Sunday 19, January 2025
इन दिनों की लोक रुचि घटिया मनोरंजन साहित्य पढ़ने भर की है इस कारण स्वाध्याय से चिन्तन को मिलने वाला पौष्टिक तत्व तो नहीं, उल्टे मनोभूमि में निकृष्टता बढ़ती जाती है।* जहाँ तहाँ पुस्तकालय भी है, पर वह साहित्य अलमारियों में ही बन्द सड़ता रहता है। *युग निर्माण साहित्य का सृजन मनो संस्थानों में व्याप्त कुविचारों के परिमार्जन के टानिक के रूप में गढ़ा गया है, पर उसकी उपयोगिता तब है जब यह साहित्य जन जन तक पहुँचे। चल पुस्तकालय अथवा ज्ञान रथ इस आवश्यकता को पूरा करेंगे।
ज्ञान रथ प्रत्येक शाखा के पास हो। उतरे साइकिल या रिक्शे के पहियों से एक धकेल सस्ते में बना ली जाये। उसे आकर्षक बनाने के लिये सजाया भी जा सकता है।* इसी में युग निर्माण साहित्य तथा पत्रिकाओं की जिल्द बँधी पुरानी प्रतियाँ रहे। इन्हें लेकर गली गली मुहल्ले मुहल्ले जाया जाये तथा लोगों को आग्रह पूर्वक पढ़ने को यह साहित्य दिया जाए। एक कापी में उनके नाम नोट रहे। अगले सप्ताह उनसे वापिस लेने और नई पुस्तकें देने का क्रम बना रहे। विक्रयार्थ साहित्य भी रखा जा सकता है। *सहायक आजीविका के रूप में या किसी बेकार व्यक्ति को थोड़ा वेतन देकर भी धकेले चलाई जा सकती है। इससे हुई छोटी आय से उस व्यक्ति का काम चल जायेगा। लोगों को इस साहित्य की उपयोगिता भी समझाई जा सके। तो यह धकेल सोने में सुगन्ध की कहावत चरितार्थ कर सकती है।
तीर्थ यात्रा धर्म प्रचार फेरी-
★ *युग निर्माण परिवार के लिए ऐसी तीर्थ यात्राओं का प्रचलन करना चाहिए, जिसमें परिजन टोलियाँ बनाकर समीपवर्ती गाँवों में जाया करे, रास्ते में आदर्श वाक्य लेखन करे, दिन में जनसंपर्क और रात्रि को विचार गोष्ठी या छोटे से यज्ञायोजन के लिये आमंत्रण देना।* भजन कीर्तन तथा प्रभात फेरियों का क्रम रखा जा सकता है। और सायंकाल जाकर रात्रि में विचार गोष्ठी दूसरे दिन एक छोटा सा आयोजन भी सम्पन्न किया जा सकता है। *यात्रा टोलियाँ अवकाश के दिनों का तो इस पुण्य प्रयोजन में उपयोग करे ही। पीले वस्त्र, नियत झोला तथा अपने मिशन की परिचय सामग्री लेकर चला जाये तो अपना उद्देश्य अधिक सार्थक होगा ।
*यह कार्य सदस्यों के ज्ञान घट की संचित राशि, उदारमना व्यक्तियों के सहयोग और चंदे से संग्रहित पूँजी-किसी भी प्रकार से सम्पन्न किये जा सकते हैं, पर इनकी उपयोगिता और उपादेयता को असंदिग्ध मानकर यह कार्य क्रम प्रत्येक शाखा को सम्पन्न करने ही चाहिए।*
पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५६*
*प्रयागराज महाकुम्भ 51 कुंडीय यज्ञ में तैयार हुई दिग्दर्शन प्रदर्शनी
अपनों से अपनी बात में गुरुदेव ने क्या कहा ?*
क्या स्वर्ग और नरक इसी संसार में मौजूद है, Kya Swarg Aur Nark Es Sansar Mai Maujud Hai*
*हमारे तीन शत्रु लोभ, मोह, अहंकार | Hamare Ten Shatru Lobh, Moh, Ahankaar
अमृतवाणी:- प्रज्ञायोग की साधना | Pragya Yog Ki Sadhana
सत्यम् शिवम् सुंदरम् अध्यात्म की सीढ़ियाँ | Satyam Shivam Sundram Adhyatam Ki Sidhiyan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 19 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक Akhand Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) एवं चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 19 January 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 19 January 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 19 January 2025 !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 19 January 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर #Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 19 January 2025 !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 19 January 2025 !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 19 January 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
बालकपन वह अवस्था है, जिसमें संवेदनशीलता रहती है, और आदमी गृहस्थ हो जाता है, पीछे तो पक्का हो जाता है। पकने के बाद तो उसमें से कठोर हो सकता है, उसमें हेरफेर हो तो सकता है, बहुत ज्यादा हेरफेर नहीं होता। तो क्या करना पड़ेगा हमको? हमको अपने देश के बच्चों पर ध्यान देना पड़ेगा। इसलिए कि हमारा राष्ट्र और हमारा विश्व, और हमारा यह धर्म और हमारी संस्कृति अपने आप में सम्मिलित होने चले और सम्मिलित हो चले। इसके लिए हमको बहुत मेहनत करने की जरूरत है, और हमको बहुत परिश्रम करने की जरूरत है। कल मैंने आपसे यह कहा था, जहां कहीं भी हम लोगों को वानप्रस्थों को जाना पड़ेगा, वहां हमको एक नया क्षेत्र जरूर तलाश करना चाहिए। भले से वहां निमंत्रण दिया गया न हो। लोगों को, जहां कहीं से भी आपको निमंत्रण दिया जाएगा, और जहां कहीं भी आपको बुलाया जाएगा, वह पहले धार्मिक क्षेत्र होगा। धर्म के, धर्म के क्षेत्र में दो बहम हिंदुस्तान में बहुत गहराई तक घुसते चले गए। एक बहम यह कि हमको मरने के बाद में स्वर्ग मिलेगा, और हमको मुक्ति मिलेगी। यह बहम बहुत गहराई तक घुसा पड़ा हुआ पड़ा है।
अखण्ड-ज्योति से
व्यक्तित्व का विकास
(१) प्रातः उठने से लेकर सोने तक की व्यस्त दिनचर्या निर्धारित करें। उसमें उपार्जन, विश्राम, नित्य कर्म, अन्यान्य कामकाजों के अतिरिक्त आदर्शवादी परमार्थ प्रयोजनों के लिए एक भाग निश्चित करें। साधारणतया आठ घण्टा कमाने, सात घण्टा सोने, पाँच घण्टा नित्य कर्म एवं लोक व्यवहार के लिए निर्धारित रखने के उपरान्त चार घण्टे परमार्थ प्रयोजनों के लिए निकालना चाहिए। इसमें भी कटौती करनी हो, तो न्यूनतम दो घण्टे तो होने ही चाहिये। इससे कम में पुण्य परमार्थ के, सेवा साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारिता स्वभाव का अंग बनती है और न व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।
(२) आजीविका बढ़ानी हो तो अधिक योग्यता बढ़ायें। परिश्रम में तत्पर रहें और उसमें गहरा मनोयोग लगायें। साथ ही अपव्यय में कठोरता पूर्वक कटौती करें। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त समझें। अपव्यय के कारण अहंकार, दुर्व्यसन, प्रमाद बढ़ने और निन्दा, ईर्ष्या, शत्रुता पल्ले बाँधने जैसी भयावह प्रतिक्रियाओं का अनुमान लगायें। सादगी प्रकारान्तर से सज्जनता का ही दूसरा नाम है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह ही अभीष्ट है। अधिक कमाने वाले भी ऐसी सादगी अपनायें जो सभी के लिए अनुकरणीय हो। ठाट- बाट प्रदर्शन का खर्चीला ढकोसला समाप्त करें।
(३) अहर्निश पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाले विचार ही अन्तराल पर छाये रहते है। अभ्यास और समीपवर्ती प्रचलन मनुष्य को वासना, तृष्णा और अहंकार की पूर्ति में निरत रहने का ही दबाव डालता है। सम्बन्धी मित्र परिजनों के परामर्श प्रोत्साहन भी इसी स्तर के होते हैं। लोभ, मोह और विलास के कुसंस्कार निकृष्टता अपनाये रहने में ही लाभ तथा कौशल समझते हैं। ऐसी ही सफलताओं को सफलता मानते हैं। इसे एक चक्रव्यूह समझना चाहिये। भव- बन्धन के इसी घेरे से बाहर निकलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये। कुविचारों को परास्त करने का एक ही उपाय है- प्रज्ञा साहित्य का न्यूनतम एक घण्टा अध्ययन अध्यवसाय। इतना समय एक बार न निकले तो उसे जब भी अवकाश मिले, थोड़ा- थोड़ा करके पूरा करते रहना चाहिये।
(४) प्रतिदिन प्रज्ञायोग की साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध, सोते समय तत्त्वबोध। नित्य कर्म से निवृत्त होकर जप, ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन- मनन में उपयोग। यही है त्रिविध सोपानों वाला प्रज्ञायोग। यह संक्षिप्त होते हुए भी अति प्रभावशाली एवं समग्र है। अपने अस्त- व्यस्त बिखराव वाले साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिये। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिए सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञा योग’ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक निभाया जाय।
(५) दृष्टिकोण को निषेधात्मक न रहने देकर विधेयात्मक बनाया जाय। अभावों की सूची फाड़ फेंकनी चाहिये और जो उपलब्धियाँ हस्तगत है, उन्हें असंख्य प्राणियों की अपेक्षा उच्चस्तरीय मानकर सन्तुष्ट भी रहना चाहिये और प्रसन्न भी। इसी मनःस्थिति में अधिक उन्नतिशील बनना और प्रस्तुत कठिनाइयों से निकलने वाला निर्धारण भी बन पड़ता है। असन्तुष्ट, खिन्न, उद्विग्न रहना तो प्रकारान्तर से एक उन्माद है, जिसके कारण समाधान और उत्थान के सारे द्वार ही बन्द हो जाते है।
कर्तृत्व पालन को सब कुछ मानें। असीम महत्त्वाकाँक्षाओं के रंगीले महल न रचें। ईमानदारी से किये गये पराक्रम से ही परिपूर्ण सफलता मानें और उतने भर से सन्तुष्ट रहना सीखें। कुरूपता नहीं, सौन्दर्य निहारें। आशंकाग्रस्त, भयभीत, निराश न रहें। उज्ज्वल भविष्य के सपने देखें। याचक नहीं दानी बने। आत्मावलम्बन सीखें। अहंकार तो हटाएँ पर स्वाभिमान जीवित रखें। अपना समय, श्रम, मन और धन से दूसरों को ऊँचा उठायें। सहायता करे पर बदले की अपेक्षा न रखें। बड़प्पन की तृष्णाओं को छोड़े और उनके स्थान पर महानता अर्जित करने की महत्त्वाकांक्षा सँजोये। स्मरण रखें, हँसते- हँसाते रहना और हल्की- फुल्की जिन्दगी जीना ही सबसे बड़ी कलाकारिता है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
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