्यात्मिकता में भी शामिल हो जाती हैं सफलताएं सफलताएं किसी भी क्षेत्र में क्यों ना हो चलिए तो अब मैं अब तो मैं वहाँ आ गया चोर और डाकू का चोर और डाकू का आता हँू चोर और डाकू पर आता हूँ चोर और डाकू की सफलता डकैती की वजह से तो उनको जेल खाना हो जाता है और निंदा होती है और जो रुपया कमा करके ले आते हैं वो बेटे वो साहस की कीमत पर ले आते हैं यह आध्यात्मिक गुण है साहस साहस की कीमत पर जंगलों में चले जाते हैं और रात में पड़े रहते हैं और जंगलों में पड़े रहते हैं और वीरान में पड़े रहते हैं और अकेले पड़े रहते हैं अकेले पड़े रहते हैं और अकेले चले जाते हैं उनकी मारपीट हो जाए तो और कोई छीन ले तब और कोई सिर काट डाले तब कुछ भी हो सकता है हिम्मत तो हिम्मत हिम्मत के आधार पर  डाकू से लेकर के चोर तक और जेब कटों से लेकर के बेईमानों तक सब हिम्मत के आधार पर यह रोज दूस्साहस करते हैं और कमा करके लाते हैं यह बेटे साहस है तू समझता नहीं है क्या साहस यही साहस है आगे जाकर के आध्यात्मिक जीवन में जब प्रवेश हो जाता है तो सारी दुनिया एक ओर रहती है और एक ओर हिम्मतवाला आदमी एक ओर रहता है 

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



मनुष्य जब तक जीवित रहता है सर्वदा कार्य में संलग्न रहता है, चाहे कार्य शुभ हो या अशुभ। कुछ न कुछ कार्य करता ही रहता है और अपने कर्मों के फलस्वरूप दुःख सुख पाता रहता है, बुरे कर्मों से दुःख एवं शुभ कर्मों से सुख।

जब हम ईश्वर की आज्ञानुसार कर्म करते हैं तो हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है क्योंकि वे कार्य शुभ होते हैं परन्तु जब हम उनकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं तभी दुःखी होते हैं, दुःख से छुटकारा पाने के लिये हमें सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम बुराइयों से बचें।

 ईश्वर आज्ञा देता है कि “हे मनुष्यों! इस संसार में सत्कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। सत्कर्म में कभी आलसी और प्रमादी मत बनो, जो तुम उत्तम कर्म करोगे तो तुम्हें इस उत्तम कर्म से कभी भी दुःख नहीं प्राप्त हो सकता है। अतः शुभ कार्य से कभी वंचित न रहो।” हम लोगों का सबसे बढ़कर सही कर्त्तव्य है कि हम मन को किसी क्षण कुविचारों के लिए अवकाश न दें क्योंकि जिस समय हमें शुभ कर्मों से अवकाश मिलेगा उसी समय हम विनाशकारी पथ की ओर अग्रसर होंगे।                 

 मनुष्य का जीवन इतना बहुमूल्य है कि बार-बार नहीं मिलता, यदि इस मनुष्य जीवन को पाकर हम ईश्वर की आज्ञा न मानकर व्यर्थ कर्मों में अपने समय को बरबाद कर रहे हैं तो इससे बढ़कर और मूर्खता क्या है? इससे तो पशु ही श्रेष्ठ है जिनसे हमें परोपकार की तो शिक्षा मिलती है।

 हमारे जीवन का उद्देश्य सर्वदा अपनी तथा दूसरों की भलाई करना है। क्योंकि जो संकुचित स्वार्थ से ऊंचे उठकर उच्च उद्देश्यों के लिए उदार दृष्टि से कार्य करते हैं वे ही ईश्वरीय ज्ञान को पाते हैं और वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कर्मों को करते हुए आनन्द को उपलब्ध करते हैं। जो प्रत्येक जीव के दुःख को अपना दुःख समझता है तथा प्रत्येक जीव में आत्मभाव रखता है अथवा परमपिता परमात्मा को सदैव अपने निकट समझता है वह कभी पाप कर्म नहीं करता जब पाप कर्म नहीं तो उसका फल दुःख भी नहीं। इसलिए हमें सदा ईश्वर परायण होना चाहिए और सद्विचारों में निमग्न रहना चाहिए जिससे मानव जीवन का महान लाभ उपलब्ध किया जा सके।

अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 19
 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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