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Tuesday 22, July 2025

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अमृतवाणी:- बेटा तू भलमनसाहत का रास्ता चुनना | Beta Tu Bhalmansahat Ka Rasta Chunna पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृतवाणी:- बेटा तू भलमनसाहत का रास्ता चुनना | Beta Tu Bhalmansahat Ka Rasta Chunna पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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शरीर और मन से संवाद | ध्यान कैसे करें। ध्यान करने का सही तरीका। The Right Way Of Meditation

शरीर और मन से संवाद | ध्यान कैसे करें। ध्यान करने का सही तरीका। The Right Way Of Meditation

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 22 July 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी: हिम्मत और आत्मविश्वास का महत्व पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



समर्थ गुरु रामदास की शादी होने लगी शादी होने लगी उन्होंने कहाँ अरे हमको जिंदगी अच्छे काम के लिए व्यतीत करनी है और यह कौन सलाह देगा सलाहकार सारे के सारे एक ओर कौन मौसी-मौसा, नानी-नाना, दादी-दादा सब एक कोने पर खड़े रहे और समर्थ गुरु रामदास ने कहा अगर अपनी जिंदगी जिंदगी से मुझे कुछ महत्वपूर्ण काम करना है यह पिल्ली-पिल्ले, पिल्ली पिल्ले, पिल्ली-पिल्ले, पिल्ली-पिल्ले, रोज हरण के रखूगा कि इन पिल्ली-पिल्ले, को संभाल लूंगा कि समाज और देश को संभाल लूंगा बस समर्थ गुरु रामदास को ख्याल आ गया ख्याल आ गया और वो छलांग मार करके उछल करके  यह गए और यह गए पकड़ना पकड़ना यह कपास के खेत में और गन्ने के खेत में वो भाग गए क्या है बेटे हिम्मत तेरे भीतर हिम्मत है तेरे भीतर कोई सिद्धांतों और आदर्शों को पूरा करने के लिए रोज विचार करता है रोज काँप जाता है रोज विचार करता है रोज काँप जाता है हिम्मत के धनी चाहे वो डकैत हो चाहे वो समर्थ गुरु रामदास हो हिम्मत के धनी चाहे वो शंकराचार्य हो अथवा वो अथवा कोई और हो चाहे वो नेपोलियन बोना पार्ट हो सफलता हिम्मत के ऊपर टिकी हुयी है और हिम्मत को मैंनेे प्राणमय कोष के आधार पर आपको समझाने की कोशिश की थी आध्यात्म की भाषा में इन चीजों के अच्छे अच्छे और रहस्यमय नाम बता दिए है प्राण क्या होता है बेटे इसी को प्राण कहते  इसका नाम है साहस और हिम्मत मैंने आपको बताया था हमारा प्राणमय कोष अर्थात हिम्मतवाला  शरीर हिम्मतवाला शरीर हिम्मतवाला शरीर तांतिया डाकू जिन दिनों मे मैं जेल खाने में था तांतिया डाकू का बड़ा बवाल हुआ और 150 वर्ष की जेल हुई 150 साल की जेल हुई थी तांतिया डाकू को हम भी देखेंगे उन्होंने जेलर ने एक दिन कह दिया कि भाई तांतिया डाकू 150 वर्ष की जेल  के लिए जेल खाने में आया है हमको दिखा दीजिए साहब हमको दिखा दीजिए कइयों ने आग्रह किया अच्छा जेल खाने में दिखाएंगे कैदियों को एक दिन जेलर ने इक दिन कर लिया और यह  तांतिया नाम कुछ और था उसका तांत किसे जानते है न आप तात रुयी धुन्ने में काम आती है दुबली पतली होती है ऐसा ही दुबला पतला था हड्डियां निकल रही थी और ऐसा ही लंबा लंबा  सा बांस जैसा दुबला दुबला सा था तांतिया डाकू यही है इसने सैकड़ो डकैती डाले और जिसने जाने  क्या किया जाने किया सब लोगों ने कहा साहब यह नहीं है इस बेचारे पर गरीब पर तो कुछ नहीं है किसी ने ऐसे ही मुकदमा चला दिया यह कातिया नहीं हो सकता हैै इतने बड़े काम और कमाल कैसे कर सकता है कातिया डाकू ने कहा हुजूर अगर थोड़ी देर के लिए मुझे हुकुम दे दे और मेरी हथकड़ी खोल दें तो मैं अपना कमाल दिखा सकता हूं कमाल दिखाइए आप,क्या दिखाएंगे  हाथ खोल देंगे देखा कि चारों तरफ जेलखाना है इतनी बड़ी दीवारेन है यह क्या कमाल दिखाएगा बंदूक ही बंदूक बंदूक वाले सिपाही सब खड़े हैं यह क्या कमाल दिखाएगा दिखाइए बस जिस तरीके से  मौत के कुएं में मोटर गाड़ी मोटरसाइकिल चलती चली जाती है और चली जाती है ऐसे ही वह भागता हुआ चला गया और 12 फुट ऊंची वाली दीवाल के डंडे पर जाकर के जा बैठा डंडे पर जा  बैठा और यह बोला उधर से बताइए हुजूर इधर को आऊं के उधर को आऊं जेलर ने कहा इधर को ही आ जाइये उधर को मत जाइये उधर आपके लिए भी जोखिम है और हमारे लिए तो है ही दोनों के लिए जोखिम है इसलिए आपका भी भला इसी में है हमारा भला इसी में है कि आप इधर ही आ कूद के इधर आ गया कातिया डाकू यह बेटे क्या चीज है यह कमाल किसी में भी हो सकता है किसी में भी हो सकता है आप में भी हो सकता है अगर आप के भीतर हिम्मत हो तब हिम्मत नहीं है वास्तव में शरीर की गलती नहीं है असल में कमी है आपकी हिम्मत की |

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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अखण्ड-ज्योति से



मन को वश में रखने के लिए अध्यात्म प्रसंगों में सदा कहा और दुहराया जाता है। पर यह नहीं बताया जाता कि यह किस प्रकार किया जाय? इसलिए ध्यान, प्राणायाम जैसी विधियाँ बताई जाती हैं। पर देखा गया है कि उन विधाओं को अपनाने पर भी मन एकाग्र नहीं होता, पकड़-पकड़ कर बिठाने पर भी मेंढक की तरह उछल जाता है। क्षण भर का अवसर मिलते ही कहीं से कहीं पहुँचता है। इस पकड़-धकड़ में प्रयत्नकर्ता ही थकता है। मन का तो स्वभाव ही ठहरा। वह पवन की तरह एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। पखेरू की तरह उसकी उड़ते रहने जैसी आदत जो है। हिरन को पकड़कर बाँधना उसे हाथ-पाँव तोड़ लेने के लिए बाधित करता है।

  मन रस की खोज से मारा मारा फिरता है। उसे उसी की लगन और ललक है। कस्तूरी के हिरन को उस गंध के प्रति अत्यधिक लगाव होता है उसी को खोजने के लिए पाने के लिए वह लालायित होता है। जिधर भी मुँह उठता है, उधर ही दौड़ पड़ता है। यह भाग दौड़ तब तक जारी रहती है जब तक कि उसे गंध के उद्गम का पता नहीं चल जाता।

 मन को सरसता चाहिए। ऐसी स्थिति जिसमें रसास्वादन का अवसर मिले। आनन्द की अनुभूति हो। नीरस क्रिया-कलापों में उसे रुचि नहीं हो पाती इसलिए वह अपना अभीष्ट तलाशने दूसरी जगह चल पड़ता है। तितलियाँ, भौंरे जहाँ-तहाँ उड़ते फिरते हैं पर जब उन्हें सुगंध भरे फूल मिल जाते हैं तब शान्ति के साथ स्थिरतापूर्वक बैठ जाते हैं और प्रमुदित होकर समय गुजारते हैं फिर उन्हें उचटने उखड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। यहाँ बंधन उसके लिए कारगर होता है कि जिसकी तलाश है उसे उपलब्ध करा दिया जाय।

 डोरी से जकड़ने पर तो पशु भी अपने हाथ-पैर तुड़ा लेते हैं। विवशता में ही कोई कैद में रहना स्वीकार करता है। हथकड़ी-बेड़ी बैरक, तालों, संतरी आदि की व्यवस्था न हो तो कोई कैदी जेल में रहना स्वीकार न करे। खिड़की खुलते ही तोता पिंजरे से निकल भागता है और फिर पीछे की ओर देखत तक नहीं। यही बात मन के संबंध में भी कही जा सकती है। उसे नीरसता पसंद नहीं, सहन नहीं। इसलिए उसे जिस तिस खूँटे में बाँधने पर भी स्थिरता अपनाते नहीं बनती। उसे उन्मुक्त आकाश के मनोरम दृश्य देखने का चाव जो है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर

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