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Monday 20, January 2025

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गायत्री शक्तिपीठ अयोध्या जिसका भूमि पूजन 1981 में परम पूज्य गुरुदेव द्वारा किया गया |

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विवेकानन्द ने शिष्यगणों को कैसे समझाया गुरु का संदेश ?

विवेकानन्द ने शिष्यगणों को कैसे समझाया गुरु का संदेश ?

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अनुवांशिक गुणों का शरीर पर प्रभाव : हमारे शरीर के रहस्यमय घटक जीन्स | गायत्री की पंचकोशी साधना

अनुवांशिक गुणों का शरीर पर प्रभाव : हमारे शरीर के रहस्यमय घटक जीन्स | गायत्री की पंचकोशी साधना

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शिव गायत्री मंत्र | Shiv Gayatri Mantra | कल्याण-शक्ति अनिष्ट का विनाश, कल्याण की वृद्धि, निश्चयता

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हिरण्याक्ष का वध करने के उपरान्त भी जब भगवान वाराह अपने लोक को वापिस नहीं लौटे तो वहाँ चिन्ता होने लगी। देवता व्याकुल हुये और शंकर जी को उन्हें तलाश करने भेजा गया।
शंकर जी ने भू लोक में उन्हें सर्वत्र खोज डाला। देखा तो वे अपना परिवार बनाये बैठे हैं। स्त्री-बच्चों के समक्ष क्रीड़ा संलग्न हो रहे हैं। शूकरी और उसके शिशु शावक उन्हें अपना विनोद साधन बनाये हुये हैं।
वापस ब्रह्मलोक चलने की प्रार्थना जब वाराह जी ने अस्वीकार कर दी और अपना क्रीड़ा विनोद छोड़ने को तैयार न हुए तो क्रुद्ध शंकर जी ने त्रिशूल से उनका पेट फाड़ डाला। शरीर क्षत-विक्षत हो गया तो विवश होकर वाराह भगवान अपने लोक जा पहुँचे।
प्रतीक्षा में चिन्तित बैठे देवताओं ने जब विलम्ब का कारण पूछा तो उनने कहा - “शरीर और उसकी ममता बड़ी प्रबल है। जीवधारी उसी में लिप्त होकर लक्ष को भूल जाते हैं, सुख साधनों के छूटे बिना उस माया से छुटकारा नहीं मिलता। अन्य शरीर धारियों की तरह मेरी भी दुर्गति हुयी। शंकर जी ने उस माया को विदीर्ण न किया होता तो मेरे लिए भी वापस लौटना कठिन था।
शिवजी हँस पड़े, उनने कहा-देवताओं! अब तुम समझे होंगे कि मेरे विरक्त विचरण का रहस्य क्या है। आसक्ति के बंधनों में बंधे हुये जीव, त्याग का आधार न लें तो उनका छुटकारा भी सम्भव नहीं। आसक्ति ग्रस्त वाराह जी की जब यह दुर्गति हुई तो दूसरों के बारे में कहना ही क्या है?

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★ जिन्हें कुछ करना होता है वे घोर व्यस्तता के बीच भी अपने प्रिय प्रसंग के लिए कुछ कर गुजरने के लिए सहज ही अवसर प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ तक कि दरिद्रता, रुग्णता, व्यस्तता से लेकर समस्याओं के जाल जंजाल तक के कुछ न कुछ करते रहने में बाधक नहीं बन सकते। ऐसे भावनाशीलों की कमी नहीं जो उलझनों और कठिनाइयों से निपटने की तरह ही अन्तरात्मा की, महाकाल की युग पुकार की-गरिमा स्वीकार करते हैं और उसे सर्वोपरि समस्या आवश्यकता मानते हैं।

★ प्रयासों में प्रमुखता सदा उन्हें मिलती है जिन्हें अंतःकरण द्वारा महत्वपूर्ण माना जाता है। युग प्रकार यदि महत्वहीन समझी गई है तो सहज ही उसके लिए आजीवन फुरसत न मिलने की मनःस्थिति और परिस्थिति बनी रहेगी। श्रद्धा उमंगी भी तो हजार उपाय ऐसे निकल जावेंगे जिनके आधार पर निर्वाह की समस्याओं को हल करते रहने के साथ-साथ ही प्रस्तुत युग धर्म के आहृ के लिए भी इतना कुछ किया जा सकता है जिससे आत्म संतोष और लोक श्रद्धा को अभीष्ट मात्रा उपलब्धि होती रहे।

★ युग विकृतियों का एक ही कारण है जन मानस में आदर्शों के प्रति अनास्था का बढ़ जाना। इस सड़ी कीचड़ से ही असंख्यों कृमि कीटक उपजते हैं और समस्याओं तथा विभीषिकाओं के रूप में जन जन को संत्रस्त करते हैं। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का एक ही उपाय है-जन मानस का परिष्कार। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को स्थान मिल सके तो लोक प्रवाह में सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य दीखेगा। ऐसी दशा में युग संकट के कुहासे को दूर होते देर न लगेगी। समस्या दार्शनिक है। आर्थिक, राजनैतिक या सामाजिक नहीं। जन मानस को परिष्कृत किया जा सके तो प्रस्तुत विभीषिकाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। उनसे लड़ने की लम्बी चौड़ी तैयारी करने की आवश्यकता ही न रहेगी।

★ मनुष्य को ध्वंस के विरत करने के-सुजन में से लागू होने के लिए सहन किया जा सके तो बड़े पैमाने पर जो खर्चीली योजनाएं बन रहीं है। उनमें से एक भी आवश्यकता न पड़ेगी। जन के बूँद बूँद प्रयासों से इतना कुछ अनायास ही होने लगेगा जिस पर सैकड़ों पंच वर्षीय सृजन योजनाओं को निछावर किया जा सकेगा। इसके विपरीत जन सहयोग के अभाव में बड़ी से बड़ी खर्चीली योजनाएं अपंग बनकर रह जाती है। हमें पत्तों पर भटकने के स्थान पर जड़ सींचने का प्रयत्न करना चाहिए। जन मानस का परिष्कार ही सामयिक समस्याओं का एक मात्र हल है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का लक्ष्य इस एक ही राज मार्ग पर चलते हुए निश्चित रूप से पूर्ण हो सकता है। ज्ञान यज्ञ का युग अनुष्ठान इसी निमित्त चल रहा हैं। विचार क्रान्ति की लाल मशाल का प्रज्वलन इसी विश्वास के साथ हुआ है कि जन-जन के मन-मन में उत्कृष्टता की आस्थाओं का आलोक उत्पन्न किया जा सके।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति- फरवरी १९७९, पृष्ठ ५४

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जनमानस का परिष्कार धर्मतंत्र के मंच से | Janmanas Ka Parishkar

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काम के प्रति समर्पण | Kam Ke Prati Samrpan

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अमृतवाणी:- व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण | Pt Shriram Sharma Acharya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 20 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



हमारा धर्म जिंदा है, और जिंदा अवस्था में, जीवित अवस्था में, दो बहम मनुष्यों के ऊपर हावी हो गए हैं। पहला बहम यह कि हमको थोड़ा बहुत पूजा-पाठ करने से, या कीर्तन या बाबा जी का कोई हाथ-पांव जोड़ने से माला वाला पहनाने से हमारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। हमको किसी संत बाबा जी की खुशामद करनी चाहिए, या देवी देवता की खुशामद करनी चाहिए। देवी देवता या संत बाबा की खुशामद करने के बाद हमारी वह व्यक्तिक समस्याएं और कठिनाइयों से दिक्कतों से स्वयं परेशान और हैरान हो रहे हैं, उन सब का समाधान निकाल सकते हैं। यह बहम आदमी के ऊपर हावी हो गए हैं, और इसलिए संत महात्मा जिंदा हैं, और यह बहम दुनिया में चलता रहेगा। तो आप देखेंगे, इस तरह का जो भी है धर्म और जो कोई संत बाबा जी हैं, उनमें 99 फीसदी है झाग की तरीके से बैठ जाएंगे। यह खत्म हो जाएंगे, क्योंकि संत बाबा जी के पास जो विशेषता है, उनके लिए कोई है ही नहीं। उनके पास संतो को जो काम करना चाहिए, वह कर ही नहीं रहे हैं। यह सारे के सारे संत केवल इस चीज के ऊपर जिंदा हैं कि आदमी का यह बहम, इतनी गहराई तक घुसा हुआ पड़ा है कि संत बाबा जी हमारी समस्या का हल कर देगा।

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



परिवार निर्माणः

(१) परिवार को अपनी विशिष्टताओं को उभारने का अभ्यास करने एवं परिपुष्ट बनाने की प्रयोगशाला, पाठशाला समझे। इस उद्यान में सत्प्रवृत्तियों के पौधे लगाये। हर सदस्य को स्वावलम्बी सुसंस्कारी एवं समाजनिष्ठ बनाने का भरसक प्रयत्न करें। इसके लिए सर्वप्रथम ढालने वाले साँचे की तरह आदर्शवान बने ताकि स्वयं कथनी और करनी की एकता का प्रभाव पड़े। स्मरण रहे साँचे के अनुसार ही खिलौने ढलते हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व में सर्वप्रथम है संचालक का आदर्शवादी ढाँचे में ढलना। दूसरा है माली की तरह हरे पौधे का शालीनता के क्षेत्र में विकसित करना।
    
(२) परिवार की संख्या न बढ़ायें। अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। इसमें जननी का स्वास्थ्य, सन्तान का भविष्य, गृहपति का अर्थ सन्तुलन एवं समाज में दारिद्र्य, असन्तोष बढ़ता है। दूसरों के बच्चे को अपना मानकर उनके परिपालन से वात्सल्य कहीं अधिक अच्छी तरह निभ सकता है। लड़की- लड़कों में भेद न करें। पिछली पीढ़ी और वर्तमान के साथियों के प्रति कर्तृत्व पालन तभी हो सकता है, जब नये प्रजनन को रोकें। अन्यथा प्यार और धन प्रस्तुत परिजनों का ऋण चुकाने में लगने की अपेक्षा उनके लिए बहने लगेगा, जिनका अभी अस्तित्व तक नहीं है। इसलिए उस सम्बन्ध में संयम बरतें और कड़ाई रखें।

(३) संयम और सज्जनता एक तथ्य के दो नाम हैं। परिवार में ऐसी परम्पराएँ प्रचलित करें जिसमें इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का अभ्यास आरम्भ से ही करते रहने का अवसर मिले। घर में चटोरेपन का माहौल न बनाया जाये। भोजन सात्विक बने और नियत समय पर सीमित मात्रा में खाने का ही अभ्यास बने। कामुकता को उत्तेजना न मिले, सभी की दिनचर्या निर्धारित रहे। समय के साथ काम और मनोयोग जुड़ा रहे। किसी को आलस्य- प्रमाद की आदत न पड़ने दी जाय और न कोई आवारागर्दी अपनाये व कुसंग में फिरे। फैशन और जेवर को बचकाना, उपहासास्पद माना जाय, केश विन्यास और अश्लील, उत्तेजक पोशाक कोई न पहनें और न जेवर आभूषणों से लदें। नाक, कान छेदने और उनके चित्र- विचित्र लटकन लटकाने का पिछड़ेपन का प्रतीत फैशन कोई महिला न अपनाये।  
   

(४) पारिवारिक पंचशीलों में श्रमशीलता, मितव्ययिता, सुव्यवस्था, शालीन शिष्टता और उदार सहकारिता की गणना की गयी है। इन पाँच गुणों को हर सदस्य के स्वभाव में कैसे सम्मिलित किया जाय। इसके लिए उपदेश देने से काम नहीं चलता, ऐसे व्यावहारिक कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं, जिन्हें करते रहने से वे सिद्धान्त व्यवहार में उतरें।
    
(५) उत्तराधिकार का लालच किसी के मस्तिष्क में नहीं जमने देना चाहिए, वरन् हर सदस्य के मन मे यह सिद्धान्त जमना चाहिए कि परिवार की संयुक्त सम्पदा में उसका भरण- पोषण, शिक्षण एवं स्वावलम्बन सम्भव हुआ है। इस ऋण को चुकाने में ही ईमानदारी है। बड़ों की सेवा और छोटों की सहायता के रूप में यह ऋण हर वयस्क स्वावलम्बी को चुकाना चाहिए। कमाऊ होते ही आमदनी जेब में रखना और पत्नी को लेकर मनमाना खर्च करने के लिए अलग हो जाना प्रत्यक्ष बेईमानी है। उत्तराधिकार का कानून मात्र कमाने में असमर्थों के लिए लागू होना चाहिए, न कि स्वावलम्बियों की मुफ्त की कमाई लूट लेने के लिए। अध्यात्मवाद और साम्यवाद दोनों ही इस मत के हैं कि पूर्वजों की छोड़ी कमाई को असमर्थ आश्रित ही तब तक उपयोग करें जब तक कि वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते।

.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

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