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Tuesday 20, January 2026

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 20 January 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



समय की मुझे जरूरत है। पैसों की  जरूरत नहीं है, पैसों का मैं क्या करूंगा? पैसा इकट्ठा करने पर इकट्ठा हो जाऊं, तो चोर और चालाक और ठग और बेईमान और बदमाश इकट्ठे कर लेते हैं और उनके घर में से देते हैं  और उनमें कितना करोड़ों का धन निकलता हैं। मैं अगर खड़ा हो जाऊं इसी बात पर कि मुझे धन इकट्ठा करना है तो बहुत इकट्ठा कर सकता हूं या कर लिया होता या कर सकता हूं चलिए, लेकिन नहीं, वह मेरी इच्छा नहीं है। मेरी इच्छा सिर्फ एक है, कि मेरे हाथ पाव मजबूत हो जाएं, हाथ पांव अच्छे अच्छे हो जाएं, तब काम चले हाथ पांव से किसका मतलब है, आप से है मेरा मतलब आप उन 10 हजार आदमियों में से हो जाएं? जिनको मैं यह कहूं की शक्तिपीठें बनाना मेरा बेकार गया,   24 लाख का कुटुंब बनाना, परिवार बनाना,  यह बेकार गया पर 10 हजार बनाएं, इमानदारी  की बात यह है, आप चलते फिरते शक्तिपीठ बन जाइए, चलते फिरते शक्तिपीठ हाड मास-हाड मांस के शक्तिपीठ वह शक्तिपीठ है तब चूने से बनी है, ईंटों से बनी है, सीमेंट से बनी है,  लकड़ी, लोहे से बनी है, पर आप हाड़ के बने  हुए, मांस के बने हुए,  चमड़ी के बने हुए, और चीजों के बने हुए शक्तिपीठ स्वयं अपने आपको बना ले और जो उनमे उम्मीदें शक्तिपीठों से लगाए हुए था वह उम्मीदे आप मेरी पूरी करना शुरू कर दें, आप अपना समय निकालें,   नहीं साहब, हमने तो नौकर रखा था और वह नौकर, नहीं साहब,   नौकर नहीं, हमको आपका समय चाहिए, 

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अखण्ड-ज्योति से




परमपूज्य गुरुदेव के साथ का वह वसंत

सन् २०१४ का यह वसंत कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। परिजन भूले न होंगे कि परमपूज्य गुरुदेव ने सन् १९९० की वसंत पंचमी को अपने गायत्री परिवार के सदस्यों से अंतिम भेंट- मुलाकात के पश्चात एकांत ले लिया था, इसकी चर्चा वे १९८९ के सितंबर महीने से ही करने लगे थे। इस महीने व उसके बाद के महीनों में उनके शरीर में विचित्र से परिवर्तन आने लगे थे। कभी-कभी उनके शरीर की तेजस्विता अतिशय बढ़ जाती और कभी-कभी वह सामान्य-सा लगने लगता। इसी. क्रम में यदा-कदा उनका शरीर बहुत कड़ा हो जाता तो फिर थोड़ी देर बाद ठीक हो जाता। ऐसे और बहुत सारे परिवर्तन थे, जिनकी तार्किक व्याख्या तो संभव नहीं, पर देखने वालों को ये अतिविस्मयकारी अवश्य लगते थे। एक बार जब उनसे उनके एक शिष्य ने इस बारे में पूछा "गुरुदेव! आपके साथ यह सब क्या हो जाता है?" तो उन्होंने कहा- "बेटा! मैं एक अति विशेष साधना कर रहा हूँ।"

उनकी इस बात को सुनने वाले ते समझा कि साधना तो गुरुदेव का स्वभाव है। इस बार वे कुछ नया करने वाले होंगे, लेकिन उन्होंने स्वयं ही थोड़ी देर बाद कहा-"मैं अपनी चेतना को धीरे-धीरे इस शरीर से मुक्त कर रहा हूँ। बस, एक पतली-सी डोर जोड़कर रखूँगा। उसे भी किसी दिन तोड़ दूँगा।" बात ठीक-ठीक समझ में नहीं आई। जिसे समझाते हुए उन्होंने कहा- "अगर इस प्रक्रिया के बिना शरीर छोड़ना होगा तो शरीर छोड़ने के बाद भी सप्ताहों और हो सकता है इसमें महीनों लग जाएँ, शरीर से प्रकाश निकलने का क्रम जारी रहेगा, जैसा कि महर्षि अरविंद के साथ हुआ था। उनके शरीर छोड़ने के बाद भी तीन दिन तक लगातार उनका शरीर प्रकाशित रहा। ऐसी स्थिति में नाहक लोग चर्चा करेंगे, तमाशा बनेगा, इसीलिए यह प्रक्रिया पूरी की जा रही है,. ताकि कोई बेवजह चर्चा या तमाशा न हो।"

"तब फिर साधना कैसी?" यह पूछने पर उन्होंने कहा- "इस बार की संपूर्ण साधना स्थूलशरीर से नहीं, सूक्ष्मशरीर से होगी। इसकी कक्षा भी धरती से ऊपर होगी। इसका आरंभ इसी १९९० के वसंत से हो जाएगा। कुछ समय तक पृष्ठभूमि का निर्माण व तैयारी, बाद में पूर्णतया सूक्ष्मशरीर से विशिष्ट साधना आरंभ।" पूछने पर उन्होंने कहा- "यह अवधि भी २४ वर्ष की होगी। इन चौबीस वर्षों में पुराने खंडहर टूटेंगे व नवसृजन की तैयारी आरंभ हो सकेगी।"

क्रमश: जारी.......
 अखण्ड ज्योति 2014 फरवरी, पृष्ठ 5

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