Wednesday 23, July 2025
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
सांसारिक जीवन की सफलताएं पानी हो अगर आपको तो इन तीनों को ठीक करना पड़ेगा आप शरीर की दृष्टी से संयमित होना पड़ेगा और अपने हिम्मत की दृष्टी से साहसी होना पड़ेगा और और मानसिक दृष्टी से अपने कामो में तन्मय हो जाने वाला और जिम्मेदार और ईमानदार आदमी होना पड़ेगा इतना आप काम कर सकते हो तो आपको हर काम में सफलता मिलेगी हर काम में सफलता मिलेगी बाटा का नाम मैंने आपको लिया था वेस्टएंड वाच कंपनी का मैं कभी-कभी नाम लिया करता हूं इसका शेयर किसी जमाने में सौ रुपए का था अब दो हजार रुपए का शेयर है वह 20 गुना ज्यादा मुनाफा कमाती है वह कंपनी इसलिए कमाती है कि उसने ईमानदारी और मशक्कत के साथ में ध्यान देने के बाद में ध्यान रखा है दूसरे घड़ियां बनाने वाले ऐसे ही उल्टी पुल्टी घड़ियां बनाकर बेंच देते हैं कोई ठिकाना नहीं है न जाने फास्ट चलेगी कि तेज चलेगी स्टैंड वाच कंपनी के अफिस में दीवारों पर घड़ियां टंगी रहती हैं और एक 24 घंटे में एक सेकंड का भी फर्क पाया जाता है तो घड़ियां उतार ली जाती हैं और ठीक करने भेज दी जाती फिर जब ठीक हो जाती हैं फिर दोबारा दीवारों पर टांग दी जाती है 24 घंटे में फिर भी एक सेकंड का फर्क पाया जब तक वह कंपनी को सौ बार सौ बार घड़ी होगी टेस्ट और जब तक वह बिल्कुल 100 फीसदी सही नहीं होगी वह रिलीज नहीं की जाएगी यह विश्वास यह ईमानदारी और यह जिम्मेदारी ईमानदारी और जिम्मेदारी आपके पास हो तो आप ज्यादा भी मुनाफा कमा ले चलिए, चलिए मै यह भी मानता हूं तो भी आदमी कोई मना करने वाला नहीं है कंपनी के लिए लोग खड़े रहते है भाई स्टेंड वाच कंपनी की घड़ी कब आवेगी साहब कोई कोटा थोड़ा है इस महीने मे तो नहीं आई है अगले महीने मे आपका नाम नोट किए लेते है आप अगले महीने पता लगा लेना आ जाएगी तो आपको भी दे देंगे हर डीलर यह कहता है क्या मतलब है क्या मतलब है मतलब यही है बेटे जैसा कि आदमी काम में अपनी जिम्मेदारी और तनमय्यता को आप मिला सकते हो तो आप देखिए कमाल देखिए गजब देखिए सिद्धियां देखिए चमत्कार सिद्धि चमत्कार सिद्धि चमत्कार यही चमत्कार है और यही सिद्धि है और क्या चमत्कार है चमत्कार और सिद्धि लौकिक जीवन भौतिक जीवन में अन्नमय कोष मनोमय कोष प्राणमय कोष यह तीन कोष है जो आदमी को सांसारिक सफलताएं दिया करते हैं दो कोष ऐसे हैं जिसको हम आध्यात्मिक कोष कह सकते हैं जिसको जिसका नाम जिसका नाम विज्ञानमय कोष है और जिसका नाम आनंदमय कोष है यह वह है जो आदमी को मनुष्य से देवता बनाते हैं मनुष्य से भगवान बनाते हैं और मनुष्य का स्तर अवतार जैसा ऋषि जैसा देवात्मा जैसा महामानव जैसा बना देते हैं और ऐसा बना देते हैं कि भगवान उसके ऊपर छाया करते हुए चलते हैं बाडीगार्ड के तरीके से आगे आगे साथ-साथ चलते हैं पायलट की तरीके से आगे आगे चलते हैं और शरीर रक्षक के तरीके से अंगरक्षक के तरीके से पीछे चलते हैं ऐसे चलते हैं पी ए और सेक्रेटरी के तरीके से चलते हैं जैसे मिनिस्टरों के यह सेक्रेटरी चलते हैं दाएं बाएं दाएं बाएं उस तरीके से चलते हैं और बाडीगार्ड के तरीके से पीछे पीछे चलते हैं और अंगरक्षक के तरीके से बेटे वह पायलट की तरीके से आगे आगे चलते हैं चारों तरफ भगवान चलते हैं
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
मन का वश में करने के अनेकानेक लाभ हैं। वह शक्तियों और विभूतियों का पुँज है। जिस काम में भी लगता है उसे जादुई ढंग से पूरा करके रहता है। कलाकार, वैज्ञानिक, सिद्धपुरुष, महामानव, सफल सम्पन्न सभी को वे लाभ मन की एकाग्रता, तन्मयता के आधार पर मिले हुए होते हैं। इस तथ्य को जानने वाले इस कल्पवृक्ष को दूर रखे रहना नहीं चाहते। इस दुधारू गाय को, तुर्की घोड़े को पालने का जी सभी का होता है। पर वह हाथ आये तब न?
आमतौर से कामुकता, जिह्वा स्वाद, सैर-सपाटे विलास वैभव, यश, सम्मान पाने की सभी की इच्छा होती है। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ होती हैं। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ करता और उड़ाने उड़ता रहता है। विकल्प जब दूसरा नहीं दिखता तो उसी कुचक्र में उलझे रहना पड़ता है। जहाज के मस्तूल पर बैठे कौवे को कोई और गन्तव्य भी तो नहीं दीखता। मन को कहीं कोई ऐसा स्थान या ऐसा काम जो उसकी रुचि का हो, सुहाये, मिलना चाहिए।
रुचियाँ बदलती रहती हैं या बदली जा सकती हैं छोटे बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं। कुछ बड़े होने पर सामर्थ्यों के साथ खेल खिलवाड़ के लिए उत्सुक रहते हैं। युवक होने पर अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने की लगन लगती है। तरुण होने पर धन कमाने-गृहस्थ बनने की इच्छा होती है। बूढ़े भजन करते और कथा सुनते हैं। बचपन में बढ़ी हुई स्फूर्ति हर घड़ी कुछ न कुछ करते रहने की उमंग करती रहती थी पर बूढ़े होने पर विश्राम करना और चैन से दिन काटना सुहाता है। यह परिवर्तन बताते हैं कि मन का कोई एक निश्चित रुचि केन्द्र नहीं है। व्यक्तित्व के विकास और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ वह अपना रुझान बदलता रहता है। जमीन के ढलान के अनुरूप नदी-नाले अपनी दिशा मोड़ते और चाल बदलते रहते हैं।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1990 नवम्बर
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